ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध का तेल बाज़ार पर क्या है असर?

  • 28 जुलाई 2019
ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध से तेल बाज़ार में अस्थिरता, बड़ी मंदी की आशंका इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमरीका और ईरान के बीच बढ़े तनाव का तेल बाज़ार पर उतना असर नहीं पड़ा जितनी आशंका थी.

पिछले कुछ वक़्त से दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं. ख़ासकर तब, जब तेल टैंकरों पर हमला हुआ और अमरीका ने इसके लिए ईरान को ज़िम्मेदार ठहराया.

इस घटना के बाद दुनिया में तेल आपूर्ति पर कुछ वक़्त के लिए ख़तरा मंडराया ज़रूर था और तेल की क़ीमतों में 2.2 फ़ीसदी उछाल भी देखा गया. मगर जल्द ही यह सामान्य भी हो गया.

तेल के दाम इसलिए भी जल्दी सामान्य हो गए क्योंकि व्यापारियों, निवेशकों और उपभोक्ताओं की चिंता तेल के दामों से हटकर कमज़ोर होती अर्थवव्यस्था पर टिक गई थी.

इधर एशिया, अमरीका की गतिविधियों पर क़रीब से नज़र बनाए हुए था जिसकी नीतियों से दुनिया में तेल की मांग निर्भर करती है. उधर, अप्रैल के आख़िरी दिनों से ही अमरीका दुनिया भर में ईरान का तेल निर्यात कम करने की कोशिशों में जुटा था.

अमरीका-ईरान तनाव

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एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं को होर्मूज़ की खाड़ी में बढ़ती सैन्य गतिविधियों को देखते हुए तैयार हो जाना चाहिए.

ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है कि क्योंकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की ज़्यादातर अर्थव्यस्थाएं तेल के आयात पर निर्भर हैं.

सबसे ताज़ा टैंकर हमलों में से एक में जापान के जहाज़ को निशाना बनाया गया, जिसके बाद तनाव कम करने के लिए जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने ख़ुद ईरान का दौरा किया और ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी को सार्वजनिक रूप से ये कहने के लिए ज़ोर दिया कि ईरान परमाणु समझौते को लेकर बने जॉइंट कंप्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन (जेसीपीओए) को लेकर प्रतिबद्ध है.

लेकिन इन हमलों से ईरान और अमरीका के संबंधों में सुधार की जो भी थोड़ी-बहुत गुंजाइश थी, वो धूमिल हो गई.

इन हमलों से सहयोगी देशों के लिए यह बात भी साफ़ हो गई कि ईरान और अमरीका के बीच कोई अन्य देश ठीक से मध्यस्थता नहीं कर सकता.

अमरीका ईरान के बीच बढ़ते विवाद को हवा दी संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों द्वारा लीक हुई उस जानकारी ने, जिसमें बताया गया कि ज़रूरत पड़ने पर अमरीका ईरान के एक परमाणु संयत्र पर 'रणनीतिक कार्रवाई' की योजना बना रहा है.

इतना ही नहीं, लीक हुई जानकारी से ये भी पता चला है कि रिपब्लिकन सीनेटर सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं. अब बाज़ार और एशिया में तेल के ख़रीदार ये जानना चाहते हैं कि इन उकसावों की वजह क्या है.

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अमरीका ने 22 अप्रैल को भारत, दक्षिण कोरिया, चीन और जापान जैसे देशों के ईरान से तेल आयात करने पर मिलने वाली छूट को ख़त्म करने का निर्णय ले लिया. मई में इस छूट की समयावधि ख़त्म होने के साथ ही एशिया के बड़े ख़रीदार डगमगा गए.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के ईरान के साथ एकतरफ़ा परमाणु क़रार तोड़ने से ठीक पहले अप्रैल 2018 में ईरान से प्रति दिन 28.7 लाख बैरल कच्चा तेल निर्यात होता था जो सितंबर के आते-आते 19 लाख बैरल पर पहुंच गया, क्योंकि ख़रीदारों को जबरन वहां से आयात करने से रोका गया. इस साल मध्य अप्रैल तक यह गिरावट 10 लाख बैरल तक पहुंच गई.

यूरोपीय देशों में ईरान से तेल निर्यात में आई कमी को शुरू-शुरू में सऊदी अरब और इराक़ ने पूरा करने की कोशिशें कीं और रूस ने भी चीन को किए जाने वाले तेल के अपने निर्यात में 50 फ़ीसदी तक की वृद्धि की.

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अमरीकी उत्पादन तेज़ी से बढ़ा

एशियाई तेल ख़रीदारों ने ईरान से अपने तेल की ख़रीद को पूरी तरह से ख़त्म करने में लंबा वक्त लिया जबकि यूरोप ने अन्य ओपेक देशों से आयात कर इसका उचित समाधान निकाल लिया. लिहाजा वहां क़ीमतों पर इसका असर बेहद कम हुआ.

जहां एक तरफ़ ईरान से तेल की आपूर्ति कम होती गई वहीं दूसरी ओर अमरीकी उत्पादन में लगातार वृद्धि हुई. अमरीकी तेल उत्पादन मई में 104.6 लाख बैरल प्रति दिन हो गया. वर्तमान में यह 121 लाख बैरल तक पहुंच गया है.

अमरीकी तेल के हज़ारों बैरल यूरोप ख़रीद रहा है तो चीन ने भी अप्रैल के आखिर में अमरीका से आयात करना शुरू कर दिया.

अमरीकी तेल ईरान के तेल के मुक़ाबले हल्के और स्वीट ऑयल हैं, लिहाजा ख़रीदारों के लिए ये सीधे विकल्प नहीं हो सकते.

दुनिया भर में मीडियम सॉर क्रूड ऑयल के सबसे बड़े उत्पादक ईरान के पास इसके निर्यात की 45 फ़ीसदी हिस्सेदारी थी.

अब हालांकि अमरीकी प्रतिबंधों के बाद मीडियम सॉर क्रूड की बाज़ार में कमी से असंतुलन ज़रूर बढ़ा है, लेकिन वर्तमान क़ीमतों में अभी इस कमी का असर नहीं हुआ है.

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एशियाई मांग और अर्थव्यवस्था के ट्रेंड

दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से चार एशिया में हैं- चीन, भारत, जापान और उत्तर कोरिया.

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पिछले दो दशकों में वैश्विक तेल की मांग में वृद्धि हुई है. चीन और भारत जैसे बाज़ारों में तेल की ज़रूरतों में किसी भी तरह के उतार-चढ़ाव का मांग पर बड़ा असर पड़ता है.

अप्रैल के महीने में चीन में प्रति दिन तेल का आयात 106.4 लाख बैरल पर पहुंच गया था, क्योंकि कंपनियों ने तेल इकट्ठा करना शुरू कर दिया था. जापान, दक्षिण कोरिया और भारत ने भी प्रतिबंध पूरी तरह लागू होने से पहले ईरानी कच्चे तेल के मामले में ऐसा ही किया.

कुछ समय के उछाल के बाद अब बाज़ार मंदी की ओर बढ़ रहा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने अपनी वार्षिक मांग वृद्धि के अनुमान को 12 लाख बैरल प्रतिदिन बताया है जो पहले के 16 लाख बैरल प्रतिदिन के अनुमान से कम है.

ओपेक की वार्षिक मांग वृद्धि का अनुमान 11.2 लाख बैरल प्रतिदिन पर आ गया. आशंका है कि इसमें और गिरावट होगी. वहीं एशिया-प्रशांत देशों में यह मांग वृद्धि शून्य की ओर जा रही है.

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अमरीका-चीन व्यापार युद्ध और बदलते कारोबारी ट्रेंड के प्रभाव से ईंधन की खपत में कमी आनी शुरू हो गई है और प्रमुख निर्यातकों के लिए मंदी का डर पैदा हो गया है.

छह महीने तक सिकुड़ते कारोबार के बाद दक्षिण कोरिया में विदेशी बिक्री मई में 9.4 प्रतिशत गिर गई. जापान के मई के निर्यात में सालाना आधार पर 7.8 प्रतिशत की गिरावट आई है.

चीन का निर्यात साल-दर-साल मई तक 1.1 प्रतिशत तक बढ़ा है लेकिन उसके आयात में 8.5 प्रतिशत की कमी आई है. बाज़ार के हालात अच्छे नहीं हैं.

अमरीका ने 250 अरब डॉलर के चीनी निर्यात पर 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया, फिर चीन ने भी अमरीका को उसी की भाषा में जवाब दिया.

इसके चलते कर्ज़ नई ऊंचाई पर पहुंच गया है. मई में निर्यात के सकारात्मक आंकड़े आने के बावजूद भी औद्योगिक उत्पादन और संबंधित सूचकांक पिछले जून से नीचे जा रहा है.

यहां मई में निर्यात 3.93 प्रतिशत ऊपर रहा है लेकिन व्यापार घाटा भी बढ़ रहा है.

वैश्विक शिपिंग उद्योग उच्च सल्फ़र ईंधन के 40 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक की खपत करते हैं. ईंधन मानकों में नियम परिवर्तन से उस मांग का तीन-चौथाई हिस्सा ख़त्म हो जाएगा, जिससे लाइट और स्वीट ऑयल की खपत बढ़ रही है जो अमरीका में उत्पादित होता है.

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इसके बाद क़ीमतों में गिरावट के आसार हैं, लेकिन एक बार बदलाव होने के बाद अमरीकी उत्पादन में वृद्धि जारी रहने से क़ीमतों में जोरदार गिरावट आएगी.

ईरान ने जून में एक अमरीकी ड्रोन को मार गिराया था, फिर भी अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने दावा किया कि होर्मूज़ की खाड़ी खुली रहेगी.

इसके बंद होने से सऊदी अरब की अबक़ीक़ ऑयल प्रोसेसिंग फैसिलिटी को नुकसान हो सकता है और इससे बाज़ार में अनिश्चितता बढ़ सकती है. अकेले अबक़ीक़ में लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन के हिसाब से सल्फ़र और गैस को शुद्ध करने की क्षमता है.

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चीन की प्रतिक्रिया

बीजिंग ने मई की शुरुआत में अमरीकी तेल प्रतिबंधों को नज़रअंदाज़ करने का संकेत दिया था. इसकी वजह मीडियम सॉर क्रूड आपूर्ति तक निरंतर पहुंच को सुनिश्चित करना और तेहरान से जुड़ी अमरीकी नीतियों को कमज़ोर करना था.

तनावपूर्ण व्यापार वार्ता के बीच, वॉशिंगटन ने शिपमेंट पर नज़र रखने के लिए चेतावनी दी. चीन के राष्ट्रीय पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (सीएनपीसी) के स्वामित्व वाली एक वित्तीय संस्था बैंक ऑफ़ कुनलुन ने तुरंत इस बात से इनकार कर दिया था कि पोत उसका नहीं है जबकि ये रिपोर्ट थीं कि ये पोत उसने ज़ब्त कर लिया है.

बीजिंग ने कच्चे तेल की आपूर्ति पर सख़्त रुख़ नहीं अपनाया लेकिन इस तथ्य को छुपाने के लिए दूसरे तरीक़े का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.

उसने ईरान से लिक्विफ़ाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का आयात जारी रखा है. हीट पैदा करने के लिए एलपीजी के कई इस्तेमाल हैं. इसे कारों के लिए वैकल्पिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और इसे प्लास्टिक के उत्पादन में बेस देने वाले ओलेफ़िन में भी बदला जा सकता है.

चीन ने मई में कथित तौर पर ईरान से एलपीजी के ख़रीद में 346,000 टन या 80 प्रतिशत तक कमी की. चीन ने अमरीका के साथ व्यापार युद्ध के दौरान अमरिकी एलपीजी निर्यात पर 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया था.

नेशनल ईरानियन टैंकर कंपनी के स्वामित्व वाले एक टैंकर ने 20 जून को पेट्रोचाइना के स्वामित्व वाली एक रिफ़ाइनरी को कथित तौर पर 10 लाख बैरल एलपीजी की आपूर्ति की, आने वाले हफ़्तों में और टैंकर आने की उम्मीद थी.

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चीन ईरान पर लगाए अमरीकी प्रतिबंधों को कमज़ोर करता नहीं दिखता है. मई में एलपीजी की ख़रीद गिर कर लगभग 80 मिलियन डॉलर हो गई, अब कच्चे तेल की ख़रीद भी पहले के स्तर पर नहीं आने की संभावना है. वहीं तेल बाज़ार में अस्थिरता को रोकने के लिए होने वाली बातचीत में ओपेक और रूस अपनी भूमिका निभाते रहेंगे.

चीनी टेक्नोलॉजी कंपनी हुवावे पर अमरीकी प्रतिबंध चीनी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे नया झटका है. कंपनी का अनुमान है कि इससे उसे 30 अरब डॉलर तक का नुकसान होगा. कुल मिलाकर चीन के एजेंडे में ईरान का महत्व राजनीतिक कारणों से है.

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जापान की प्रतिक्रिया

जापान ने अप्रैल में ही ईरान से आयात को 3 फ़ीसदी तक कम कर लिया था. अमरीका के साथ लंबे समय से चले आ रहे सुरक्षा संबंधों को देखते हुए जापान अपनी नीति को बदलने की स्थिति में नहीं दिखता है.

उसने अपने आयात ईरान की जगह मध्य पूर्व के अन्य देशों से करने का विकल्प चुना है. जापान की सबसे बड़ी रिफ़ाइनरी जेएसटीजी होलडिंग्स ने 2040 तक देश में तेल की ज़रूरतों को आधा करने का लक्ष्य रखा है, इसके लिए वो दैनिक खपत को 20 लाख बैरल से भी कम रखेगा.

प्रमुख जापानी कंपनियों के बीच व्यापक रूप से साझा सहमति के कारण जापान के तेल आयातकों पर देश की ऊर्जा ज़रूरतों को लेकर दबाव अपेक्षाकृत कम है.

साथ ही वहां प्रमुख तेल कंपनियों के बीच इस पर भी आम सहमति है कि बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भरता को कम करने और जलवायु परिवर्तन के जोख़िम को देखते हुए अक्षय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना ज़रूरी है.

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कम दबाव के बावजूद, प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने मध्य पूर्व से तेल के निर्यात को लेकर होने वाली किसी भी टकराव की स्थिति को रोकने में भूमिका निभाने की मांग की है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के लगातार टोक्यो दौरे के बाद प्रधानमंत्री आबे ईरान के राष्ट्रपति आयतुल्ला ख़ामेनी के साथ मध्यस्थ बनने के लिए राज़ी हुए.

लेकिन अब 13 जून को ईरान के तटीय इलाक़े के पास हुए हमलों में दो तेल टैंकरों को जो नुक़सान पहुंचाया गया था उनमें से एक जापानी तेल टैंकर था. ऐसे में आबे का दौरा धरा का धरा रह गया. अब जापान अगला क़दम क्या उठायेगा इस पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.

उधर ईरान ने हवाई क्षेत्र के उल्लंघन का हवाला देते हुए दो अमरीकी ड्रोन को मारने का दावा किया तो ट्रंप ने जवाबी हमले का आदेश दिया था लेकिन हमला किये जाने से ठीक पहले इसे रोक दिया गया.

अगली सुबह ट्रंप ने ट्वीट किया कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं रख सकता. यानी अब आबे की मध्यस्थता के प्रयासों को शुरू करने की कोई जगह नहीं है.

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दक्षिण कोरिया की प्रतिक्रिया

ईरान से तेल आयात करने की समयसीमा में मिली छूट से पहले ही दक्षिण कोरिया ने मार्च तक अपने आयात को 12 फ़ीसदी कम करते हुए 285,000 बैरल प्रति दिन तक ला दिया था.

फिर मई में दक्षिण कोरिया ने तेल के आयात पर पूरी रोक लगा दी. सऊदी अरब, क़तर और अमरीका से हुई आपूर्ति ने उस कमी को पूरा कर दिया.

इस बीच दक्षिण कोरिया ने गैर-मध्य-पूर्व देशों से तेल की आपूर्ति को लेकर आयात भाड़े में छूट को 2021 तक बढ़ा दिया. दक्षिण कोरिया ईरान के कॉन्डेन्सेट और अल्ट्रालाइट पेट्रोलियम उत्पादों का सबसे बड़ा ख़रीदार रहा है.

अब दक्षिण कोरिया अमरीकी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर है. हालांकि, दक्षिण कोरिया ने ईरान में मानवीय सहायता में सहयोग करने का आग्रह किया है.

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भारत की प्रतिक्रिया

शुरुआती अंदेशा था कि भारत ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करेगा लेकिन अमरीकी फ़ैसले के एक महीने के भीतर ही इसने वहां से कच्चे तेल की ख़रीद को समाप्त करने की घोषणा कर दी.

भारत की तेल कंपनियों के लिए ईरान बेहद महत्वपूर्ण भागीदार रहा है क्योंकि भारतीय तेल कंपनियों को ईरान लंबी अवधि के लिए क्रेडिट ख़रीद और सस्ती दरों पर ढुलाई की पेशकश करता रहा है.

अब ईरान से होने वाली तेल की आपूर्ति का आधा हिस्सा भारत सऊदी तेल कंपनी अरमाको से करता है.

लेकिन 2 लाख बैरल प्रतिदिन तेल मुहैया कराने के लिए यह कंपनी 'एशियन प्रीमियम' चार्ज कर रही है.

एशियन प्रीमियम का मतलब मध्य पूर्व के देश भारत, चीन, जापान, और बाकी एशियाई देशों को दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में अधिक कीमतों पर तेल बेचते हैं.

चीन और जापान की तरह ही अमरीका से व्यापार के भारत के अपने सिरदर्द हैं. असंतोष का पहला सबूत तब मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बेहद ख़ास उलटफेर करते हुए ईरान के साथ डॉलर के उपयोग के बैगर ही तेल की ख़रीद का रास्ता निकालने की घोषणा की.

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इसके दंड स्वरूप जून की शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने भारत से 'तरजीही देश' का स्टेटस हटा लिया, लिहाजा भारत को अमरीका में कुछ वस्तुओं की ब्रिकी पर टैक्स में मिली छूट ख़त्म हो गयी.

अब दोनों देश एक दूसरे पर एक के बाद एक शुल्क लगा रहे हैं.

अब तक भारत की तेल कंपनियों ने इसका निपटारा नहीं किया कि कच्चे तेल की ज़रूरतों के दीर्घावधि उपाय क्या होंगे.

भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने रूस के साथ तेल संबंधों को बढ़ाने को लेकर नई बातचीत शुरू की है. लेकिन तेल की क़ीमत और प्रतिबंधों को देखते हुए यह अमरीका को दिया गया एक संकेत कहा जा सकता है.

यह मोदी सरकार से लीक हुई इस बात के एक महीने बाद सामने आया जिसके अनुसार अमरीका पर तेल की आपूर्ति की निर्भरता को लेकर भारत सहज नहीं है. इस नीति पर अभी गतिरोध जान पड़ता है, वहीं भारतीय कंपनियां बाज़ार में बड़े सप्लायर की खोज में जुटी हैं.

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मैक्रो आउटलुक और राजनीतिक जोख़िम

चाहे न चाहें, अपने हितों को साधने की पैंतरेबाज़ी के बावजूद एशिया के बड़े ख़रीदार अमरीकी प्रतिबंधों के अनुसार उनके अनुपालनों को मान रहे हैं.

लेकिन सभी देशों को ईरान और वेनेजुएला पर अमरीकी प्रतिबंधों की वजह से समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. बड़े पैमाने पर वेनेजुएला की भी कच्चे तेल की उत्पादकता पहले से कहीं कम हो गयी है जो ईरान के समान ही तेल बाज़ार पर पकड़ रखता है.

दोनों देशों में तेल के उत्पादन में बड़े स्तर पर गिरावट हुई है. इस तरह पूरे क्षेत्र को भारी प्रीमियम के साथ अन्य बाज़ारों से तेल ख़रीदना पड़ रहा है. और इसी वजह से कच्चे तेल और रिफाइनरीज़ की प्रॉसेसिंस की लागत में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है.

शुरुआती सकारात्मक संकेतों के बावजूद, एशिया की तेल रिफाइनरीज़ में उत्पादन अपने 16 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. अप्रैल और मई के महीने में चीन के तेल रिफ़ाइनरीज़ में उनकी क्षमता से 50 फ़ीसदी नीचे उत्पादन हुआ.

तेल की मांग कमज़ोर हो रही है. तेल की कीमतों में छोटी-से-छोटी फेरबदल से रिफ़ाइनरी को भारी नुकसान हो रहा है. अमरीकी प्रतिबंध नीति और अमरीकी तेल उत्पादन मिलकर बाज़ार की स्थिरता को कमज़ोर कर रहे हैं.

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Image caption होरमुज़ की खाड़ी तेल के आवागमन का मुख्य रास्ता है

मौजूदा समय में तेल की क़ीमतों में वृद्धि हुई है लेकिन इसकी मांग में कमी आई है. खाड़ी में सैन्य संघर्ष की स्थिति एशिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं और यह कोई नहीं जानता कि वहां की स्थिति स्थिर होने तक तेल की क़ीमतें कितनी बढ़ेंगी.

बीमा की दरें आसमान छू जाएंगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का बाज़ार और भी जोख़िम भरा हो जायेगा क्योंकि निवेशक रिफ़ाइनरी से अधिक से अधिक तेल उत्पादन चाहते हैं, वहीं तेल के ख़रीदारों को इसकी अधिक क़ीमतें चुकानी होंगी.

अगर ऐसा हुआ तो अब तक पूरी तरह नकारात्मक होने से बचा बाज़ार पूरी तरह धराशायी हो जाएगा.

कुल मिलाकर खाड़ी में अमरीकी सैनिकों की बढ़ती मौजूदगी से अब आगे अगर स्थिति बिगड़ती है तो तेल के ख़रीदारों और कंपनियों को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना होगा.

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