अमरीका और ईरान क्या युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं

  • 19 जून 2019
ईरान, अमरीका और खाड़ी: अब क्या? इमेज कॉपीरइट AFP/HO/IRIB

खाड़ी में तनाव गहराता जा रहा है. हाल में अमरीका ने एक वीडियो जारी किया है, जिसके ज़रिए वो दावा कर रहा है कि गुरुवार को ओमान की खाड़ी में दो टैंकरों पर हुए हमले के लिए ईरान ज़िम्मेदार है.

हालांकि अब भी घटना के बारे में बहुत कुछ सामने आना बाकी है. लेकिन ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ये सबूत सबकुछ साफ कर रहा है.

तो इससे सवाल उठ रहे हैं कि अब आगे क्या होगा: अमरीका इसका क्या जवाब दे सकता है? मामला बेहद गंभीर होता जा रहा है.

दावा किया जा रहा है कि पेंटागन की ओर से जारी किए गए धुंधले वीडियो में एक छोटा ईरानी जहाज़ नज़र आ रहा है और इस जहाज़ का क्रू गुरुवार को हमले का शिकार हुए दो टैंकरों में से एक के बाहरी हिस्से से विस्फोटक निकाल रहे थे.

इस मामले को लेकर ईरान और ट्रंप प्रशासन, दोनों ही एक दूसरे पर हमलावर हैं.

ईरान ने हमले में किसी भी तरह का हाथ होने की बात से इनकार किया है. इससे पहले मई में संयुक्त अरब अमीरात में भी जहाज़ों पर चार हमले हुए थे, तब भी ईरान ने उसमें अपना हाथ होने से इनकार किया था.

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अमरीका अब उन दोनों मामलों के लिए ईरान को ज़िम्मेदार बता रहा है. और इस बात का डर बढ़ गया है कि ये ज़ुबानी जंग, आमने-सामने की लड़ाई में बदल सकती है.

हाल में अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने सीधे तौर पर ईरान को हमलों के पीछे बताया.

उन्होंने कहा, "ये आकलन खुफ़िया जानकारी, हमले में इस्तेमाल हथियार, विशेषज्ञ जानकारी और ईरान की ओर से हाल में जहाजों पर किए गए ऐसे ही हमलों के आधार पर किया गया है. तथ्य ये भी है कि इस क्षेत्र में सक्रिय किसी भी समूह के पास वो संसाधन और महारत नहीं कि वो ऐसा कुछ कर सके."

ईरान ने इन आरोपों को खारिज करने में समय नहीं लिया. उसने ये भी कहा कि उसे जानबूझकर फंसाया जा रहा है.

ईरान के एक अधिकारी ने कहा, "कोई ईरान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच के रिश्ते ख़राब करने की कोशिश कर रहा है."

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अजीब घटनाक्रम?

पहली बार में अमरीकी नौसेना की ओर से जारी किया गया ये वीडियो ठोस सबूत लगता है. लेकिन ये कई सवाल भी खड़े करता है.

अमरीका के मुताबिक ये वीडियो पहले धमाके के ठीक बाद रिकॉर्ड हुआ, जब ईरानी क्रू हमले के सबूत मिटाने की कोशिश कर रहा था.

लेकिन हमले के बारे में अब भी बहुत कुछ सामने आना बाकी है. जैसे कि जहाज़ों से विस्फोटक कब बांधे गए.

इस इलाके में अमरीकी नोसैना की अच्छी-खासी मौजूदगी है. ऐसे में उसके पास वहां खुफिया सूचना इकट्ठा करने की अच्छी काबिलियत है.

इस मामले में बेशक अभी और जानकारी सामने आएगी और दोनों जहाज़ों को हुए नुकसान की फोरेंसिक जांच से भी कई सबूत मिलेंगे.

हालांकि अमरीका के ईरान पर आरोप हाल में हुए इन हमलों तक सीमित नहीं है.

पोम्पियो ने कहा था, "कुल मिलाकर ये बिना उकसावे वाले हमले अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सीधे तौर पर ख़तरा हैं. ये नौसंचालन की आज़ादी पर निर्मम हमले के तरह हैं. ये ईरान की ओर से तनाव बढ़ाने का अभियान है जिसे मंजूर नहीं किया जा सकता है."

ये बहुत गंभीर आरोप हैं और इससे सवाल उठता है कि अमरीका इस मामले में क्या करने की तैयारी में है?

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ठोस कूटनीतिक कार्रवाई एक तरीका हो सकता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान की निंदा करके और अतिरिक्त आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसे और ज़्यादा अलग-थलग किया जा सकता है.

लेकिन एक शक ये भी उठता है कि शायद ये प्रतिबंध मौजूदा स्थिति का कारण बने हों. ईरान पर दबाव बढ़ता जा रहा है, शायद ये दबाव इतना बढ़ गया कि रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प, जो ख़ुद को स्वायत्त नौसेना बल कहते हैं -उसने जवाब देने का फैसला किया हो.

तो अब क्या होगा? क्या अमरीका किसी तरह की जवाबी सैन्य कार्रवाई करेगा?

उसके खाड़ी के सहयोगी देश और दूर के सहयोगी देश इस पर क्या रुख दिखाएंगे? और सैन्य कार्रवाई का अंजाम क्या होगा?

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ख़तरनाक क़्त

अगर ईरान पर हमला किया गया, तो हो सकता है कि वो एक तरह का हाइब्रिड युद्ध छेड़ दे. मतलब वो छोटे-मोटे हमलों के साथ-साथ जहाज़ों और दूसरी जगहों पर बड़े हमले करने लगे.

साथ ही तेल के दाम और बीमा प्रीमियम बढ़ा दे. शायद इससे भी आगे की जवाबी कार्रवाई करे.

इनमें से कुछ भी हो सकता है. इसलिए किसी को नहीं लगता कि ईरान या अमरीका में से कोई भी पूरी तरह से युद्ध चाहता है.

अमरीकियों के पास शक्तिशाली सेना है, लेकिन हवा और समुद्र में ईरान से लड़ना उनके लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है.

और अब तक देखने में ये आया है कि राष्ट्रपति ट्रंप दूसरे देशों से ज़ुबानी जंग में तो लग जाते हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस सैन्य कार्रवाई करने से बचते हैं.

अमरीका ने सीरिया में जो हवाई हमले किए तो वो भी लगभग सांकेतिक ही थे.

अब डर ये है कि ईरान, स्थिति का ग़लत अदाज़ा लगाते हुए, अमरीकी प्रशासन को कड़े शब्दों में ये संदेश दे रहा है कि उसे किसी तरह की जवाबी कार्रवाई करनी होगी.

इसलिए ख़तरा है कि युद्ध योजना बनाकर तो नहीं होगा, लेकिन दुर्घटनावश ज़रूर हो सकता है.

ईरान और अमरीका सांकेतिक तौर पर एक दूसरे से अपनी बात कह तो रहे हैं, लेकिन उन्हें एक दूसरे का संदेश ठीक तरीके से मिल नहीं रहा.

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ईरान को लग सकता है कि अमरीका क्षेत्र में इसलिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, ताकि वो उसे डरा सके. और वो इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है.

ऐसा हो सकता है कि ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प इन संकेतों को ग़लत समझ रहा हो.

हो सकता है कि उन्हें लगा हो कि उन्हें खाड़ी के पानी में आने जाने की उससे ज़्यादा आज़ादी है, जितना कि अमरीका सोचता है.

दूसरे शब्दों में, उन्हें लग सकता है कि उनकी ताकत की परीक्षा लेने की कोशिश की जा रही है. इसलिए वो ऐसा कुछ कर रहे हैं, जिसे अमरीका और उसके सहयोगी सज़ा दिए बगैर नहीं छोड़ेंगे.

फ्रांस और जर्मनी जैसे अमरीका के कई सहयोगी सावधानी बरतने की हिदायत दे चुके हैं.

ब्रिटेन के विदेश मंत्री कह चुके हैं कि ब्रिटेन अमरीका पर भरोसा करता है, लेकिन वो अपने स्तर पर भी चीज़ों को देखेगा.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हम अपना स्वतंत्र आकलन खुद करेंगे. इसके लिए हमारा अपना एक तरीका है."

ट्रंप को कोई भी कार्रवाई करने से पहले ध्यान से सोचना होगा.

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ट्रंप ने जब अपना पद संभाला था तो कई विदेश नीति के विशेषज्ञों, जिनमें रिपब्लिकन भी शामिल थे, उन्होंने उनके प्रशासन के साथ काम करने से मना कर दिया था. उन्होंने कहा था कि विदेश नीति को लेकर ट्रंप का जो तरीका है, उससे किसी दिन संकट खड़ा हो जाएगा.

एक बार को लगा था कि उत्तर कोरिया या सीरिया के साथ उसका टकराव हो सकता है. लेकिन वो संकट टल गया.

लेकिन इस बार व्हाइट हाउस के सामने एक बड़ा संकट खड़ा है. इस पर उसका कोई भी कदम बहुत अहम होगा. ना सिर्फ मध्य पूर्व के लिए, बल्कि इससे अमरीका और खाड़ी के उसके सहयोगियों के बीच के रिश्तों पर भी गहरा असर पड़ेगा.

हालांकि उनमें से कइयों को ये नहीं पता कि इस राष्ट्रपति और इनकी अनोखी राजनयिक स्टाइल से कैसे निपटा जाए.

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