ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की रात से अब तक की कहानी

  • 3 मई 2019
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Image caption 2011 में अमरीकी नेवी सील ने एबटाबाद में एक ऑपरेशन में लादेन को मार दिया था

आठ साल पहले दो मई 2011 को अमरीकी फ़ौज के विशेष बल के एक दस्ते ने पाकिस्तान के ख़ैबर पख़तूनख़्वा प्रांत के एबटाबाद शहर में दुनिया के सबसे वांछित व्यक्ति ओसामा बिन लादेन उनके क़रीबी साथी अबू अहमद अलकूवैती और तीन अन्य लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी.

जब यह कार्रवाई हो रही थी तब उस समय अपने घर के बरामदे में ज़ेन बाबा सो रहे थे.

90 साल से अधिक उम्र वाले मोहम्मद ज़ेन एबटाबाद के बिलाल टाऊन इलाक़े में 60 सालों से रह रहे हैं और ज़ेन बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं.

ओसामा बिन लादेन के मकान के सबसे क़रीब रहने वाले पड़ोसी ज़ेन बाबा का घर ओसामा बिन लादेन के कम्पाउंड के गेट के सामने है जिसके बीच में सिर्फ़ सात फ़ुट की एक सड़क है.

बीबीसी से बात करते हुए ज़ेन बाबा ने बताया कि उनकी याददाश्त अब कमज़ोर हो चुकी है लेकिन बहुत कुछ भूल जाने के बावजूद भी उन्हें दो मई 2011 की रात की घटना अच्छी तरह याद है.

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Image caption दो मई 2011 को अमरीकी फ़ौजी दस्ता कोठी में घुसा था

वह बताते हैं, "मैं उस रात बाकी रातों की तरह अपने घर के बरामदे में सोया हुआ था. ये एक गर्म और अंधेरी रात थी. बिजली ग़ायब थी लेकिन एकाएक रात बारह से साढ़े बारह बजे के क़रीब हेलीकॉप्टर की आवाज़ें सुनीं. वह बिलकुल मेरे घर की छत पर उड़ रहे थे जिससे मेरी चादरें भी उड़कर पता नहीं कहां चली गईं."

उन्होंने कहा कि ये कोई तीन हेलीकॉप्टर थे जिनमें एक दो पंखे वाला था जबकि बाक़ी दो अलग थे.

"उस दौरान उड़ते हुए एक कोठी की छत पर रुका था जिसमें से वहां फ़ौजी उतरे, दूसरा मेरे आलू के खेतों में उतरा और तीसरा हेलीकॉप्टर मेरे घर के क़रीब खाली प्लॉट पर उतरा."

"इसी दौरान एक हेलीकॉप्टर आसमान में गया और वह एकदम तेज़ी से पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए कोठी की दीवार के पास जाकर टकरा गया था. ये नहीं पता चल सका कि उसमें पायलट बच गया था या मर गया था."

ज़ेन बाबा बताते हैं कि बाद में उन्होंने सड़क पर दौड़ने की आवाज़ें सुनीं.

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Image caption ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद 2012 में पूरी तरह से कम्पाउंड को तबाह कर दिया गया था

"इस दौरान दो बार उन फ़ौजियों ने मेरे घर के गेट को भी खोलना चाहा था जबकि छत पर से भी बूटों की आवाज़ें आ रही थीं. इस दौरान फ़ौजियों ने कोठी का गेट खोलना और तोड़ना चाहा मगर वह इसमें नाकाम रहे तो उन्होंने हेंड ग्रैनेड फेंक कर गेट को तोड़ा जिसका एक टुकड़ा मेरे घर के बरामदे में भी गिरा था जो मैंने सुबह पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले किया था."

उनका कहना था कि कुछ फ़ौजी अंदर चले गए और कुछ बाहर रहे.

"अंधेरे की वजह से मैं देख नहीं सका कि वहां क्या हो रहा था मगर बूटों की आवाज़ों से पता चलता था कि वह तीसरी मंज़िल पर पहुंच गए थे जहां पर दो कमरे थे. उन कमरों में महिलाएं और बच्चे होते थे. मैंने महिलाओं और बच्चों के चीखने की आवाज़ें इस तरह सुनी जिस तरह मुर्ग़ी और उसके बच्चों को छेड़ा जाए तो वह चीखते हैं. उन चीख़ों की आवाज़ें सुनकर मैं हिल गया था मगर चंद ही लम्हों के बाद वह आवाज़ें आहिस्ता-आहिस्ता बंद हो गई थीं."

ज़ेन बाबा बताते हैं कि उसके बाद दोबारा बूटों की आवाज़ें शुरू हो गईं.

"फ़ौजियों ने हेलीकॉप्टर में बैठना शुरू कर दिया था. मुझे किसी बंदूक़ की गोली की कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी थी. हां जब वह जा रहे थे तो हेलीकॉप्टर तबाह करने का ज़ोरदार धमाका ज़रूर हुआ था. वह अभी उड़े ही होंगे कि पुलिस मौक़े पर पहुंच गई जिसने इलाक़े के चारों तरफ़ खड़े लोगों को हटाना शुरू कर दिया था. उसके बाद फ़ौज भी पहुंच गई जिसने लाशों को निकाला. महिलाओं और बच्चों को गाड़ियों में बैठाया और फिर वहां चौकियां क़ायम कर दी गईं जो एक साल तक मौजूद थीं."

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'यह मकान मेरे सामने ही बना था'

मई 2011 में बिलाल टाऊन का इलाक़ा बहुत वीरान था और ज़ेन बाबा उस वक़्त इलाक़े में चौकीदारी करते थे. जिस ज़मीन पर कम्पाउंड बनाया गया था वहां पर उन्होंने खेतीबाड़ी भी की थी.

उन्होंने बताया कि इलाक़े में सारी मकान उनके सामने बने हैं और कम्पाउंड भी उनके सामने बना था.

ज़ेन बाबा का दावा है कि इस मकान में दो चचेरे भाई अपने ख़ानदान के साथ रहते थे और हमले में वे भी मारे गए थे.

ज़ेन बाबा ने बताया कि उस मकान में राशिद ख़ान और तारिक़ हसन ख़ान को वह क़रीब से जानते थे और उन्हें वह बड़ा ख़ान और छोटा ख़ान कहते थे.

आठ साला बाद बिलाल टाऊन का नक़्शा काफ़ी हद तक बदल गया है. इस इलाक़े में अब मुश्किल से एक आध प्लाट ही खाली नज़र आता है. जो घर 2011 में बन रहे थे वह अब आबाद हो चुके हैं जबकि ओसामा बिन लादेन के कम्पाउंड के क़रीब भी मकान बन चुके हैं.

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Image caption ज़ेन बाबा का कहना था कि ये दस कनाल ज़मीन का टुकड़ा था जहां पर खेतीबाड़ी की जाती थी

'यहां के लोग अच्छे थे'

ज़ेन बाबा बड़े ख़ान और छोटे ख़ान को याद करके कहते हैं कि उस घर में कोई आठ बच्चे, दोनों की पत्नियां और एक बहन थी.

"बच्चों को कभी भी बाहर निकलते नहीं देखा. हैरत होती थी कि ये कैसे बच्चे हैं जो ख़ुद भी बाहर निकलने और खेलने-कूदने की ज़िद नहीं करते थे. घर से कभी भी किसी क़िस्म के शोर-शराबे की आवाज़ें नहीं सुनी थीं."

उनका कहना था कि छोटा ख़ान और बड़ा ख़ान बाहर आते-जाते थे और उनके पास एक जीप और एक पुरानी सी कार थी.

"वे दोनों लोगों से मिलते-जुलते भी थे मगर एक हद तक. वे कभी किसी के घर नहीं गए थे और न ही किसी को उनके घर में जाते देखा गया."

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Image caption ज़ेन बाबा पहले भी मीडिया को इंटरव्यू देते रहे हैं

कम्पाउंड का बनना और तबाह होना

ज़ेन बाबा बताते हैं कि कम्पाउंड वाली ज़मीन अरशद ख़ान ने तीन चरणों में ख़रीदी थी. पहले तीन कनाल, फिर 13 मरले और फिर तीन कनाल में ज़मीन ख़रीदी गई थी. कम्पाउंड का कुल हिस्सा छह कनाल 13 मरले का है जिसमें ज़्यादातर इलाक़ा ख़ाली था और सिर्फ़ पांच मरले से कुछ ज़्यादा इलाके में निर्माण कार्य किया गया था.

ज़ेन बाबा का कहना थ कि ये दस कनाल ज़मीन का टुकड़ा था जहां पर वह खेतीबाड़ी किया करते थे.

उनके मुताबिक़ सन 2002 और 2003 में ज़मीन के असल मालिकों ने ये ज़मीन प्रॉपर्टी डीलर को तीन लाख 75 हज़ार रुपये कनाल में ख़रीदी थी.

"ज़मीन हासिल करने के बाद प्रॉपर्टी डीलर मेरे पास आया और कहा कि वह इस पर प्लॉटिंग करना चाहता है तो मैंने उसको बताया कि हमने अभी आलू लगा रखा है, जब वह तैयार हो जाएं तो फिर आना. अभी मैं ये ज़मीन तुम्हारे हवाले नहीं कर सकता. इसके तीन महीने बाद वह प्रॉपर्टी डीलर दोबारा आया और उसने ज़मीन को बेचना शुरू कर दिया था."

ज़ेन बाबा कहते हैं कि बड़े ख़ान ने ज़मीन हासिल करने के बाद निर्माण कार्य शुरू कर दिया था.

"दीवार अभी चार फ़ुट तक ही बनी थीं तो एक रोज़ ठेकेदार, मिस्त्री और मेरी मौजूदगी में बड़े ख़ान ने कहा कि मुझसे बड़ी ग़लती हो चुकी है. ठेकेदार के सवाल पर उन्होंने कहा कि हुजरा (नमाज़ की जगह) भी बनाना है जिसके बाद बड़े ख़ान ने दोबारा प्रॉपर्टी डीलर से बात की और उससे बाकी की 13 मरले ज़मीन सात लाख रुपये प्रति कनाल के हिसाब से हासिल की हालांकि इससे पहले उन्होंने तीन कनाल ज़मीन पांच लाख रुपये प्रति कनाल में हासिल की थी."

ज़ेन बाबा के मुताबिक़ अभी निर्माण कार्य जारी था कि बड़े ख़ान ने बाकी की ज़मीन हासिल करने का प्रोग्राम बना लिया और इस बार उन्होंने स्वाबी के डॉक्टर के साथ बात की जिसने उनकी ज़मीन के बगल में ही ज़मीन ख़रीदी थी.

उन्होंने दावा किया कि उस डॉक्टर ने भी बड़े ख़ान को ये ज़मीन सात लाख रुपये प्रति कनाल के हिसाब से बेचने की हामी भर दी थी और अगले डेढ़ साल तक लगातार काम करने के बाद ये कोठी पूरी तरह तैयार हुई थी.

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उनका कहना था कि जब तक निर्माण कार्य जारी रहा तब तक बड़े ख़ान और छोटे ख़ान ने अपने बाल बच्चों को यहां नहीं भेजा.

"जब तक ख़ानदान वाले नहीं आए थे तो उस वक़्त तक मेरा वहां आना जाना था मगर जब बाल बच्चे वहां आ गए तो बड़े ख़ान ने हमें घर में आने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि परदे की वजह से हम किसी को घर के अंदर नहीं आने दे सकते."

पूरी तरह तबाह हो चुकी कोठी के प्लॉट की ओर इशारा करते हुए ज़ेन बाबा ने बताया कि वहां पर कौन-कौन से कमरे थे और कहां की ओर हुजरा, माल-मवेशियों के लिए बाड़ा था. उन्होंने बताया कि पूरी कोठी में जाने के लिए रास्ते बनाए गए थे.

उन्होंने बताया कि वहां बड़े ख़ान और छोटे ख़ान ने बाहर से मंगवाए हुए उम्दा नस्ल के पेड़ लगाए थे और उसके अलावा सब्ज़ियां भी वहां ख़ुद लगाते थे लेकिन इस काम के लिए कोई मज़दूर नहीं था बल्कि सारे काम वे ख़ुद किया करते थे.

"ठेकेदार ने एक दफ़ा कहा था कि घर में इतने ज़्यादा नलके लगाने की क्या ज़रूरत है तो बड़े ख़ान ने जवाब दिया कि हम यहां पर पेड़ लगाएंगे, सब्ज़ियां उगाएंगे, माल-मवेशी रखेंगे तो उनको आराम से पानी देंगे. जिसके बाद ठेकेदार चुप हो गया था."

उनका कहना था कि बड़े ख़ान ने कोटी का हर काम बड़े अच्छे तरीक़े से करवाया था. हर चीज़ की गुणवत्ता का बहुत ख़याल रखा था और ठेकेदार के रहने के बावजूद सब कुछ अपनी निगरानी में करवाया था.

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Image caption हमले के बाद मलबा उठाते बच्चे

"उस कोठी पर उतना ज़बरदस्त काम हुआ था कि जब उस कोठी को गिराया जा रहा था तो पहले रोज़ दो बड़ी मशीनें आई थीं जिन्होंने उसको गिराना चाहा तो वह नाकाम हो गईं. इसके बाद वहां बनाए गए पिलर को काटा गया और फिर मशीनें गिराने के लिए दोबारा आईं."

उनका कहना था कि जब कोठी को गिराया गया तो पहले ठेकेदार यहां से कई दिन तक ये मलबा उठाता रहा और एक दिन उसने बाक़ी बच जाने वाला मलबा छोड़ दिया और कहा कि अब में थक चुका हूं. इसके बाद लोगों ने ईंटें और दूसरे मलबा उठाना शुरू कर दिया और वह अपने साथ कोठी के क़ीमती पेड़ भी उखाड़ कर ले गए.

ज़ेन बाबा ने हंसते हुए बताया, "जब सारा मलबा लोग उठाकर ले गए तो एक रोज़ क्या देखता हूं कि इलाक़े ही का एक युवा आरी वग़ैराह लेकर आया है और मुझे कहता है कि इन पेड़ों को काटता हूं और साथ ले जाऊंगा. मैंने कहा कि मुझे तो कोई एतराज़ नहीं है मगर वैसे ही उसको डराने के लिए कहा कि मझे जरनल साहब ने कहा था कि ये पेड़ तुम्हारी ज़िम्मेदारी है. उनको जो काटे उनका नाम-पता मुझे बता देना बाक़ी में ख़ुद देख लूंगा. ये सुनते ही वह युवा उतनी तेज़ी से वापस चला गया. अब देखिए कि यह पेड़ अब हमारे काम आ रहे हैं. हम यहां पर बैठते हैं और ये पेड़ गर्मी-सर्दी में काम आते हैं."

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Image caption कार्रवाई के दौरान तबाह होने वाले हेलीकॉप्टर का मलबा

ऑपरेशन के कारण होने वाला नुक़सान

ज़ेन बाबा बताते हैं कि दो मई 2011 की घटना के अगले कुछ दिन हालात तनाव भरे रहे लेकिन बाद में ये सामान्य हो गए.

"हमें तो कोई आने जाने से नहीं रोकता था मगर बाहर के किसी और आदमी को इस इलाक़े में आने जाने की इजाज़त नहीं दी जाती थी. अगले एक साल बाद तक जब तक कोठी गिराई नहीं गई थी तब तक हमने बहुत मुश्किल से वक़्त गुज़ारा था."

ज़ेन बाबा कहते हैं कि हेलीकॉप्टरों ने उनका बहुत नुक़सान किया था.

"उस साल हमने साढ़े छह हज़ार रुपये के ओज़ आलू के बीज ख़रीदकर लगाए थे, वह सब तबाह हो गए. एक रोज़ सुरक्षा अधिकारी आए, उन्होंने कहा कि हमारे अफ़सर आ रहे हैं उनको चाय पिलानी है, कुर्सियां दें और उनको सात कुर्सियां निकालकर दी थीं. उनका भी अभी तक कुछ अता-पता नहीं है."

उनका दावा है कि न सिर्फ़ उन्हें कम से कम डेढ़ लाख रुपये का नुक़सान हुआ था बल्कि उनसे रोज़ाना की बुनियाद पर पूछताछ की जाती थी.

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Image caption कार्रवाई के बाद इमारत का मलबा हटाए जाने तक पाकिस्तानी फ़ौज इस इलाक़े की निगरानी करती रही

मीडिया के सवाल-जवाब और सरकारी अफ़सरों की पूछताछ

ज़ेन बाबा कहते हैं कि शुरू में रोज़ाना कोई न कोई आता और सवाल जवाब शुरू कर देता. जब उनसे जान छूटती तो फिर मीडिया वाले शुरू हो जाते.

"एक साल तक तो मीडिया वालों से पाबंदी की वजह से कम ही मुलाक़ात होती थी मगर जब कोठियां गिराकर चौकियां ख़त्म हुईं तो फिर उसके बाद कोई ऐसा इलाक़ा और मुल्क नहीं बचा जहां से मीडिया वाला न आया हो. दुनिया के हर मुल्क, रंग, नस्ल, क़ौम का मीडिया वाला यहां पर ज़रूर आया था."

Image caption ज़ेन बाबा के अनुसार ऑपरेशन के दौरान उनका भी आर्थिक नुक़सान हुआ था

उन्होंने बताया कि पहली वह देश और विदेशी पत्रकारों को बयान देते थे मगर बार-बार के सवालों से वह तंग आ गए थे.

ज़ेन बाबा का दावा है कि वहां कई बार पुलिस वालों ने स्थानीय और विदेशी लोगों को पकड़ा भी और जिन लोगों ने विदेशियों से बातचीत की होती है उनको बयान लेने के लिए बुलाया जाता है.

"मुझसे बयान लेने के बाद कई बार पूछताछ हुई थी बल्कि मुझे और मेरे बच्चों को तो जेल भी ले गए थे."

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Image caption कम्पाउंड के प्लॉट पर अब बच्चे क्रिकेट खेलते हैं

काफ़ी देर तक बातचीत करने के बाद ज़ेन बाबा थक गए और कहा कि बस इतना बहुत है.

"अब मेरी उम्र 92 साल से ज़्यादा होने लगी है. थक भी जाता हूं और अब तंग भी हो गया हूं, याद भी कम आ रहा है. दो दिन से तुम्हारे साथ बात कर रहा हूं अब कुछ दिनों बाद आना तो कुछ और बताऊंगा."

ये कहकर वह उठ गए और अपने घर की तरफ़ चल पड़े मगर जाते-जाते वह ये कहना नहीं भूले कि 'अब वही रात दोबारा आने वाली है.'

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