दक्षिण एशिया में इस्लामिक स्टेट के पीछे है ये ताक़त?

  • 21 मई 2019
श्रीलंका में हुए हमले

श्रीलंका के पूर्वी शहर कट्टनकुड़ी में एक विशाल मस्जिद के बाहर सुरक्षाकर्मियों का पहरा है.

बीते महीने ईस्टर रविवार को हुए विनाशकारी आत्मघाती हमलों ने एक बार फिर भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ते कट्टरपंथ पर बहस छेड़ दी है.

आख़िर नौजवानों ने इस तरह के हमले को अंजाम क्यों दिया, जिसमें 250 से अधिक लोग मारे गए? हमलों को अंजाम देने वाले युवाओं में अधिकतर पढ़े-लिखे और मध्यम वर्गीय परिवार से जुड़े थे.

इन्होंने चर्चों और बड़े होटलों को अपने निशाने पर लिया था.

इस्लामिक स्टेट ने हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी. जिहादी समूह ने हाल के दिनों में भारत और पाकिस्तान में नई शाखाएं खोलने की भी घोषणा की है. यह साफ तौर पर दर्शाने की कोशिश है कि इसका ख़तरा दक्षिण एशिया में बढ़ रहा है.

यह क्षेत्र उन समूहों का ठिकाना है जो सलफ़ी इस्लाम (कट्टरपंथी इस्लाम) में विश्वास रखते हैं. यह माना जाता है कि इसकी विचारधारा इसके अनुयायियों को चरमपंथ की ओर ले जाती है.

21 अप्रैल के हमलों के बाद से श्रीलंका ने 200 इस्लामी उपदेशकों को निष्कासित कर दिया है, जो युवा आबादी में बढ़ते कट्टरपंथ की श्रीलंका की आशंका और डर को दर्शाता है.

तेज़ी से पैर पसारता सलफ़ी इस्लाम

भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव में सलफ़ी इस्लाम तेज़ी से अपना पैर पसार रहा है. यह अपने उपदेशों और शिक्षा से युवा आबादी के बीच अपनी जड़ें जमा रहा है.

ईस्टर पर हुए धमाकों के पीछे कथित रूप से नेशनल तौहीद जमात का हाथ बताया जाता है. कट्टनकुड़ी इस समूह का ठिकाना है.

यह छोटा शहर लंबे वक़्त से नरम सुन्नियों और कट्टर सलफ़ीवादियों के बीच संघर्ष का गवाह रहा है. ईस्टर हमलों के मुख्य संदिग्ध ज़हरान हाशिम ने यहां कट्टरपंथ कौ फैलाने की भरसक कोशिश की.

वक़्त-वक़्त पर हुए जिहादी हमलों ने सलफ़ी इस्लाम के प्रचारकों और युवाओं मे उसके प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया.

ज़ाकिर नाइक इन प्रमुख चेहरों में से एक हैं, जिनकी मज़बूत पकड़ मध्यम वर्ग और शहरी मुसलमानों के बीच है. वो गज़ब के उपदेशक माने जाते हैं, जो इस्लाम से जुड़े विषयों का विश्लेषण साधारण शब्दों में करते हैं.

ज़ाकिर नाइक दक्षिण एशिया की युवा मुस्लिम आबादी के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं. वो फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलते हैं और उन्हें सुनने लाखों की भीड़ पहुंचती है.

साल 2016 में बांग्लादेश में हुए एक हमले के बाद उनपर भारत और बांग्लादेश की सरकारों ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया था.

इस हमले की ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली थी और यह बताया गया था कि हमलावर ज़ाकिर नाइक के भाषणों से प्रेरित था.

इसके बाद उनके बोल थोड़े बदल गए और समय के साथ इसमें नरमी आती चली गई. लेकिन इससे उनके अनुयायी नहीं रुके और वे उनके संदेशों को ज़मीनी स्तर पर और सोशल मीडिया के जरिए फ़ैलाते रहे.

आज भी यूट्यूब पर उनके भाषणों को लाखों की संख्या में लोग रोज़ देखते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत और बांग्लादेश में प्रदर्शन

साल 2016 के उस हमले के बाद ज़ाकिर नाइक के ख़िलाफ़ भारत और बांग्लादेश में प्रदर्शन किए गए. गूगल के मुताबिक ज़ाकिर नाइक और तारिक जमील यूट्यूब पर खूब सर्च किए जाते हैं.

जमील एक अत्यधिक प्रभावशाली मुस्लिम शख्सियत हैं, जो तबलीग़ी जमात का चेहरा है. दक्षिण एशिया के युवा मुसलमान इनकी बातों से काफी प्रभावित हैं.

तबलीग़ी जमात का कहना है कि यह स्वतंत्रता और लोकतंत्र की वकालत करता है. अब तक इस बात के सबूत नहीं मिले हैं कि जमात का संबंध चरमपंथी समूहों या जिहादियों से है.

लेकिन युवा मुसलमानों को कट्टरपंथी बनाने में इसकी कथित भूमिका का ज़िक्र कई मौकों पर मीडिया रिपोर्टस में किया गया है, जो अंततः इन्हें चरमपंथ की ओर ढकेलते हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक फिलीपींस का एक परिवार दक्षिण पूर्व एशिया में इस्लामिक स्टेट के लिए नियुक्ति का काम किया करता था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

रिपोर्ट के अनुसार यह परिवार तबलीग़ी जमात से जुड़े एक मस्जिद में जाता था और यह समझा जाता है कि वहां उन्हें कट्टरपंथ के लिए प्रेरित किया गया था.

भारतीय अख़बार लाइवमिंट के प्रकाशित एक लेख में चरमपंथ रोधक मामलों के जानकार अजय साहनी कहते हैं, "भारत में इसकी (तबलीग़ी जमात) स्वीकार्यता एक धार्मिक संगठन के रूप में है, जिसका आतंकवाद को बढ़ावा देने में कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं है. हालांकि इससे जुड़े कई लोग कट्टरपंथ को बढ़ावा देते पाए गए हैं."

यह समूह 2005 के 7/7 लंदन बम विस्फोटों के बाद भी चर्चा आया था, जब यह पता चला था कि अपराधियों ने समूह की बैठकों में भाग लिया था.

श्रीलंका धमाकों का असर भारत के दक्षिणी हिस्से में भी देखने को मिला. भारत का ये हिस्सा श्रीलंका से भोगौलिक और सांस्कृतिक रूप से नज़दीक है. यहां भी सलफ़ी विचारधारा में बढ़ोतरी देखने को मिली है.

अप्रैल में भारत की सरकार ने केरल में एक युवक को गिरफ्तार किया था, जिसने ये माना था कि उसने राज्य में आत्मघाती हमले की योजना बनाई.

हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में 29 अप्रैल को एनआईए का एक बयान छपा था, जिसमें बताया गया था कि पूछताछ के दौरान गिरफ्तार युवक ने बताया कि वो नाइक और हाशिम के उपदेशों को सुनता था.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

राजनीति से दूर होने का दावा

कट्टरपंथी मौलवी ज़हरान हाशिम अपने धार्मिक उपदेशों को अपने सोशल मीडिया चैनलों पर डालते हैं, जिसमें वो हिंसा को भड़काते नज़र आते हैं.

इस तरह के ज़्यादातर धार्मिक समूह दावा करते हैं कि उनका राजनीतिक से कुछ लेना देना नहीं है, बल्कि उनका मकसद शिक्षा और इस्लाम के शुद्ध रूप का प्रचार करना है.

उनका ये भी दावा है कि वो हिंसा का समर्थन नहीं करते.

लेकिन आलोचकों का कहना है कि युवाओं को कट्टरपंथ की ओर ले जाने में इन समूहों की भूमिका होती है और यही युवा आगे चलकर हिंसा का रास्ता अपनाते हैं.

कुछ उपदेशक अल-कायदा और आईएस जैसे जिहादी समूहों की वैश्विक विचारधारा का भी समर्थन करते हैं.

ये दोनों जिहादी समूह विवादास्पद मध्यकालीन इस्लामिक विद्वान इब्न तैमियाह को मानते हैं.

आईएस और अलकायदा जैसे जिहादी समूह अपने कामों को सही ठहराने के लिए इब्न तैमियाह की बातों का हवाला भी देते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

भर्ती में मदद करते हैं

सलफ़ी समूह आईएस और अल-कायदा जैसे जिहादी समूहों के लिए नए सदस्यों की भर्ती करने में भी मदद करते हैं.

श्रीलंका धमाकों की जांच कर रही भारतीय टीम दक्षिण भारत में सलफ़ी समूह के समर्थकों की जिहादियों के तौर पर नियुक्ति में हाशिम की भूमिका की भी जांच कर रही है.

लेकिन सरकारें अबतक ये नहीं समझ पाईं है कि धर्म में विश्वास रखने वाले समर्थक हिंसक चरमपंथी कैसे बन जाते हैं.

विश्लेषक इसका एक संभावित स्पष्टीकरण ये देते हैं कि रूढ़िवादी इस्लामिक समूहों में शामिल होने वाले लोग अकसर उनके गैर-राजनीतिक रुख से असंतुष्ट होते हैं और आखिर में जिहादी समूह का हिस्सा बन जाते हैं.

2016 में केरल के मुसलमानों का एक समूह श्रीलंका के नेगोम्बो गया था. नेगोम्बो में भी ईस्टर के मौके पर धमाके हुए थे. केरल से गया ये समूह वहां के एक सलफ़ी सेंटर में शामिल होने गया था, जिसका उद्देश्य पैगंबर मुहम्मद के दौर के इस्लाम को वापस लाना है.

समूह के लोगों ने सेंटर के सामने अपने आईएस समर्थक विचारों रखे, जिसके बाद सेंटर की ओर से उन्हें लौट जाने के लिए कहा गया.

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक बाद में ये लोग अफ़ग़ानिस्तान जाकर आईएस में शामिल हो गए.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

21 अप्रैल को हुए हमलों के बाद से श्रीलंका की सरकार की काफी आलोचना हो रही है. कहा जा रहा है कि सरकार को चेतावनी दी गई थी कि देश में मुस्लिमों के एक हिस्से में कट्टरता पनप रही है, लेकिन सरकार ने इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया.

श्रीलंका की मुस्लिम काउंसिल ने भी सरकार को एनटीजे की विचारधारा और कार्यकर्ताओं के बारे में आगाह किया था.

इस बीच भारत की खुफिया एजेंसियां ऐसे समूहों पर नज़र बनाए हुए है.

एनआईए ज़हरान हाशिम और भारत-श्रीलंका में जिहादी समर्थकों से उनके संबंधों की भी जांच कर रही है.

क्षेत्र में कट्टरपंथी विचारधारा फैलने से सोशल मीडिया पर नफरत भरे अभियानों के बढ़ने का खतरा भी बढ़ गया है.

ऐसे अभियान कई बार मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों के उदार या धर्मनिरपेक्ष व्यक्तियों के खिलाफ जान से मारने की धमकियों या घातक हमलों में बदल जाते हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP

मालदीव में एक इस्लामिक समूह टेलिग्राम चैनल 'मुर्ताद (धर्मत्यागी) वॉच एमवी' चलाता है, जिसमें वो उन लोगों की तस्वीरें और जानकारी पोस्ट करता है, जिसे उसने धर्मत्यागी घोषित किया हुआ है.

इस नेटवर्क को लेखकों को धर्मनिरपेश ब्लॉगर्स की हत्या के पीछे माना जाता है. माना जाता है कि 2017 में कट्टरपंथी इस्लाम को चुनौती देने वाले यमीन राशीद की हत्या के पीछे भी यही समूह था.

ऐसे ही हमले बांग्लादेश में भी हुए. जिनमें से कुछ की ज़िम्मेदारी आईएस ने तो कुछ की उसके प्रतिद्वंद्वी अल-क़ायदा ने ली.

इंटरनेट पर फैले चरमपंथ से निपटने के लिए दुनिया के कुछ हिस्सों में कोशिशें हो रही हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि इस समस्या से निपटने के लिए उपमहाद्वीप में व्यापक नीतिगत स्तर पर कोई ठोस कदम अबतक नहीं उठाया गया है.

(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की ख़बरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार