ट्रे़ड वॉर: क्या चीन पर भारी पड़ेगा अमरीका

  • 11 मई 2019
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आपसी व्यापार को लेकर होने वाले समझौते से ठीक पहले चीन और अमरीका के बीच तल्ख़ी बढ़ गई है.

चीन के 200 अरब डॉलर मूल्य के सामान पर अमरीका शुक्रवार से नए आयात कर (टैरिफ़) लगाने जा रहा है. पहले ये 10 प्रतिशत था जो अब बढ़कर 25 प्रतिशत होने वाला है.

पिछले कई महीनों से दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के प्रस्ताव पर काम हो रहा था और इस पर शुक्रवार को हस्ताक्षर होने वाले थे.

लेकिन अमरीका ने चीन पर ताज़ा आरोप लगाते हुए कहा है कि चीन ने मूल प्रस्ताव में कुछ अहम बदलाव कर दिए हैं.

हालांकि चीन इससे इनकार कर रहा है और समझौते के लिए उसके शीर्ष वार्ताकार लियू ही वॉशिंगटन पहुंच चुके हैं.

अब देखना होगा कि अंतिम समय में चीन और रूस के बीच कोई समझौता होता है या नहीं. व्यापार को लेकर दोनों देशों की तल्खी को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में 'ट्रेड वॉर' कहा जा रहा है.

समझौता न होने की सूरत में अमरीका, चीनी सामानों पर भारी भरकम आयात कर लगा देगा. लेकिन चीन ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा होता है तो वो भी बदले की कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है.

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किसको फ़ायदा

लेकिन ट्रंप का रुख़ नरम नहीं हो रहा है. बुधवार की रात समर्थकों की एक रैली को संबोधित हुए उन्होंने चीन पर व्यापार समझौते को तोड़ने का आरोप लगाया और चीनी सामानों पर टैक्स बढ़ाने की मंशा जताई.

ऐसा लग रहा है कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता टूटने की कगार पर पहुंच गया है. लेकिन समझौता टूटने की स्थिति में किस देश को फायदा होगा?

पिछले कुछ महीनों में चीन की अर्थव्यवस्था पर मंदी का असर दिखाई पड़ने लगा है. लेकिन दूसरी तरफ़ अमरीका की अर्थव्यवस्था में काफ़ी सुधार आया है. अमरीकी राष्ट्रपति इसी का फ़ायदा उठाने की फिराक में हैं.

चीन की अर्थव्यवस्था इस समय कोई नई चुनौती लेने की स्थिति में नहीं है.

दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा 300 अरब डॉलर का है. दोनों देशों के बीच 500 अरब डॉलर का व्यापार होता है जिसमें अधिकांश माल चीन से निर्यात होता है.

व्यापार घाटे का मुद्दा ट्रंप से पहले भी था. लेकिन पहले की अमरीकी सरकारों ने इस तरह से कड़ा रुख नहीं अपनाया था जिस तरह ट्रंप प्रशासन का है.

लेकिन दोनों देशों के बीच सिर्फ ट्रेड वॉर ही एक कारण नहीं है. अमरीका को लगता है कि चीन उसकी टेक्नोलॉजी को चुराता है, व्यापार में वो लाभ में हैं और हर तरह से चीन अमरीका को चूस रहा है.

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झगड़ाटेक्नोलॉजी का

ट्रंप का कहना है कि 'एक मैं ही ऐसा राष्ट्रपति हूं जो चीन को कोई मौका नहीं देता, इससे पहले के राष्ट्रपतियों ने ऐसा किया. मैं अमरीकी टेक्नोलॉजी नहीं जाने दूंगा.'

इसलिए हुआवे जो चीन की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी है, उस पर अमरीका ने पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है.

अमरीका हर तरह से चीन की ग्रोथ को रोकने की कोशिश कर रहा है. चीन के लिए ये बहुत बुरे दिन हैं क्योंकि यूरोप के देश भी चीन के साथ ऐसा ही कर रहे हैं.

हालांकि यूरोपीय देशों की मूल चिंता टेक्नोलॉजी को लेकर है. उनका आरोप है कि चीनी कंपनियां टेक्नोलॉजी चुराती हैं और जब यूरोपीय कंपनियां चीन जाती हैं तो उन पर टेक्नोलॉजी देने का दबाव बनाया जाता है.

ऐसा नहीं है कि दोनों देशों के बीच व्यापार के अलावा किसी और मुद्दे पर तल्खी नहीं है.

अभी अमरीका ने अपने दो युद्धपोत जापान और ताइवान द्वीपों के पास भेज दिए हैं. दोनों देशों के बीच रिश्ते का एक ये भी आयाम है.

लेकिन चीन की कमज़ोर स्थिति में अमरीका ही नहीं बाकी देश भी आवाज़ बुलंद करने लगे हैं.

अभी हाल ही में मलेशिया ने चीन के सामने बोलने की हिम्मत की.

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दोस्त भी दिखाने लगे आंखें

यहां तक कि चीन के क़रीबी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी विरोध में बोलने की हिम्मत जुटाने लगे हैं.

जब कोई दबता है तो उसके दोस्त भी इसका फायदा उठाने का मौका तलाशने लगते हैं.

दबने से चीन को केवल अमरीका से ही नुकसान नहीं होने जा रहा है, बल्कि उसे और ज़्यादा नुकसान झेलना पड़ सकता है.

देर सबेर दक्षिणी चीन सागर के मामले में फिलिपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम जो चीन के सामने चुप हैं वो भी अपनी आवाज़ बुलंद करेंगे.

लंबे समय से तल्ख रिश्ते रखने वाले भारत का भी साहस बढ़ जाएगा. इसलिए इस लड़ाई में चीन को नुकसान बहुत है और स्थिति पेचीदा है.

अगर वो अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की बातें मान ले तो उनकी मांग और बढ़ जाएगी और वो भी पूरा कर दिया जाए तो भी उनकी मांग पूरी नहीं होगी.

चीन के सामने दोनों ही स्थितियों में नुकसान है, अगर वो ट्रंप की बातों से इनकार करे तब भी और मान ले तब भी.

चीन के व्यापार का पूरी दुनिया में इसलिए दबदबा है क्योंकि उसका सामान बहुत सस्ता बिकता है.

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अमरीका-चीन की जंग का आग़ाज़?

डोनल्ड ट्रंप की मांगें

डोनल्ड ट्रंप की मुख्य मांग है व्यापार घाटे को ख़त्म किया जाए. यानी 300 अरब डॉलर का जो सामान चीन अमरीका को बेचता है उसे कम कर वो अमरीका से माल खरीदना शुरू कर दे.

ट्रंप की दूसरी शर्त है कि चीन टेक्नोलॉजी की चोरी करना बंद कर दे. चीन की जितनी कंपनियां हैं उसे सरकार सब्सिडी आदि से समर्थन करती है. अमरीका का कहना है कि निजी कंपनियों की सब्सिडी पूरी तरह बंद कर दी जाए.

यानी अमरीका चीन के अंदर चीन के क़ानून को बदलने का दबाव डाल रहा है, ताकि अमरीकी कंपनियों का माल चीन के सामने टिक सके.

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की नज़र, आगामी अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों पर है. इसलिए घरेलू मतदाताओं के सामने उन्हें ताक़तवर दिखना ज़रूरी है.

और अगर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को वो दबा सकें तो उनकी स्थिति हीरो जैसी हो जाएगी.

अमरीका का शेयर बाज़ार पिछले 10 सालों में कभी इतनी अच्छी स्थिति में नहीं रहा, रोज़गार के आंकड़े भी पिछले 50 सालों में सबसे बेहतर हैं.

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आज अमरीका की स्थिति बहुत अच्छी है, हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि ट्रंप ने ये सब किया है, हो सकता है कि पिछले ओबामा प्रशासन की नीतियों के कारण ऐसा हो. क्योंकि आर्थिक नतीजे तीन साल बाद ही दिखते हैं.

ट्रंप के काम का असर तो तीन साल बाद दिखेगा. लेकिन हक़ीक़त ये है कि ट्रंप इन स्थितियों का चुनावी फायदा उठाना चाहते हैं.

(बीबीसी संवाददाता संदीप राय से बातचीत पर आधारित.)

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