ईरान परमाणु समझौता: क्या किसी तरह इसे बचाया जा सकता है?

  • 8 जुलाई 2019
ईरान का बुशहर परमाणु प्लांट इमेज कॉपीरइट EPA

क्या ईरान परमाणु समझौता बाधाओं के चलते ख़त्म होने को अभिशप्त है या वास्तव में ये कबका ख़त्म हो चुका है और कोई इस बात को स्वीकार नहीं कर रहा है?

एक साल पहले अमरीका ने इस समझौते से खुद को एकतरफ़ा अलग कर लिया था. अब ईरान समझौते की शर्तों का लगातार उल्लंघन कर रहा है. पहले, समझौते में यूरेनियम इकट्ठा करने की निर्धारित मात्रा बढ़ा कर और अब यूरेनियम के संवर्द्धन स्तर को स्वीकृत 3.6% शुद्धता सीमा पार कर.

ईरान ने घोषणा की है कि वो समझौते के कुछ प्रावधानों का तबतक उल्लंघन करेगा जबतक उसकी चिंताएं दूर नहीं की जातीं.

तेहरान का संदेश साफ़ है. उसका कहना है कि इस महीने तक वो समझौते का पूरी तरह पालन कर रहा है, जिसे जेसीपीओए के नाम से जाना जाता है.

हालांकि व्हाइट हाउस के दावों से उलट इसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र परमाणु निगरानी संस्था इंटरनेशनल एटोमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) ने भी की है.

लेकिन अमरीकी प्रतिबंधों को दोबारा लागू करने का मतलब है कि ईरान की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. ईरान का कहना है कि इस समझौते के तहत जो आर्थिक लाभ उसे मिलने चाहिए वो नहीं मिल रहे हैं.

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Image caption क्या ऐतिहासिक 2015 का परमाणु समझौता ख़त्म हो चुका है?

और ईरानी चाहते हैं कि इस दबाव को कम करने में यूरोपीय देश किसी तरह मदद करें.

खास़कर ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी इस समझौते में हैं लेकिन वॉशिंगटन और तेहरान के बीच उनकी स्थिति असहाय हो गई है.

वे इस समझौते को जारी रखने के हक़ में हैं. बहुत धीमी गति से ही, उन्होंने अमरीकी प्रतिबंधों से बाहर आने वाले मानवीय मदद के लिए तेहरान को भुगतान दिए जाने का तंत्र बनाया है.

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Image caption साल 2015 में ईरान ने चीन, फ़्रांस, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमरीका के साथ परमाणु समझौता किया था.

यूरोपीय देश भी चिंतित

लेकिन ईरान के लिए इतना काफ़ी नहीं है. वो चाहता है कि उसकी अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों जैसे तेल और धातु को अमरीकी दबाव से मुक्त किया जाए, जोकि यूरोपीय देश नहीं करा सकते.

उनकी कोशिशों का बहुत साफ़ मतलब है लेकिन ये परमाणु समझौते पर अपना समर्थन दिखाने की राजनयिक चाल से अधिक नहीं दिखती है.

अंततः तो ये निजी कंपनियों पर निर्भर करता है कि वो ख़तरा मोल लेकर ईरान से व्यापार करती हैं या नहीं, न कि सरकारों को ये करना है.

यही वो हालात हैं जो तभी से साफ़ हो गए थे जब अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इस समझौते से अलग हो गए थे.

हालांकि जेसीपीओए पर अमरीका और इसके यूरोपीय सहयोगी देशों में तीखे मतभेद हैं लेकिन वास्तविकता है कि ईरान को लेकर इन सबकी एक जैसी चिंताएं हैं यानी इसकी परमाणु गतिविधियां, इसके मिसाइल कार्यक्रम और इलाक़े में इसका व्यवहार.

अमरीकी ड्रोन को मार गिराना और तेल के टैंकरों पर हमले जैसे खाड़ी में होने वाली छिटपुट घटनाएं डर और बढ़ाती हैं. लेकिन देखा जाए तो दो अलग अलग रणनीति यहां काम कर रही है.

शुरुआती रुख़ था कि ओबामा प्रशासन और परमाणु समझौते को संपन्न कराने वाले इसके सहयोगी- रूस और चीन को प्राथमिकता दी जाए.

ईरान का परमाणु कार्यक्रम जारी था. हो सकता है कि इसने अपने स्पष्ट सैन्य इरादे त्याग दिए लेकिन इसके पास पूरी जानकारी थी और इसने तेजी से दोबारा कार्यक्रम शुरू करने की क्षमता बनाए रखी.

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समझौता कितना बाकी?

मक़सद था समझौते के सहारे कुछ समय के लिए परमाणु गतिविधियों को रोकना या सीमित करना. समझौता बिल्कुल भी आदर्श नहीं था लेकिन उस समय माना गया कि न होने से तो अच्छा है कि कोई समझौता हो जाए. और आज भी अमरीका को छोड़कर इस पर हस्ताक्षर करने वाले बाकी देशों का यही मानना है.

इसे पीछे विचार था कि फौरी संकट को रोका जाए. याद रखना चाहिए कि जब समझौता हुआ तो उस समय ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमरीकी और इसराईली सेना के हमले की प्रबल आशंका बनी हुई थी.

इस बीच ये उम्मीद की गई थी कि हो सकता है कि ईरान में कुछ बदलाव आए.

ट्रंप के लिए ये पूरा समझौता बेकार था. वो बस इससे बाहर निकलना चाहते थे. इसकी बजाय वो अधिकतम दबाव डालने की नीति अपना रहे हैं, जिसका लक्ष्य अस्पष्ट है.

उनके प्रशासन के कुछ अधिक बड़बोले लोग तेहरान में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं. जबकि बाकियों का तर्क है कि ईरान को एक नए समझौते के लिए मजबूर किया जाए, जो पहले से अधिक कड़ा परमाणु समझौता हो.

लेकिन सिर्फ अमरीका ही नहीं बल्कि इसके सहयोगी भी नहीं जानते कि राष्ट्रपति के दिमाग में क्या चल रहा है. हाल ही में वॉशिंगटन में ब्रिटेन के राजदूत का एक संदेश लीक हुआ जिसमें उन्होंने ट्रंप की ईरान नीति को बहुत अराजक बताया था.

लेकिन इन सारी चीजों के बीच सवाल उठता है कि कितने उल्लंघन के बाद दस्तावेज को बेकार मान लिया जाए?

या यूं कहें कि आप कब ये दिखाना बंद करेंगे कि नहीं अभी परमाणु समझौते में दम बाकी है?

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Image caption ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले ईरान परमाणु समझौते का विरोध किया था.

यूरोप कबतक बचाएगा?

यूरोप जेसीपीओए को ज़िंदा बनाए रखने का संघर्ष कर रहा है. हो सकता है कि अमरीकी दबाव की भरपाई करने की यूरोपीय क्षमता के बारे में ईरान ग़लत साबित हुआ हो.

हालांकि समझौते के उल्लंघन संबंधित ईरान की नई घोषणा की गर्मी को शांत करने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुअल मैक्रों ने सभी पक्षों के बीच फिर से बातचीत शुरू करने का एक सप्ताह का समय घोषित कर दिया.

लेकिन संभवतया इसकी बहुत कम और शायद न के बराबर उम्मीद है.

कार्रवाई के लिए अतिरिक्त 60 दिन की समय सीमा की घोषणा कर ईरान तेजी से बदलते घटनाक्रम पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा है.

ये समझना मुश्किल है कि इस समझौते से पूरी तरह अलग होने में ईरान को क्या फ़ायदा होने वाला है.

बहुत कुछ परिवर्तन होने वाला है, इसकी बहुत कम ही संभावना है. यूरोप की हालत ब्रिटेन की बच्चों की उस मशहूर फ़िल्म की तरह है जिसमें एक टॉय ट्रेन अंतिम छोर पर जा रही है और फ़िल्म का किरदार दुर्घटना रोकने के लिए बेतहाशा उसके सामने बारी-बारी से ट्रैक का एक एक टुकड़ा बिछाता जा रहा है.

यूरोपीय देशों के लिए सवाल ये है कि उनका ट्रैक कब ख़त्म होगा?

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