ट्रेड वॉर: अमरीका या चीन किसका ज़्यादा नुकसान?

  • 14 मई 2019
अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप इमेज कॉपीरइट EPA

अमरीका और चीन के बीच हाल के दिनों में ट्रेड वॉर में और तल्खी आई है. दोनों देशों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नया आयात शुल्क लगाया है.

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप लगातार कहते रहे हैं कि चीन को आयात शुल्क अदा करना होगा.

दूसरी तरफ़ ट्रंप के आर्थिक सलाहकार लैरी कुड्लोव ने रविवार को स्वीकार किया था कि अमरीकी फ़र्म चीनी सामान पर टैक्स दे रही हैं.

ऐसे में ट्रंप का यह कहना कितना सही है कि ट्रेड वॉर अमरीका के लिए अच्छा है, क्योंकि इससे अमरीकी राजस्व में लाखों डॉलर आ रहे हैं. इस जंग में किसे सबसे ज़्यादा नुक़सान हो रहा है?

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अमरीकी आयात शुल्क असल में कौन अदा करता है?

वकील क्रिस्टॉफ बॉन्डी के मुताबिक ये शुल्क अमरीकी आयातक अदा करते हैं, ना कि चीनी कंपनियां. आयातक अमरीकी सरकार को टैक्स के रूप में आयात शुल्क देते हैं.

कनाडा-यूरोपीय संघ के व्यापार समझौते की बातचीत के दौरान कनाडाई सरकार के वरिष्ठ वकील रहे बॉन्डी ने कहा कि ये अतिरिक्त शुल्क आखिर में अमरीकी ग्राहकों को बढ़ी कीमतों के रूप में चुकाना पड़ सकता है.

उन्होंने कहा, "सप्लाई चेन पर इन आयात शुल्कों का बहुत बुरा असर पड़ेगा."

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चीन पर इसका क्या असर होगा?

चीन अमरीका का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है, पिछले साल चीन ने अमरीका में 7% ज़्यादा आयात किया. हालांकि साल 2019 की पहली तिमाही में ये आयात 9% घटा, जिसके पीछे दोनों देशों के व्यापार युद्ध को वजह माना जा रहा है.

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के व्यापार विशेषज्ञ मरेडिथ क्रोली के मुताबिक, "इसके बावजूद, इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि चीनी कंपनियों ने अपने दामों में कटौती की हो ताकि अमरीकी कंपनियां उनका सामान खरीदना जारी रखें."

वो कहते हैं, "जिन सामानों को कहीं और से आसानी से लिया जा सकता है, उन्हें अमरीकी कंपनियों ने चीनी आयातकों से लेना बंद कर दिया. ये आयातक मार्केट से गायब हो गए हैं. इन लोगों के मार्जिन बहुत कम होते हैं और आयात शुल्क इन्हें साफ तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं. जो चीज़े कहीं और से नहीं मिल सकतीं, मुझे नहीं लगता उनके दाम में कोई कटौती की गई होगी, क्योंकि अमरीकी आयातक उन पर बहुत हद तक निर्भर हैं."

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अमरीका पर क्या असर होगा?

मार्च में प्रकाशित दो अध्ययनों के मुताबिक पिछले साल चीन और दूसरे देशों पर लगाए गए अमरीकी आयात शुल्कों की सारी कीमत अमरीका के व्यापारियों और ग्राहकों ने चुकाई.

न्यूयॉर्क के फेडरल रिज़र्व बैंक, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के आर्थशास्त्रियों के मुताबिक स्टील से लेकर वाशिंग मशीन के आयात पर लगाई गई ड्यूटी का भार अमरीकी कंपनियों और ग्राहकों पर पड़ा. इसके लिए अमरीकी कंपनियों को प्रति महीने तीन अरब डॉलर का अतिरिक्त कर चुकाना पड़ा.

ये भी पता चला कि मांग घटने से 1.4 अरब डॉलर का अतिरिक्त नुकसान भी हुआ.

एक दूसरा पेपर विश्व बैंक के मुख्य आर्थशास्त्री ने अन्य लोगों के साथ मिलकर लिखा है. इसमें भी सामने आया है कि आयात शुल्क का ज़्यादातर भुगतान ग्राहकों और अमरीकी कंपनियों ने किया.

इसका विश्‍लेषण करने पर पता चला कि दूसरे देशों की ओर से जवाबी आयात शुल्क लगाए जान के बाद, ट्रंप के व्यापार युद्ध का सबसे ज़्यादा असर उन किसानों और ब्लू कॉलर कर्मचारियों पर पड़ा, जिन्होंने साल 2016 के चुनाव में ट्रंप का समर्थन किया था.

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क्या अमरीका वही सामान दूसरे देशों से नहीं खरीद सकता?

ट्रंप ने अमरीकी कंपनियों से कहा है कि वो चीन से सामान आयात करने के बजाए कहीं और से, जैसे वियतनाम से आयात करने के बारे में सोचें. "या इससे भी अच्छा वो ये सामान अमरीकी निर्माताओं से ही खरीद लें."

लेकिन बॉन्डी का कहना है कि ये इतना आसान नहीं है. उनके मुताबिक, "उत्पादन करने और वैल्यू चेन में बदलाव करने में लंबा वक्त लगता है और इसमें खर्चा भी होता है. पिछले साल स्टील पर लगाए गए अमरीकी आयात शुल्क की ही बात ले लीजिए , एकदम से अमरीका में सैंकड़ों नई फैक्ट्रियां नहीं खोली जा सकतीं."

चीन मैन्युफ़ैक्चरिंग पावर हाउस भी है, जिसने अपने प्रतिस्पर्धियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. ऐसे में चीन को वैश्विक सप्लाई चेन से हटाना बहुत मुश्किल है.

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क्या आयात शुल्क लगाने से फायदा मिलता है?

क्रोली और बॉन्डी दोनों का ही कहना है कि इसके कम ही सबूत मिलते हैं.

साल 2009 में राष्ट्रपति ओबामा ने आयात बढ़ने का हवाला देते हुए चीनी टायरों पर 35% का आयात शुल्क लगा दिया था. इसकी वजह से अमरीकी नौकरियों का नुकसान हुआ.

हालाँकि साल 2012 में पीटर्सन इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स ने अपनी रिसर्च में पाया कि साल 2011 में अमरीकी ग्राहकों को महंगे टायरों की वजह से लगभग 1.1 अरब डॉलर अदा करने पड़े.

संस्थान के मुताबिक, इससे मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षेत्र की लगभग 1200 नौकरियां ज़रूर बचीं, मगर अमरीकी ग्राहकों को जो अतिरिक्त ख़र्च करना पड़ा, उससे दूसरे सामानों पर उनके ख़र्च में कमी आई जिससे "परोक्ष तौर पर रीटेल क्षेत्र में रोज़गार में कमी आई".

साथ ही कहा कि चीन ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमरीका से चिकन से जुड़े उत्पादों के निर्यात पर ऐंटी-डंपिंग शुल्क लगा दिए जिससे उस उद्योग की बिक्री पर एक अरब डॉलर का असर पड़ा.

इन शुल्कों को जायज़ ठहराने के लिए आम तौर पर साल 1983 के समय का उदाहरण दिया जाता है जब अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन ने जापानी मोटरसाइकिलों पर बहुत ज़्यादा शुल्क लगाने का फ़ैसला किया था.

बताया गया कि इस क़दम से संघर्ष करती अमरीकी बाइक निर्माता कंपनी हार्ले डेविडसन को विदेशी प्रतियोगिता से बचाया जा सका.

हालांकि कई लोगों का तर्क है कि कंपनियां अपने स्तर से ये कोशिशें कर रही हैं. इनमें फ़ैक्ट्रियों का आधुनिकीकरण और इंजनों के निर्माण जैसी चीज़ें शामिल हैं.

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क्या अमरीकी शुल्क से चीन समझौता करने पर मजबूर होगा?

डॉ क्रोली कहते हैं कि बढ़ते शुल्क से चीन बातचीत के लिए सामने आएगा लेकिन बहुत क्रांतिकारी समझौते की उम्मीद नहीं की जा सकती.

ज़ाहिर है चीन को नुक़सान हो रहा है क्योंकि चीन अमरीका को ज़्यादा निर्यात करता है जबकि अमरीका ज़्यादा आयात करता है. ऐसे में इस ट्रेड वॉर में चीन को ज़्यादा नुक़सान होगा.

डॉ क्रोली कहते हैं, "लेकिन वो अपने कानून नहीं बदलना चाहते और अगर वो बदल भी देते हैं तो क्या वो इन्हें लागू कर पाएंगे?"

बॉन्डी सोचते हैं कि ट्रंप के आयात शुल्क लगाने का मकसद वोटरों को लुभाना और सुर्खियां बटोरना है.

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