कारगिल सिर्फ़ एक अफ़साना है: वुसअत का ब्लॉग

  • 30 जुलाई 2019
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कारगिल का युद्ध, ये कब हुआ?

अच्छा 20 वर्ष हो गए. हमें तो नहीं पता.

न इसकी वर्षगांठ कभी किसी ने मनाई न किसी समाचार पत्र ने कारगिल पर कभी कोई स्पेशल एडिशन छापा.

न किसी टीवी चैनल पर कोई टॉक शो हुआ.

जब हमें कोई तकलीफ नहीं तो फिर बीबीसी को क्या तकलीफ है जो रोज़ाना कारगिल की 20वीं बरसी पर पिछले एक हफ़्ते से कोई न कोई लेख या विश्लेषण छाप रहा है.

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कारगिल की लड़ाई में ‘ये दिल माँगे मोर’ बोलकर विक्रम बत्रा हर युवा सैनिक का चेहरा बन गए थे.

तभी तो हमारे यहां के बहुत से देशभक्त कहते हैं कि कौन सा बीबीसी? वही न, भारतीय ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन.

हमें तो यहां सरकारी तौर पर बस इतना मालूम है कि 20 वर्ष पहले कुछ जेहादियों या मुजाहिदीन ने कारगिल की कुछ पहाड़ियों पर कब्ज़ा कर के लेह श्रीनगर हाईवे काटने की कोशिश की थी और दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए.

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...अगर अमरीका जंग न रुकवाता

और जब भारतीय वायुसेना और भारी तोपों के बम पाकिस्तानी इलाके में गिरने लगे तो फिर पाकिस्तान की रेगुलर आर्मी की नॉर्दन लाइट इन्फ्रेंट्री को भी मजबूरन मुजाहिदीन और भारत के बीच आना पड़ा.

और फिर अमरीका ने नवाज़ शरीफ के कहने पर दोनों देशों के दरम्यान पड़ कर गोलीबारी बंद करवा दी और जो जहां पहले से विराजमान था, वहीं पहुंच गया.

अगर अमरीका जंग न रुकवाता तो भारत को पता लग जाता!

क्या कहा? कारगिल के युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई थी. ये सरासर झूठ है.

अगर ऐसा कुछ हुआ होता तो जो इस हार के जिम्मेदार हैं, उनके नाम पते जरूर सामने आते. कोई जांच कमीशन बनता जैसा कि 1971 के बाद बना था.

कारिगल का जांच कमीशन तो भारत में बना. तो फिर हारा कौन? भारत.

वो शख़्स जिसने कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सैनिकों को खाना खिलाया

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Image caption नवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी

क्या पढ़ाया जाता है पाकिस्तान के स्कूलों में?

अगर युद्ध होता तो इसमें सिविलियन मरते, फ़ौजी मरते. घरों, खेतों, खलिहानों का कोई नुकसान सामने आता. हमें तो आज तक ये ही नहीं मालूम कि कितने सिविलियन और फ़ौजी मरे और कितने घर तबाह हुए.

पाकिस्तान के स्कूलों में जो पढ़ाया जाता है, उसमें बस तीन जंगों का तस्करा है.

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मिलिएगा उस शख़्स से जिसने सबसे पहले देखा था सीमा पार कर कारगिल की पहाड़ियों पर आते चरमपंथी

एक 1948-49 वाली कश्मीर की जंग. जिसमें भारत को मुंह की खानी पड़ी इसीलिए भारत ने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र को बीच में डाला.

दूसरी 1965 की जंग जिसमें पाकिस्तान ने भारत को करारी हार का मज़ा चखाया. और पाकिस्तानी मीडिया हर साल 6 सितंबर को इस फतह का जश्न इसीलिए मनाता है.

तीसरा युद्ध 1971 में हुआ जिसमें पाकिस्तान हारा जरूर मगर हौसला नहीं हारा. मगर कारिगल में जब जंग हुई ही नहीं तो किसी की हार किसी की जीत का सवाल कहां से आ गया?

कारगिल: जब रॉ ने टैप किया जनरल मुशर्रफ़ का फ़ोन..

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ये कैसा युद्ध था?

ये कैसा युद्ध था जो हुआ भी मगर उस वक्त के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को कानों कान ख़बर भी न हुई.

कहते हैं कि ये युद्ध जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ और कुछ साथी जनरलों ने छेड़ा था.

अगर ऐसा होता तो इन जनरलों का कोर्ट मार्शल हो चुका होता. मगर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं तो कोर्ट मार्शल काहे को होता?

अगर कारगिल में कुछ हुआ होता और इस कुछ में पाकिस्तान हार जाता तो फिर मुशर्रफ़ पाकिस्तान के सदर कैसे बनते?

इसका मतलब है कि कारगिल सिर्फ़ एक अफ़साना है. एक कहानी है. बस.

जिसको ज़्यादा तकलीफ़ है कुछ खोजने की, वो खोज ले पर इसके बाद शायद हम खोजने वाले को खोजते रह जाएं.

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