वो शख़्स जिसने कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सैनिकों को खाना खिलाया

  • 27 जुलाई 2019
कारगिल युद्ध

"मई 1999 में, मैं गिलगिट के दक्षिण-पूर्व में एक गाँव जगलोट से गुजर रहा था. वहां मैंने कुछ लोगों को काराकोरम राजमार्ग पर जमा होकर पाकिस्तानी फ़ौज के हक़ में नारे लगाते देखा. मैंने एक स्थानीय अस्पताल में दर्जनों लोगों को भी देखा जो पहाड़ों से नीचे लाए गए सैनिकों को ख़ून देने के लिए आए हुए थे."

गुल शेर (बदला हुआ नाम) पचास के आस-पास हैं मगर उनके ज़हन में कारगिल युद्ध से जुड़ी यादें अब भी ताज़ा है.

20 साल पहले भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस युद्ध में जख़्मी और मारे गए सैनिकों को याद करते हुए गुल शेर आज भी अफ़सोस और दुख से भर जाते हैं. बीबीसी ने इन तथ्यों की पुष्टि नहीं की है.

अप्रैल 1999 में, कारगिल के पास नियंत्रण रेखा पर गश्त कर रहे भारतीय सैनिकों पर ऊंचाई से पहाड़ों की ओर से फ़ायरिग हुई.

कुछ दिनों बाद, भारतीय सेना को पता चला कि नियंत्रण रेखा पर जिन भारतीय चौकियों को ख़राब मौसम के कारण उन्होंने खाली कर दिया था उन पर अब पाकिस्तान के हथियारबंद लोगों का कब्जा हो गया है.

भारतीय सैन्य अधिकारियों को बाद में ये एहसास हुआ कि खाली भारतीय चौकियों पर कब्ज़ा करने वाले ज़्यादातर लोग पाकिस्तानी सेना के उत्तरी लाइट इन्फैंट्री (एनएलआई) के प्रशिक्षित सैनिक थे.

जवाब में, भारत सरकार ने उन्हें वहां से हटाने के लिए एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया, जो लगभग तीन महीने तक चला.

कारगिल संघर्ष के दौरान, गुल शेर पाकिस्तानी फ़ौज के साथ एक सक्रिय कार्यकर्ता के तौर पर शामिल थे.

उनके पूर्वज सदियों पहले श्रीनगर से गिलगित चले गए थे लेकिन उनका कहना है कि कश्मीर घाटी से अब भी उनका गहरा नाता है.

गुल शेर कहते हैं "उस दिन मैंने फ़ैसला किया कि मैं लोगों को हमारे साथ जुड़ने और भारत के ख़िलाफ़ सेना की मदद करने के लिए प्रोत्साहित करूंगा."

गुल शेर ने 1987-88 में पाकिस्तानी सेना से सैन्य प्रशिक्षण ले रखा था.

बाद में वह मुजाहिद रेजिमेंट में शामिल हो गए थे, जो पाकिस्तानी सेना की सेकेंड लाइन ऑफ डिफ़ेंस थी. जिसे युद्ध के दौरान सेना की मदद करने के लिए तैयार किया गया था.

हालांकि पांच साल बाद उन्हें स्वास्थ्य कारणों से फ़ौज से रिटायरमेंट लेना पड़ा.

पर गुल शेर का सेना से जुड़ने का मक़सद कुछ और था.

गुल शेर कहते हैं कि जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो उन्होंने इस उम्मीद से फ़ौज का साथ दिया कि अगर वो जीते तो युद्ध के बाद श्रीनगर को भारत के कब्ज़े से आज़ाद कराया जा सकेगा.

वो कहते हैं "युद्ध के दौरान, मैं स्कर्दू से सौ किलोमीटर दूर ख़पलू के एक आर्मी बेस कैंप जाता था. प्रशिक्षण प्राप्त आम लोग भी बड़ी संख्या में उस युद्ध में शामिल हो रहे थे. उनमें से ज़्यादातर कश्मीरी थे लेकिन कुछ पाकिस्तानी भी थे."

गुल शेर बताते हैं कि गिलगित-बालिस्तान के लोगों ने कारगिल युद्ध के दौरान बहुत सहयोग दिया. उन्होंने कई बलिदान दिये.

वे कहते हैं, "वो लोग अपने निजी वाहनों, जीपों, ट्रैक्टरों और ट्रकों का इस्तेमाल सेना को खाना पहुंचाने के लिए कर रहे थे."

ख़पलू में गुल शेर इन कार्यकर्ताओं का नेतृत्व कर रहे थे, जहां उन्होंने पाकिस्तानी फ़ौज के साथ कई महीने पाकिस्तानी सीमा की तरफ़ रशीद पोस्ट पर बिताए.

वो अपनी गाड़ी में सैनिकों के लिए खाने-पीने का सामान और इंधन लेकर जाते थे.

वो याद करते हैं "मेरे पास बहुत अच्छा लैंड क्रूज़र था. पूरे इलाके के लोग सैनिकों के लिए भोजन दान कर रहे थे. दस से अधिक बार ऐसा हुआ कि मैं गाड़ी भरकर सूखे फल और सूखा मांस ले गया. जिसे बाद में तैनात सैनिकों में बांट दिया गया."

गुल शेर का दावा है कि दूसरी ओर, भारतीय सेना के पास ज़बरदस्त संसाधन थे.

"उनकी सड़कें बेहतर थीं, उनके बख्तरबंद ट्रक बहुत आसानी से वहां से आ-जा रहे थे और भारतीय सेना लगातार ज़मीनी और हवाई फ़ायरिंग कर रही थी."

गुल कहते हैं कि उस गोलीबारी की वजह से ही वो सरहद पार नहीं जा सके. वो बताते हैं कि 'भारतीय सेना भारी तोपखानों का इस्तेमाल कर रही थी. जबकि पाकिस्तान का बुनियादी ढांचा जर्जर हालत में था और इस तरफ की ज़्यादातर सड़कें पूरी तरह से नष्ट हो गई थीं."

वो कहते हैं, "कई बार मैं ख़ुद शेलिंग में बाल बाल बचा. लेकिन एक बार मेरी कार निशाना बन गई और फिर मैं पांच दिन तक कहीं भी नहीं जा सका. जब सड़क ठीक हुई उसके बाद ही मैं कहीं जा सका."

भारत की ओर से हो रही गोलीबारी के बारे में बताते हुए वो कहते हैं "हमारे नागरिकों और सेना को 6 और 14 उत्तरी लाइट इन्फैंट्री पर ख़ास तौर पर नुक़सान उठाना पड़ा था. यहां बहुत से लोग मारे गए थे."

गुल शेर का कहना है कि गिलगित के लोग कड़ाके की ठंड के आदी हैं, लेकिन फिर भी जब भारतीय सेना की गोलाबारी से पाकिस्तानी सेना की रसद प्रभावित होने लगी तो भारत के ओर से नाकाबंदी कर दी गई.

वो याद करते हैं कि उस वक्त रसद की कमी के चलते सैनिकों के लिए पहाड़ों पर कई हफ़्ते तक रहना और लड़ना मुश्किल हो गया था. एक समय तो ऐसा भी आया जब गुल शेर और उनके सहयोगियों को दो दिनों तक खाने के लिए कुछ भी नहीं मिला.

वो बताते हैं, "हमने रशीद पोस्ट से कुछ सौ फ़ीट ऊपर एक जगह पर क़ब्ज़ा कर लिया था. रात में हम पानी और भोजन को दूसरी ओर ले जाते थे. रात में जब गोलाबारी बंद कर दी जाती थी, हम अपने शरीर से तीस-तीस किलो खाना बांधकर बर्फ़ से ढके पहाड़ों पर रेंगते हुए सैनिकों के पास खाना लेकर जाते थे."

इसके बाद,पाकिस्तान के तत्कालिक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने 4 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद भारत प्रशासित कश्मीर से पाकिस्तानी सेना वापस लेने के लिए हामी भर दी.

गुल शेर अभी भी राजनीतिक नेतृत्व से सैनिकों को वापस लेने के फ़ैसले पर पछतावा ज़ाहिर करते हैं और मानते हैं कि इस फ़ैसले से पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ. उनका अनुमान है कि सशस्त्र संघर्ष में लगभग 1,000 सैनिक मारे गए थे.

वो कहते हैं, "हमारे इरादे अच्छे थे और हमें भरोसा था कि हम श्रीनगर पहुंचेंगे लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य था कि पाकिस्तान के पास संसाधनों की कमी थी और अर्थव्यवस्था मज़बूत नहीं थी. अंतरराष्ट्रीय दबाव था इसलिए सेना को वापस बुलाना मजबूरी बन गई."

वो इस बात से मना करते हैं कि पाकिस्तान ने युद्ध में मारे गए अपने सैनिकों के शव लेने से इनकार कर दिया था.

"शवों को वापस लाने में बहुत समय और संसाधन ज़रूर लगा लेकिन सेना ने सुनिश्चित किया कि कोई शव बचे नहीं. उत्तरी लाइट इन्फैंट्री ने सभी शवों को बरामद किया और उन्हें पूरे सम्मान के साथ परिवारों को सौंप दिया."

कारगिल युद्ध अप्रैल 1999 में शुरू हुआ और 26 जुलाई को भारत ने अपने क्षेत्र से पाकिस्तानी बलों पूरी तरह से हटा देने का ऐलान कर दिया.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
जंग को कैमरे में क़ैद करने वालों की ज़ुबानी कारगिल की कहानी

गुल शेर का मानना है कि पाकिस्तानी अधिकारियों को पूरे ऑपरेशन की बेहतर योजना बनानी चाहिए थी और उन्हें उपलब्ध संसाधनों को देखना चाहिए था. ऑपरेशन शुरू करने से पहले उन्हें संसाधनों का पर्याप्त प्रबंध करना चाहिए था.

वो कहते हैं, "मैं सिर्फ एक कार्यकर्ता था. मुझे नहीं पता कि यह युद्ध क्यों लड़ा गया लेकिन फिर भी किसी भी त्रासदी या आपदा की स्थिति में मैं हमेशा तैयार हूं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार