श्रीलंका में चरमपंथी हमलों की ख़ुफ़िया जानकारी भारत को कैसे मिली?

  • 24 अप्रैल 2019
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श्रीलंका में 21 अप्रैल को हुए चरमपंथी हमलों की चल रही जांच के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन हमलों को रोका जा सकता था. सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि हमले से दो हफ़्ते पहले भारत ने इसे लेकर आगाह किया था.

भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यदि श्रीलंकाई अधिकारियों ने समय रहते भारत से मिली सूचना पर कार्रवाई की होती तो सीरियल धमाकों को रोका जा सकता था.

आतंकवाद विरोधी मामलों पर अमरीका और अन्य देशों को अक्सर सलाह देने वाली ऑस्ट्रेलिया स्थित लीडिया खलील का मानना है कि ये हमले निश्चित रूप से रोके जा सकते थे. उन्होंने कहा, "यह कई स्तरों पर हुई चूक की वजह से हुआ."

आतंकवाद विरोधी मामलों के जानकार भारतीय पत्रकार प्रवीण स्वामी ने कहा कि उनके पास वो दस्तावेज़ हैं जिनसे यह साबित होता है कि भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारियों ने अपने श्रीलंकाई समकक्षों को चर्चों और पर्यटन स्थलों में संभावित साज़िश को लेकर आगाह किया था.

सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बात से आश्चर्य हो रहा है कि भारत से दो हफ़्ते पहले इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिलने के बावजूद ईस्टर संडे के दिन हमले होते हैं जो यह साफ़ बताता है कि श्रीलंकाई अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.

श्रीलंका की सरकार ने भारत का नाम लिए बगैर यह स्वीकार किया था कि चरमपंथी हमले को लेकर एक देश ने सूचनाएं दी थीं.

श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने कहा, "जिन सुरक्षा अधिकारियों को विदेशी राष्ट्र से ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी, उन्होंने उसे मेरे साथ साझा नहीं किया."

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श्रीलंका से ख़ुफ़िया सूचनाएं साझा करता रहा है भारत

प्रवीण स्वामी कहते हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच राजनीतिक रिश्तों में हमेशा गर्मजोशी नहीं रहने के बावजूद दोनों देशों के ख़ुफ़िया विभाग सुरक्षा से जुड़ी सूचनाएं एक दूसरे के साथ हमेशा साझा करते रहे हैं.

वो कहते हैं, "मेरे विचार में, राजनीति में तनाव के बावजूद दोनों देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच मज़बूत रिश्ते हैं. कुछ श्रीलंकाई राजनेताओं पर रॉ के गंभीर आरोपों के बावजूद दोनों के बीच संपर्क बने हुए हैं और इन्होंने साथ काम करना जारी रखा."

दिल्ली स्थित सुरक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन कहते हैं कि 1991 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दोनों देशों के बीच ख़ुफ़िया जानकारियों को साझा करना और भी नियमित हो गया. एलटीटीई, जिसे तमिल टाइगर्स के नाम से भी जाना जाता है, को राजीव गांधी की हत्या का ज़िम्मेदार ठहराया गया था.

वो कहते हैं, "श्रीलंका के साथ सूचना को साझा करना भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा हित में है."

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भारत ने जो जानकारी दी, हमलावर वही निकले

सरीन का मानना है कि भारत की रॉ जैसी ख़ुफ़िया एजेंसियां सुरक्षा कारणों से दूसरे देशों के साथ पूरी जानकारी कभी साझा नहीं करेगी लेकिन कार्रवाई योग्य जानकारी ज़रूर उपलब्ध कराई जाती है. लेकिन ईस्टर संडे के दिन श्रीलंका में हुए हमले के मामले में, भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बहुत सटीक जानकारी साझा की थी.

स्वामी के मुताबिक, संभावित प्लॉट की जानकारी में कुछ संभावित संदिग्धों के नाम और पते तक का विवरण था, जिसमें से कई वास्तव में हमलावर निकले.

लिहाज़ा इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने सुरक्षा एजेंसी के स्तर पर बड़े बदलाव का वादा किया है.

उन्होंने कहा, "विदेशी राष्ट्र से मिली सूचना को खुद तक रखने की बड़ी चूक करने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ मैंने कड़ी कार्रवाई करने का फ़ैसला किया है."

इसके बीच श्रीलंका में मीडिया यह पूछ रहा है कि भारत को स्थानीय इस्लामिक संगठन नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) के सदस्यों की इस हमले में शामिल होने का पता कैसे चला, श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास इन हमलों का कोई सुराग़ क्यों नहीं था? वे भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों से मिली हमलों की जानकारी पर अधिकारियों की उदासीनता पर भी सवाल उठा रहे हैं.

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भारत के पास इतनी सटीक जानकारी कहां से आई?

लेकिन भारतीय एजेंसियों को श्रीलंका में संभावित हमलों और संदिग्धों के बारे में इतनी सटीक जानकारियां कैसे थी?

इसी साल श्रीलंका के एक दूर दराज के खेत में 100 किलो विस्फ़ोटक और गोला-बारूद की बरामदगी के बाद से नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) भारतीय और श्रीलंकाई एजेंसियों के रडार पर था.

स्वामी कहते हैं कि ऐसा माना जाता है कि यह इलाका कथित जेहादियों की ट्रेनिंग का मैदान था और यह एनटीजे देश के कुछ बौद्ध स्मारकों को उड़ाने की योजना बना रहा था.

सरीन कहते हैं कि किसी दूसरे देश के बारे में इतनी जानकारी हासिल करना ख़ुफ़िया विभाग के लिए कोई असमान्य बात नहीं है.

वो कहते हैं, "मैंने सुना है कि हाल ही में रॉ एक संदिग्ध से पूछताछ कर रहा था और उसी दौरान श्रीलंका में सीरियल धमाकों की जानकारी उसे मिली."

Image caption श्रीलंका में सीरियल धमाके का संदिग्ध हमलावर

क्या जांच में भारत को शामिल करेगा श्रीलंका?

रॉ या कोई अन्य ख़ुफ़िया एजेंसियां अक्सर ऐसी सूचनाओं पर टिप्पणी नहीं करतीं. लेकिन यहां यह बात उल्लेखनीय है कि भारतीय और श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच संबंध विश्वास पर आधारित है.

तो क्या श्रीलंका चरमपंथी हमले की जांच में भारत को शामिल करेगा?

सरीन का मानना है कि सहयोग तो पहले से ही हो रहा है. हालांकि वो कहते हैं कि इसके बारे में मीडिया को कभी पता नहीं चल सकेगा.

बेशक श्रीलंकाई सरकार ने विदेशी शक्तियों से मदद मांगी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि रविवार को जो हमले हुए उसमें उसकी योजना बनाने और अंजाम देने में किसी विदेशी चरमपंथी संगठन का हाथ था या नहीं.

अमरीकी एफ़बीआई इसमें सहयोग कर रही है लेकिन भारत का नाम अभी तक सामने नहीं आया है.

सरीन के मुताबिक, "भारत के पास सटीक जानकारी है और जांच में उसकी भागीदारी अपेक्षित है. यह भारत के राष्ट्रीय हित में भी है."

हाल के दिनों में कई पड़ोसी देशों के साथ भारत का ख़ुफ़िया और सुरक्षा सहयोग पहले से अधिक मज़बूत हुआ है.

नरेंद्र मोदी सरकार ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के साथ सुरक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं.

सरीन कहते हैं, "70-80 लाख से अधिक प्रवासी भारतीय सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में रहते हैं उनमें से कुछ चरमपंथ विचारधारा के साथ सलफ़ी या कट्टर मुसलमान बन जाते हैं.

राष्ट्र हित को देखते हुए सुरक्षा मामलों में सहयोग करना इन तीनों देशों के हित में है."

इस्लामिक स्टेट से ख़तरा?

सीरिया में इस्लामिक स्टेट (आईएस) को पूरी तरह हार का सामना करना पड़ा है. ऐसा माना जाता है कि इसके सदस्य अपने-अपने देश वापस लौटना चाहते हैं. ये अपने देश में परेशानी पैदा करने में सक्षम हैं.

स्वामी का मानना है कि ईस्टर के मौके पर श्रीलंका में हुए ख़ून-ख़राबे से भारत की उस आशंका को बल मिलता है कि बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका जैसे भारत के मित्र पड़ोसी मुल्कों में जिहादी आंदोलन "भारत में आगे कई बड़े चरमपंथी हमलों में मदद कर सकता है."

लेकिन रॉ के एक पूर्व अधिकारी तिलक देवेश्वर का कहना है कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) से तुरंत किसी ख़तरे के बारे में सोचना थोड़ा जल्दबाज़ी है. वो कहते हैं, "जब भी किसी पड़ोसी देश में कुछ होता है तो हमें सतर्क और सावधान रहने की ज़रूरत होती है. लेकिन यह कहना कि आईएस से सीधा ख़तरा है, यह थोड़ा जल्दबाज़ी है."

विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा में हुई चूक की वजह से चरमपंथी श्रीलंका को निशाना बनाने में कामयाब हुए. यह वहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का एक-दूसरे के साथ आंतरिक द्वंद्व में फंसे होने का परिणाम था.

वे कहते हैं कि भारत के साथ ऐसी कोई स्थिति नहीं बनती है. कई चरमपंथी हमलों का शिकार होने के नाते आतंक के ख़िलाफ़ चले रहे विश्वस्तरीय लड़ाई में भारत एक सक्रिय भागीदार है इसकी वजह से इसके लिए अमरीका जैसे बड़े वैश्विक देशों के साथ ख़ुफ़िया जानकारी साझा करना ज़रूरी है.

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