इसराइल में नेतन्याहू से बड़ा क्या कोई नेता नहीं है

  • 1 अगस्त 2019
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भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर घनी आबादी वाला इसराइल दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां बहुसंख्यक आबादी यहूदियों की है.

वर्ष 1948 में एक देश के तौर पर अस्तित्व में आने के बाद फ़लस्तीनियों और पड़ोसी अरब देशों के साथ इसराइल का ज़मीन के उस हिस्से के लिए संघर्ष होता रहा है जिसे यहूदी, ईसाई और मुसलमान तीनों ही पवित्र मानते हैं.

फ़लस्तीनियों के साथ संघर्ष और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं की वजह से इसराइल में हमेशा एक ऐसा राजनीतिक वातावरण रहा, जिसने देश में अस्थिर गठबंधन सरकारों को जन्म दिया.

दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता बिन्यामिन नेतन्याहू इसराइली नेताओं की कड़ी में इस समय सबसे बड़ा नाम है जो बीते 10 वर्षों से प्रधानमंत्री की शक्ल में सत्ता पर क़ाबिज़ रहे हैं.

17 सितंबर को होने वाला चुनाव नेतन्याहू के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है.

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क्यों अहम है ये चुनाव?

यरुशलम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा बताते हैं, ''नेतन्याहू के ख़िलाफ़ अभी चार मामलों पर जांच-पड़ताल चल रही है. पुलिस ने आरोप तय करने की सिफ़ारिश की है. एटॉर्नी जनरल को पुलिस की ओर से बताया गया है कि नेतन्याहू के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया जा सकता है. एटॉर्नी जनरल ने सुनवाई के लिए दो अक्तूबर की तारीख़ तय की है. उस दिन मामले पर सुनवाई होगी और फ़ैसला आएगा कि नेतन्याहू के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो या ना हो. ऐसे में चुनाव की अहमियत काफ़ी बढ़ जाती है, क्योंकि नेतन्याहू अगर चुनाव जीत जाते हैं तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ज़रिए दोबारा प्रधानमंत्री बनने पर क़ानूनी कार्रवाई पर अपने आप एक तरह का दबाव बन जाएगा.

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चुनाव प्रचार के लिए बैनरों में नेतन्याहू के साथ नज़र आ रहे हैं भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र

इससे पहले अप्रैल में हुए आम चुनावों में नेतन्याहू की कंजरवेटिव लिकुड पार्टी को संसद की 120 सीटों में से 35 सीटें मिली थीं, लेकिन कम सीटों के बावजूद बाक़ी दक्षिणपंथी पार्टियों के समर्थन से नेतन्याहू को सरकार बनाने का मौक़ा मिला.

यूं तो नेतन्याहू को गठबंधन बनाने में माहिर माना जाता है लेकिन अप्रैल में हुए चुनावों के नतीजे आने के बाद नेतन्याहू और उनकी लिकुड पार्टी गठबंधन करके भी सरकार बनाने से महज़ एक सीट दूर रह गई.

इसकी वजह बना एक मिलिटरी ड्राफ़्ट लॉ, जिसने नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को सेक्युलर अल्ट्रा-नेशनलिस्ट और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स धड़ों में बाँटकर सत्ता में आने से सिर्फ़ एक क़दम पहले रोक दिया.

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विपक्ष की घेराबंदी

वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा बताते हैं, ''इसराइल की अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स कम्युनिटी, जो धार्मिक क्रियाकलापों से जुड़ी हुई है जिन्हें इस तरह पहचाना जा सकता है कि ये वो यहूदी हैं जो काले कपड़े पहनते हैं. जो इसराइल से बाहर न्यूयॉर्क में भी बड़ी संख्या में जो नज़र आते हैं. उनकी आबादी इसराइल में कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत है लेकिन राजनीति पर उनकी अच्छी पकड़ है, सरकार बनाने में उनका समर्थन बड़ा महत्वपूर्ण होता है.''

''उनकी ओर से हमेशा ये मांग की जाती है कि जो लोग यशीवा यानी धार्मिक जगहों पर पढ़ाई कर रहे हैं, उन्हें अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट दी जाए. ये छूट उन्हें दी भी गई है. लेकिन इस मुद्दे पर लिबरमान जो कि राइटविंग पार्टी के ही नेता हैं, उन्होंने इसका विरोध करते हुए गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया.''

तब इसराइल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब नामित प्रधानमंत्री गठबंधन बनाने में नाकाम रहा और एक ही साल के भीतर दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ गई.

उन्होंने इस अधूरी जीत को नेतन्याहू अबकी बार हर क़ीमत पर पूरा करना चाहेंगे. नेतन्याहू इस चुनाव में मध्य-पूर्व के मौजूदा हालात को देखते हुए, देश की सुरक्षा के लिए ख़ुद को एक मज़बूत और दमदार नेतृत्व के तौर पर पेश कर रहे हैं.

दूसरी ओर विपक्ष, नेतन्याहू को उनकी कथित विभाजनकारी आंतरिक नीतियों के आधार पर और उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की बुनियाद पर घेरने की कोशिश कर रहा है.

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इसराइल में भारत के राजदूत रहे नवतेज सरना कहते हैं, ''इस बार का चुनाव निर्णायक होगा. नेतन्याहू इसराइल के सबसे अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बन चुके हैं. उन्होंने इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री डेविड बेनगुरियन का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. अब समय आ गया है जब इसराइली लोगों को तय करना है कि नेतन्याहू को एक बार फिर प्रधानमंत्री चुनना है या नहीं. बैनी गैंस ने पिछले चुनाव में नेतन्याहू को चुनौती दी थी और अच्छा प्रदर्शन किया था. लेकिन उतना अच्छा प्रदर्शन भी नहीं किया था कि सरकार बना सकें. मुझे लगता नहीं कि बैनी गैंस अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा पाएंगे. इसराइल में हालात ऐसे बन गए हैं कि नेतन्याहू का कोई विकल्प उभरना चाहिए, लेकिन अभी कोई दिखता नहीं है.''

इसराइल के चुनाव में इस बार एक नया रंग नज़र आया है. दुनिया भर के बड़े नेताओं के साथ अपने अच्छे संबंधों को बिन्यामिन नेतन्याहू ने चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की है और इसके लिए बड़े-बड़े चुनावी बैनर्स में उन्हें अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप, रूसी राष्ट्रपति पुतिन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दिखाया गया है.

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नेतन्याहू को मोदी का सहारा?

नवतेज सरना इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ''इन नेताओं की तस्वीर चुनाव में इस्तेमाल की जा रही है और इन तस्वीरों के साथ लिखा जा रहा है- इन अनदर लीग. नेतन्याहू इसके ज़रिए ख़ुद को एक ऐसे नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं जिन्हें दुनियाभर में जाना-पहचाना जाता है. वो ख़ुद को एक ग्लोबल लीडर के तौर पर पेश करना चाहते हैं जो देश के लिए विज़न लेकर चल रहा है. मोदी और नेतन्याहू की केमिस्ट्री बड़ी अच्छी है, दोनों ने एक-दूसरे के देश में जाकर बड़ी अच्छी तस्वीरें खिंचवाई थीं. नेतन्याहू उन तस्वीरों को इस्तेमाल ग्लोबल लीडर बनने में कर रहे हैं.''

वर्ष 1996 में नेतन्याहू ने जब पहली बार चुनाव जीता, आलोचकों ने ये कहते हुए उन्हें आड़े हाथों लिया था कि नेतन्याहू के पास अनुभव नहीं है. लेकिन जब इसी साल अप्रैल में हुए चुनाव में नेतन्याहू ने जीत का डंका बजाया तो उन्हें जादूगर कहकर सराहा गया.

तेल अवीव में जन्मे अमरीका में पले और बड़े हुए नेतन्याहू 18 साल की उम्र में इसराइल लौटने के बाद सेना की कमांडो यूनिट में कैप्टन के तौर पर शानदार पांच साल बिताकर, आगे की पढ़ाई के लिए वापस अमरीका गए और अमरीकी टेलीविज़न पर धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में इसराइल की पैरवी करने वाले जाने-पहचाने चेहरे बने.

अमरीका से दोबारा इसराइल वापसी करके, घरेलू राजनीति से शुरुआत करते हुए लिकुड पार्टी के रास्ते संसद का सफ़र तय करते हुए नेतन्याहू ने सबसे पहले उपविदेशमंत्री का ओहदा हासिल किया, फिर पार्टी के अध्यक्ष बने, लेकिन निर्णायक मोड़ आया तब जब प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की हत्या के बाद वर्ष 1996 में उन्हें इसराइल में सीधे चुनाव के ज़रिए चुना गया पहला प्रधानमंत्री बनने का मौक़ा मिला.

उसके बाद सिर्फ एक बार वर्ष 1999 के चुनाव में उन्हें अपने ही एक पूर्व कमांडर एहुद बराक से हारकर सत्ता से बाहर होना पड़ा. लेकिन इसके बाद साल 2009 में प्रधानमंत्री के तौर पर वापसी करके नेतन्याहू इसराइल की सत्ता पर छा गए.

यही उनकी विरासत है जो इस चुनाव में दांव पर लगी है.

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