कभी कट्टी तो कभी झप्पी लेते भारत-पाकिस्तान के नेताः वुसअत की डायरी

  • 3 जून 2019
नरेंद्र मोदी और इमरान खान इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत और पाकिस्तान के नेतृत्व की सबसे अच्छी बात यह है कि एक की ओर से अच्छे भाषण या प्रदर्शन का जवाब मिले ना मिले पर बुराई का जवाब बुराई से तुरंत दिया जाता है.

अब यही देखिए कि चुनाव नतीजों से सिर्फ़ एक दिन पहले, सुषमा स्वराज जी ने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी का मुंह मीठा करवाया.

अगले रोज़ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने नरेंद्र मोदी को चुनाव में करारी जीत पर बधाई दी.

मगर इस बधाई के सिर्फ़ चार दिन बाद दिल्ली में पाकिस्तानी हाई कमिशन की इफ़्तार पार्टी में आने वाले मेहमानों के स्वागत के लिए, जहां हाई कमीशन के कर्मचारी गेट पर थे वहीं बाहर की तरफ़ हथियारबंद दिल्ली पुलिस और सादे कपड़ों वाले मेहमानों का इंतज़ार कर रहे थे.

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उन्होंने केवल आने वाले मेहमानों को ही नहीं बल्कि गाड़ियों को भी अंदर से चेक किया और तस्वीरें खींची.

उससे पहले 23 मार्च को भी हाईकमिश्नर ने जब पाकिस्तान दिवस की ख़ुशी में रिसेप्शन रखा था तो, आने वाले भारतीय मेहमानों को सादा कपड़ों वाले समझाते रहे कि उन्हें सरकार की तरह इस रिसेप्शन का बायकॉट करना चाहिए.

दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास की इफ़्तार पार्टी में जो कुछ हुआ उसका असर इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास के प्रोग्राम में भी दिखा.

यानी भारतीय हाई कमीशन ने एक पांच सितारा होटल में पाकिस्तानी नेताओं, पत्रकारों और सिविल सोसाइटी के मेहमानों को दो दिन पहले इफ़्तार पार्टी के लिए बुलाया.

होटल के गेट पर आदरणीय मेहमानों का स्वागत सबसे पहले एंटी टेररिस्ट स्कवाड और सादा कपड़ों वालों ने किया.

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कुछ से पूछताछ की और कुछ से सवाल हुआ कि, आप क्यों इस इफ़्तार पार्टी में जा रहे हैं?

इससे मुझे याद आया कि 2009 के लोकसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए जब मैंने कराची से दिल्ली फ़्लाइट पकड़नी थी तो एयरपोर्ट सिक्योरिटी के एक कर्मचारी ने मेरा पासपोर्ट और वीज़ा चेक करते हुए पूछा-

इंडिया क्यों जा रहे हैं, वो तो हमारा दुश्मन है?

अब से दो-ढाई महीने पहले दिल्ली में पाकिस्तानी राजनयिक कर्मचारियों के बच्चों को स्कूल लाने और ले जाने वाली गाड़ियों का पीछा किया गया और उन्हें रोककर सवाल जवाब किए गए तो उसके जवाब में पाकिस्तान में गुरुद्वारा सच्चा सौदा आने वाले दो भारतीय राजनयिकों को लगभग 20 मिनट एक कमरे में बंद रखा गया.

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यानी प्रधानमंत्रियों और विदेश मंत्रियों के स्तर पर मुस्कुराहटें, मुबारबादें, मिठाइयां और निचले स्तर पर इस हाथ दे- उस हाथ ले.

कभी एक प्रधानमंत्री किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर दूसरे प्रधानमंत्री को देखकर भी सामने से गुज़र जाता है तो कभी दोनों अगले रोज़ इसी मंच पर किसी कोने पर बैठे एक दूसरे के कान से कान मिलाए बात कर रहे होते हैं.

ऐसा हम स्कूल के ज़माने में करते थे, सुबह कुट्टी तो दोपहर में गले में हाथ डाले घूम रहे हैं और स्कूल की छुट्टी के बाद आमने-सामने से यूं निकल गए जैसे जानते ही नहीं, और अगली सुबह फिर झप्पी.

पर उस समय यह सब हरकतें इसलिए अच्छी लगती थीं क्योंकि हम बच्चे थे.

लेकिन जब भारत और पाकिस्तान के सफ़ेद कनपटियों वाले बुजुर्ग नेता और कर्मचारी भी बच्चों की तरह रूठते और मिलते हैं तो हम सोचते हैं कि बड़े ही क्यों हुए.

बच्चे ही रहते तो कितना अच्छा रहता, कम से कम बड़े होकर छोटापन तो ना दिखाना पड़ता.

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