साउथ जॉर्जियाः इंसानी बस्ती से 1400KM दूर जीवों का जहान

  • 19 अप्रैल 2019
इंसानी बस्ती से 1400KM दूर व्हेलों का जहान इमेज कॉपीरइट Shafik Meghji

पिछले साल जापान ने एलान किया कि वो फिर से व्हेलों का शिकार शुरू करेगा. अस्सी के दशक में दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर व्हेलों के शिकार पर पाबंदी का फ़ैसला किया था. वजह ये थी कि बेतरह शिकार के चलते व्हेलों की कई नस्लें ख़ात्मे के कगार पर थीं.

यूं तो व्हेलों का शिकार आदि काल से समुद्र तट के किनारे रहने वाले करते आए थे. मगर, पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति के बाद व्हेलों को मारने में बड़ी तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ था. वजह ये कि उनका मांस और व्हेलों के शरीर में मौजूद फैट से निकलने वाला तेल कारख़ानों में इस्तेमाल होता था.

अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में सुदूर दक्षिण में व्हेलों के शिकार का ठिकाना एक ऐसा द्वीप बना, जहां इंसान का नामो-निशान नहीं था.

दक्षिणी अटलांटिक महासागर में अंटार्कटिका महाद्वीप के क़रीब है साउथ जॉर्जिया नाम का द्वीप. हज़ारों बरस से सील, वॉलरस और व्हेलें इस द्वीप पर आती-जाती रही थीं.

पहाड़ों, ग्लेशियरों और क़ुदरती बंदरगाहों से लैस ये द्वीप इंसानों से लंबे वक़्त तक अछूता रहा था. यहां से सबसे क़रीबी इंसानी बस्ती है फॉकलैंड द्वीप समूह. वो भी 1400 किलोमीटर दूर है.

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1675 में हुई थी द्वीप की खोज

इस द्वीप की खोज तो 1675 में हो चुकी थी. पर, ब्रिटिश अन्वेषक कैप्टन जेम्स कुक ने 1775 में साउथ जॉर्जिया पर ब्रिटेन का झंडा फहराकर इसे ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा घोषित कर दिया. यहां से लौट कर जेम्स कुक ने साउथ जॉर्जिया के बारे में विस्तार से लिखा.

कुक ने बताया कि किस तरह इस द्वीप पर भारी तादाद में सील आकर रहती हैं. इसके बाद अमरीका और ब्रिटेन में सील के शिकार में दिलचस्पी रखने वालों ने इस द्वीप की तरफ़ कूच कर दिया. एक सदी के भीतर ही हालात ऐसे हो गए कि यहां पायी जाने वाली फर सील की नस्ल शिकार की वजह से पूरी तरह ख़त्म होने की स्थिति में पहुंच गई.

अच्छी बात ये रही कि बीसवीं सदी की शुरुआत होते-होते सीलों का शिकार फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया था. तो, लालची शिकारियों ने बची-खुची सील को बख़्श दिया.

मगर, दक्षिणी जॉर्जिया के ख़ूनी शिकार के इतिहास का सिलसिला यहां नहीं थमा. जल्द ही एक और ख़ूनी शिकार ने इसकी जगह ले ली.

1916 में अर्नेस्ट शैकल्टन नाम का एक शिकारी नाविक अंटार्कटिका के एलीफैंट द्वीप पर फंस गया था. बर्फ़ीले तूफ़ान और ग्लेशियर के थपेड़ों से उसका जहाज़ टूट गया. तमाम मुश्किलें झेलते हुए शैकल्टन बमुश्किल साउथ जॉर्जिया पहुंचा.

सील की हत्या का ये ठिकाना, उसके लिए जीवन का वरदान बन गया. ऐसा लगा कि वो किसी दूसरी दुनिया से इंसानी सभ्यता के ठिकाने पर पहुंच गया है.

जब शैकल्टन साउथ जॉर्जिया पहुंचा, तो पूरे द्वीप पर सील के शिकार और उसके बाद, काट-छांट कर उनका मांस और ब्लबर यानी फैट निकालने के औज़ार बिखरे पड़े थे. आरियां थीं, कारख़ाने थे. व्हेल और सील के लगातार शिकार की वजह से इस द्वीप से ख़ून की धाराएं निकल कर समुद्र में मिलते हुए साफ़ दिखती थीं. एक दौर ऐसा था कि इस द्वीप पर दसियों हज़ार व्हेलों का क़त्ल किया गया था.

साउथ जॉर्जिया को इसके एक और नाम ग्रित्विकेन के नाम से जानते हैं. नॉर्वे की भाषा में इसका नाम होता है बर्तन वाली गुफ़ा.

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हर साल 18 हज़ार लोग आते हैं यहां

असल में 1902 में कार्ल एंटन लार्सेन नाम का नार्वे का नाविक ध्रुवों की खोज में यहां तक पहुंचा था. यहां उसने सील के शिकार के लिए लगे तीन पैरों वाले बर्तन जैसे औज़ार को देखकर इसका नाम ग्रित्विकेन यानी बर्तन वाली गुफ़ा नाम दे दिया.

यहां उस वक़्त व्हेलें अक्सर आकर अपना ठिकाना बनाती थीं. तभी कार्ल एंटन ने इसे व्हेलों के शिकार के लिए सबसे मुफ़ीद जगह बताई. 1904 में कार्ल एंटन यहां दोबारा आया. तब उसने यहां पर व्हेलों के शिकार का पहला कारख़ाना बनाया. अगले 8 साल में यानी 1912 तक यहां व्हेलों के शिकार के 6 और कारख़ाने खुल गए थे.

पोलर लैटीट्यूड नाम के क्रूज़ शिप पर इतिहासकार सेब कोल्थार्ड कहते हैं कि साउथ जॉर्जिया पर किंग पेंगुइन भी भारी तादाद में रहते हैं. इसके अलावा कई और ख़ास जीव भी धरती के इस दुरूह हिस्से की पहचान हैं.

आज की तारीख़ में पूरे साल भर में क़रीब 18 हज़ार लोग साउथ जॉर्जिया आते हैं. इनमें से ज़्यादातर यहां के ख़ूनी इतिहास के पन्ने खंगालने आते हैं.

साउथ जॉर्जिया द्वीप 3755 वर्ग किलोमीटर में फैला है. जज़ीरे का आधा से ज़्यादा हिस्सा पूरे साल बर्फ़ से ढका रहता है. हालांकि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यहां के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं.

आज ये द्वीप दुनिया से भले अलग-थलग हो, एक ज़माने में ये विश्व की अर्थव्यवस्था में अहम रोल निभाता था.

आज इस द्वीप पर साल भर औसतन 15-30 लोग ही रहते हैं. इनमें से ज़्यादातर या तो वैज्ञानिक हैं या फिर सरकारी अधिकारी.

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विश्व युद्ध के दौरान व्हेलों के तेल की भारी मांग

सैलानियों को लुभाने के लिए साउथ जॉर्जिया में व्हेलों के शिकार के बाद उनसे मांस और तेल निकालने वाले पुराने कारख़ाने अब म्यूज़ियम बना दिए गए हैं.

इसके एक बंदरगाह पर व्हेल के शिकार में इस्तेमाल होने वाला पुराना जहाज़ पेट्रेल खड़ा है. एक दौर ऐसा भी था, जब ये जहाज़ एक दिन में 15 व्हेलों का शिकार कर लेता था. इन्हें साउथ जॉर्जिया लाया जाता था.

जहां शिकार की हुई व्हेलों का मांस और तेल निकाला जाता था. जहां इन्हें रखा जाता था, वो जगह तेल और ख़ून की वजह से बहुत फिसलन भरी हो जाती थी. इसलिए शिकारी ऐसे बूट पहनते थे, जिनके तलवों में नाख़ून लगे होते थे.

पहले तो व्हेलों से केवल उनका फैट वाला हिस्सा ही निकाला जाता था, जिसे ब्लबर कहते थे. हालांकि बाद में व्हेलों का मांस और उनकी हड्डियां भी काम में लायी जाने लगी थीं.

व्हेल से निकला अव्वल दर्जे का तेल आइसक्रीम या मार्जरीन बनाने के काम आता था. दूसरे दर्जे का तेल साबुन और कॉस्मेटिक बनाने में प्रयोग किया जाता था. और, सबसे ख़राब तेल कारख़ानों में इस्तेमाल होता था.

व्हेल के तेल से ग्लिसरॉल, विस्फोटक और राइफ़लों में डालने का तेल तैयार होता था. इसके अलावा इनसे क्रोनोमीटर और दूसरे हथियार भी बनाए जाते थे.

पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान व्हेलों के तेल की भारी मांग रही. नतीजा ये हुआ कि व्हेलों का बेतहाशा शिकार हुआ.

एक दौर ऐसा भी था कि साउथ जॉर्जिया में व्हेल के शिकार के लिए 450 या इससे भी ज़्यादा लोग रहा करते थे. वो हफ़्ते के सातों दिन लगातार कम करते थे. वो भी शून्य से भी 10 डिग्री सेल्सियस नीचे के तापमान में.

द्वीप पर एक चर्च भी है. जिसके पादरी का काम सबसे बोरिंग था. क्योंकि उसके पास इसके सिवा कोई काम नहीं होता था.

द्वीप पर खुली किराने की दुकान में तंबाकू ख़ूब बेची जाती थी. लोगों को पीने के लिए शराब नहीं मिलती थी. इसका नतीजा ये हुआ कि लोग कोलोन पीकर गुज़ारा करते थे. कई लोग पॉलिश को निचोड़कर शराब की प्यास बुझाते थे. क्योंकि उसमें अल्कोहल होता है.

1904 से 1905 के बीच साउथ जॉर्जिया में 1 लाख 75 हज़ार 250 व्हेलों को मारकर उनसे तेल निकाला गया था. माना जाता है कि बहुत से जहाज़ तो व्हेलों को अपने डेक पर ही चीर-फाड़ डालते थे. एक मोटे अनुमान के मुताबिक़, 1904 से 1978 के बीच 15 लाख से ज़्यादा व्हेलों को मार डाला गया था. इसका नतीजा ये हुआ कि व्हेलों की आबादी में कमी महसूस की गई. कई नस्लें ख़तरे में पड़ गईं.

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1978 में लगी थी शिकार पर पाबंदी

1978 में दुनिया के बहुत से देशों ने व्हेलों के शिकार पर पाबंदी लगा दी. इसके बाद व्हेलों की आबादी थोड़ी सी बढ़ी है. मगर, साउथ जॉर्जिया में कई दशक तक चले व्हेलों के क़त्लेआम से कई प्रजातियां पूरी तरह से ख़ात्मे के कगार पर पहुंच गई

आज दक्षिणी गोलार्ध में व्हेलों की तादाद कुछ हज़ार भर रह गई है, जो कभी 2 लाख से ज़्यादा हुआ करती थी.

इसका केंद्र रहा साउथ जॉर्जिया द्वीप अब जीवों को बचाने की मुहिम का प्रतीक बन गया है. अब इसके आस-पास के समुद्री हिस्से संरक्षित घोषित किए जा चुके हैं. इसकी वजह से आस-पास रहने वाली सीलों की आबादी बढ़कर पुराने दौर जैसी हो चुकी है.

आज अंटार्कटिक फर सील की 98 फ़ीसद और एलीफैंट सील की 50 फ़ीसद आबादी इस द्वीप के इर्द-गिर्द रहती है.

इसके अलावा क़रीब 3 करोड़ समुद्री परिंदे भी इस द्वीप पर मंडराते रहते हैं. माना जाता है कि यहां पर 4 लाख से ज़्यादा पेंगुइन हैं.

आज संरक्षण के तमाम कामों की वजह से इन जीवों पर मंडरा रहा ख़तरा टल चुका है. पर, अगर आप कभी साउथ जॉर्जिया जाएंगे, तो, आप को यहां के ख़ूनी इतिहास की यादें ज़रूर तंग करेंगी.

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