हॉन्गकॉन्ग क्या पूरी तरह से चीन का हो पाएगा

  • 20 जून 2019
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हॉन्गकॉन्ग के लिए मंगलवार की सुबह आम नहीं थी.

हॉन्गकॉन्ग की चीफ़ एग्जेक्युटिव यानी सबसे बड़ी नेता कैरी लैम लोगों से मुख़ातिब थीं.

संयत और विनम्र दिख रही कैरी लैम ने कहा, "मुझे निजी तौर पर ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेनी होगी. इस (प्रत्यर्पण) बिल की वजह से समाज में विवाद, टकराव और बेचैनी पैदा हुई. इसके लिए मैं हॉन्गकॉन्ग के लोगों से तहे दिल से माफ़ी मांगती हूं."

15 जून को कैरी लैम हॉन्गकॉन्ग के लोगों का ग़ुस्सा शांत करने के लिए विवादों में घिरे प्रत्यर्पण बिल को निलंबित करने का एलान कर चुकी थीं.

हॉन्गकॉन्ग में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था जब प्रशासन ने बढ़ाने के बाद क़दम पीछे खींचे हों.

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बिल का विरोध क्यों?

चीन समर्थित सीईओ ने झुकने का संकेत दिया, फिर भी हॉन्गकॉन्ग के आम लोग समझौते के मूड में नहीं थे. रविवार (16 जून) को हॉन्गकॉन्ग में लेजिस्लेटिव काउंसिल की ओर जाने वाली सड़कों पर लोगों का हुजूम था. स्टेशन पूरी तरह जाम थे और कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं थी.

प्रदर्शनकारी उस बिल की पूरी तरह विदाई चाहते थे जिसमें ये प्रावधान प्रस्तावित है कि हॉन्गकॉन्ग के लोगों को मुक़दमा चलाने के लिए चीन प्रत्यर्पित किया जा सकता है.

सरकार की दलील थी कि सिर्फ़ गंभीर और आपराधिक मामलों के अभियुक्तों को ही चीन भेजा जाएगा और हॉन्गकॉन्ग के एक जज की मंजूरी के बाद ही प्रत्यर्पण होगा, लेकिन लोग इस बिल को हॉन्गकॉन्ग की 'स्वायत्तता पर हमले' के तौर पर देख रहे हैं. इसे राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने का औज़ार माना जा रहा है.

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हॉन्ग कॉन्ग में एक क़ानून के ख़िलाफ़ भारी विरोध प्रदर्शन

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर अलका आचार्य उस फ़िक्र की बात करती हैं, जिसे लेकर हॉन्गकॉन्ग के लोग सड़कों पर उतरे.

अलका आचार्य कहती हैं, "लोगों की नज़र में ये है कि और कोई तरीक़ा नहीं मिला तो वो इस तरह से क़ानून बना रहे हैं. ऐसे क़ानून से हॉन्गकॉन्ग पर बीजिंग की पकड़ और मज़बूत होगी. मुझे लगता है कि एक उबाल जो धीरे-धीरे उठता है, वो इस बिल से उमड़ पड़ा."

ऐसा उबाल हॉन्गकॉन्ग ने पहले कभी नहीं देखा था. दुनिया भर का ध्यान खींचने वाले 2014 के 'अंब्रेला मूवमेंट' के दौरान भी नहीं.

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जब लोगों ने दिखाई ताक़त

आयोजकों का दावा है कि रविवार को रिकॉर्ड 20 लाख लोग विरोध प्रदर्शन के ज़रिए ये कहने आए थे कि वो प्रत्यर्पण बिल को निलंबित करने भर से ख़ुश नहीं हैं. वो चाहते हैं कि ये बिल पूरी तरह विदा हो जाए.

हॉन्गकॉन्ग पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की संख्या तीन लाख तीस हज़ार के क़रीब बताई. लेकिन तस्वीरें आयोजकों के दावों के क़रीब दिख रही थीं. लोगों का जोश हैरान करने वाला था और हैरानी की एक वजह ये थी कि बीते बुधवार को ही प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच ज़ोरदार झड़प हुई थी.

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क्यों पीछे हटा चीन?

बुधवार के प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारी पुलिस से मुक़ाबले की तैयारी के साथ आए थे.

पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे तो प्रदर्शनकारियों ने भी जवाब दिया. वो मास्क, दस्ताने और हेलमेट पहने थे. प्रदर्शन के दौरान घायल हुए लोगों का इलाज कर रहे थे. सब कुछ संगठित तौर पर हो रहा था.

बीजिंग में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता की राय है कि इस संगठित विरोध ने ही हॉन्गकॉन्ग प्रशासन और चीन को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया.

वो कहते हैं, "हॉन्गकॉन्ग में जो लेजिस्लेटिव काउंसिल है, उसमें स्वतंत्र लोगों की जगह कम्युनिस्टों को डाल दिया गया है. आज वहां कम्युनिस्ट पार्टी का बहुमत है. अगर ये बिल काउंसिल में आता तो पारित हो जाता. सिर्फ़ सड़क ने इसे रोका है."

लेकिन, हॉन्गकॉन्ग में आंदोलनकारी कोई पहली बार सड़क पर नहीं उतरे हैं. साल 2014 में ज़्यादा लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग के साथ 'ऑक्यूपाई सेंट्रल प्रोटेस्ट' हुआ था. जहां आंदोलनकारियों ने पुलिस के आंसू गैस हमले से बचने के लिए छाते थामे और इसे अंब्रेला मूवमेंट का नाम मिल गया. तब आंदोलनकारी 79 दिन तक सड़क पर थे. लेकिन सरकार नहीं झुकी.

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प्रोफ़ेसर अलका आचार्य दोनों आंदोलनों के बीच का अंतर समझाते हुए कहती हैं, "अंब्रेला मूवमेंट में स्वायत्तता की बात इस तरह सामने नहीं आई लेकिन प्रत्यर्पण का मतलब ये है कि बीजिंग को हक़ रहेगा कि वो किसी भी व्यक्ति को, जिसके ख़िलाफ वो कार्रवाई करना चाहते हैं, प्रत्यर्पण का केस दायर कर चीन बुलवा सकते हैं. ये राजनीतिक स्वायत्तता पर सीधा हमला है."

हॉन्गकॉन्ग 1841 से 1997 तक ब्रिटेन की कॉलोनी था. ब्रिटेन ने उसे 'वन कंट्री टू सिस्टम' यानी एक देश और दो प्रणाली समझौते के तहत चीन को सुपुर्द किया. ये क़रार हॉन्गकॉन्ग को वो आज़ादी और लोकतांत्रिक अधिकार देता है, जो चीन के लोगों को हासिल नहीं है.

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दौलत के ज़रिए चीन का दांव

सैबल दासगुप्ता की राय है कि हॉन्गकॉन्ग के लोग चीन के साथ आकर ख़ुश नहीं हैं लेकिन चीन दौलत के दम पर एक तबके की राय बदलने में कामयाब हो रहा है.

सैबल दासगुप्ता का आकलन है, "1997 में जब से हॉन्गकॉन्ग चीन के पास आया, तब से हॉन्गकॉन्ग के लोग नाराज़ हैं. आप कभी भी हॉन्गकॉन्ग जाइये, दुकानदार या फिर किसी और से बात कीजिए, उनको बस उनका लोकतंत्र और आज़ादी चले जाने का डर है. सारे आंदोलन यही बताते हैं. लेकिन उसके साथ हुआ ये है कि चीन के व्यापारी हॉन्गकॉन्ग में इतनी ज्यादा मात्रा में पैसे डालते हैं और चीन के पर्यटक इतनी बड़ी मात्रा में ख़रीदारी करते हैं कि हॉन्गकॉन्ग के व्यापारी चीन के समर्थक होने लगे. उन्हें लगा कि लोकतंत्र जाए भाड़ में यहां कमाई हो रही है. इतनी कमाई उन्होंने सपने में भी नहीं देखी."

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टकराव से चीन को नुक़सान

लेकिन हॉन्गकॉन्ग में हर कोई स्वायत्तता की क़ीमत लगाने को तैयार नहीं. प्रत्यर्पण बिल के पहले भी हॉन्गकॉन्ग के लोग चीन की सख्ती पर ग़ुस्सा दिखा चुके हैं.

चीन के राष्ट्र गान के प्रति असम्मान ज़ाहिर करने पर दंडित करने का क़ानून, लोकतंत्र और आज़ादी समर्थक विधायकों की सदस्यता ख़ारिज करने और आज़ादी समर्थक कार्यकर्ताओं को जेल में डालने का विरोध होता रहा है और इस बार तो विरोध की सारी हदें ही टूट गईं.

अब चीन को महसूस हुआ कि टकराव का रास्ता उसका बड़ा नुक़सान कर सकता है.

सैबल दासगुप्ता कहते हैं, "हॉन्गकॉन्ग की एक और अहमियत है. चीन का जो पूरा वित्तीय बाज़ार है उसका बहुत बड़ा हिस्सा हॉन्गकॉन्ग में है. ये समझिए कि बड़ी-बड़ी चीनी कंपनियों का 40 से 50 प्रतिशत तक स्टॉक हॉन्गकॉन्ग में लिस्टेड हैं. शंघाई और शिनजेन में कम हैं. हॉन्गकॉन्ग में ज़्यादा है."

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वो आगे कहते हैं, "लोकतंत्र की चाहत अगर आप दबा देते तो वित्तीय बाज़ार टूट जाएगा. चीन के बाज़ार पर ही इसका असर होगा. इसलिए चीन को लगा कि उन्होंने जल्दीबाज़ी की है."

अलका आचार्य चीन के मौजूदा रुख़ को अप्रत्याशित बताती हैं. वो कहती हैं कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की छवि एक मज़बूत नेता की है. वो किसी मुद्दे पर झुकना पसंद नहीं करते. लेकिन इस बार चीन को पीछे हटने में दिक्क़त नहीं हुई.

अलका आचार्य कहती हैं, "सिंगापुर में जब शांगरीला डॉयलॉग हुआ था, तब वहां चीन के रक्षा मंत्री से इस बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि इसमें चीन का कोई हाथ नहीं है और बीजिंग की ओर से कोई निर्देश नहीं जा रहे हैं. इससे संकेत मिला कि चीन शायद इस मामले से थोड़ी दूरी बनाए रखेगा."

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विवाद से किसे क्या मिला?

लेकिन क्या चीन ने अपनी हार मान ली है? संकेत कुछ और कहते हैं. हॉन्गकॉन्ग के प्रदर्शनकारी बिल के पूरी तरह ख़ात्मे और सीईओ के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.

चीन ने सीईओ कैरी लैम के प्रति समर्थन ज़ाहिर किया है. कैरी लैम ने माफ़ी तो मांग ली है लेकिन ये वादा नहीं किया है कि बिल दोबारा नहीं आएगा. अलका आचार्य की राय है कि चीन इस बिल को दोबारा पेश ज़रूर कराएगा.

सैबल दासगुप्ता भी ऐसा ही सोचते हैं. वो कहते हैं, "मुझे पूरा भरोसा है कि कम्युनिस्ट पार्टी नाक बचाएगी और इसे वापस लाएगी. उन्होंने थोड़ी जल्दीबाज़ी कर दी है लेकिन धीरे-धीरे आज़ादी की जो पुकार है उसे तोड़ने का मक़सद है. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो चीन के अंदर आज़ादी की पुकार आ जाएगी. ताइवान, जापान, मलेशिया हर जगह परिवर्तन हो रहे हैं. वियतनाम में साम्यवाद ख़त्म हो रहा है. चीन सरकार को सब पता है. वो क़रीबी निगाह रखे हुए हैं. वन पार्टी सिस्टम ही उनकी ताक़त है. कुछ लड़कों को तोड़ दिया जाएगा. बाक़ी से मनवा लेंगे. एक कच्चा बिल आएगा. अपनी नाक बचाएंगे और फिर धीरे-धीरे उसमें संशोधन होता जाएगा. पता ही नहीं चलेगा कि अजगर कब सामने आ गया."

ये अजगर हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता निगलना चाहेगा. रविवार को विरोध की आग से चीन की चिंता बढ़ाने वाला हॉन्गकॉन्ग क्या इस चुनौती को भी राख कर पाएगा. जवाब भविष्य की कोख में है.

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