नेपाल-चीन दोस्ती में नई ऊंचाई, पिछड़ रहा भारत?

  • 16 जून 2019
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नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ यह फ़ैसला चीन के उस प्रस्ताव के बाद लिया गया है जिसमें इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्चा वहां की सरकार ने उठाने की बात कही थी.

नेपाल के अख़बार हिमालयन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ इन शिक्षकों के वेतन का भुगतान काठमांडू स्थित चीनी दूतावास करता है.

अख़बार ने नेपाल के दस बड़े स्कूलों के प्रिंसिपल और शिक्षकों से बात की, जिसमें उन्होंने बच्चों को मंदारिन भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाने की बात स्वीकारी है.

हालांकि नेपाल सरकार का कहना है कि चीनी भाषा बच्चों के लिए अनिवार्य नहीं किया गया है.

स्कूलों के पाठ्यक्रम तय करने वाला सरकारी निकाय पाठ्यक्रम विकास केंद्र के सूचना अधिकारी गणेश प्रसाद भट्टाराई ने कहा, "स्कूलों को विदेशी भाषा पढ़ाने की अनुमति है, लेकिन वो उन विषयों को छात्रों के लिए अनिवार्य नहीं कर सकते हैं."

अख़बार के मुताबिक न सिर्फ़ काठमांडू बल्कि देश के अन्य जगहों पर भी स्कूलों में चीनी भाषा बच्चों को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जा रहा है.

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दबदबा कायम करने की कोशिश

नेपाल में चीन अपना असर लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और मंदारिन पढ़ाने के फ़ैसले को इसी नज़र से देखा जा रहा है.

न सिर्फ़ व्यापार, चीन नेपाल की शिक्षा पर भी अपना दबदबा कायम करना चाहता है.

नेपाल के एक बड़े स्कूल यूनाइटेड स्कूल के प्रिंसिपल कुलदीप न्यूपाने ने हिमालयन टाइम्स से कहा, "दो साल पहले चीनी दूतावास ने मुफ़्त में शिक्षक उपलब्ध कराने की बात कही थी और तब से हम इसे अनिवार्य विषय के रूप में बच्चों को पढ़ा रहे हैं."

एपेक्स लाइफ स्कूल के प्रिंसिपल हरि दाहाल ने भी मंदारिन भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों को वेतन चीनी दूतावास से दिए जाने की बात स्वीकारी.

उन्होंने कहा, "हमें केवल चीनी शिक्षकों को उनके रहने और खाने का खर्च उठाना पड़ता है."

चीनी दूतावास के प्रवक्ता जी ग्वांगली ने इस मुद्दे पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया.

चीनी भाषा सीखने की ललक

दुनियाभर में ख़ास कर नेपाल में मंदारिन भाषा सीखने की ललक तेज़ी से बढ़ रही है.

चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यहां कमाने के मौक़े लगातार बढ़ रहे हैं. नेपाल के युवा भी इस मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहते हैं.

यही कारण है कि नेपाल के अभिभावकों को भी मंदारिन भाषा पढ़ाए जाने से आपत्ति नहीं है.

नेपाल के अभिभावकों के महासंघ का कहना है कि इसे पढ़ाए जाने से आपत्ति नहीं है, लेकिन अनिवार्य करने से पहले स्कूलों को उनसे संपर्क और सलाह लेनी चाहिए थी.

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चीन-नेपाल में बढ़ रही नज़दीकियां

कहा जाता है कि चीन की रणनीति पड़ोसी देशों पर अपना प्रभुत्व कायम करने की रही है. नेपाली स्कूलों में चीनी भाषा पढ़ाने के खर्चे का वहन इसी रणनीति का हिस्सा है.

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई वाली सरकार धीरे-धीरे चीन से आर्थिक रूप से लाभान्वित होने के लिए क़दम बढ़ा रही है.

इस दिशा में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कई फ़ैसले किए हैं. चीन की महात्वकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड में भी नेपाल मदद कर रहा है.

कभी भारत नेपाल का मुख्य मददगार हुआ करता था और वहां की अर्थव्यवस्था इसका प्रभाव बड़ा था लेकिन यह अब धीरे-धीरे कम हो रहा है.

साल 2015 में भारत की अनौपचारिक नाकेबंदी के कारण नेपाल ज़रूरी सामानों की किल्लत से लंबे समय तक जूझता रहा था.

भारत ने यह नाकेबंदी नेपाल के नए संविधान पर मधेसियों की आपत्ति के कारण की थी. नेपाल के मधेसियों की जड़ें भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार से जुड़ी हुई हैं.

इस दौरान नेपाल की राजनीति में भारत के ख़िलाफ़ एक किस्म का ग़ुस्सा पनपा था और चीन ने इस मौक़े का खूब फायदा उठाया और सहानुभूति दिखाई.

भारत ने नेपाल के संविधान में बिना किसी संशोधन के ही नाकेबंदी ख़त्म की लेकिन तब तक हालात हाथ से निकल गए थे. 2018 में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली फिर से पीएम बने तो उन्होंने चीन के साथ कई समझौते किए.

नेपाल चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड में भी शामिल हो गया. सार्क देशों में भूटान को छोड़ सभी देश चीन की इस परियोजना में शामिल हो गए हैं. यह भारत के लिए तगड़ा झटका समझा गया.

भारत पर नेपाल की निर्भरता काम हो, इसके लिए भी वहां की सरकार ने कई फ़ैसले लिए हैं. उधर, चीन और नेपाल के बीच रेल लाइन भी बिछाई गई ताकि दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़े.

अपने पहले कार्यकाल में भी ओली ने चीन का दौरा किया था और उन्होंने ट्रांज़िट ट्रेड समझौते पर हस्ताक्षर किया था. ओली चाहते हैं कि चीन तिब्बत के साथ अपनी सड़कों का जाल फैलाए और नेपाल को भी जोड़े ताकि भारत पर से उसकी निर्भरता कम हो.

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क़र्ज़

नेपाल की मूलभूत संरचनाओं पर चीन बेतहाशा खर्च कर रहा है और यह खर्च नेपाल के क़र्ज़ के रूप में दिया जा रहा है.

हालांकि नेपाल इसे अपने विकास का ज़रिया समझता है. पिछले साल दिसंबर के महीने में नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली अमरीका के दौरे पर थे.

इस साल फ़रवरी में अमरीकी उप रक्षा सचिव जोए फेल्टर ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि नेपाल में चीनी निवेश नेपाल के हितों के लिए होना चाहिए न कि सिर्फ़ चीन के हितों की पूर्ति के लिए.

अगले दिन काठमांडू में चीनी राजदूत होउ यान्की ने अमरीका के इस बयान पर आपत्ति जताई थी और इसे हास्यास्पद क़रार दिया था.

हाउ यान्की ने एक सार्वजनिक समारोह में कहा था, यदि कोई देश विकासशील देशों के लिए सहायता प्रदान नहीं कर सकता है तो (इसे) कम से कम इन विकासशील देशों की सहायता करने से दूसरों को बाधित करने से बचना चाहिए."

उन्होंने अमरीका पर चीन और नेपाल के बीच मैत्रीपूर्ण सहयोग में हस्तक्षेप करने का भी आरोप लगाया था.

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