'हम बूढ़े हो गए, मसला-ए-कश्मीर वहीं है': ब्लॉग

  • 13 अगस्त 2019
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हमें बचपन में ही ये पाठ पढ़ा दिया गया था कि कश्मीर पाकिस्तान की मुख्य धमनी है. तब न तो ये पता था कि कश्मीर किस बला का नाम है, न ही ये पता था कि मुख्य धमनी कहां होती है.

जब सातवीं-आठवीं कक्षा तक पहुंचे तो पता लगा कि भारत कश्मीर को अपना अभिन्न अंग कहता है. अभिन्न और अंग का मतलब भी बाद में समझ आया.

कश्मीर का पता कुछ ऐसे लगा कि भारतीय फ़िल्में देखीं और समझ आया कि बहुत ख़ूबसूरत जगह है और जब हीरो और हीरोइन को प्यार थोड़ा ज़्यादा हो जाता है या जब उन्हें गीत गाना होता है या उनका हनीमून का मूड हो, तो वे कश्मीर चले जाते हैं.

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बाद में समझे कश्मीर का मामला

जब कॉलेज में पहुंचे तो पता चला कि कश्मीर एक जगह का नाम नहीं है. यह एक मसले का नाम है. मसला-ए-कश्मीर. मसला-ए-कश्मीर पर हमने मज़मून भी लिखे. तक़रीरें भी कीं.

पर जिन जवानों के सीनों में ईमान ज़्यादा था और घर में दाने कम, वे जिहादी समूहों में शामिल हो गए और कश्मीर को आज़ाद कराने चल पड़े.

कश्मीर तो आज़ाद न हुआ, हमारे पंजाब के क़ब्रिस्तानों में क़ब्रों की संख्या ज़रूर बढ़ गई.

फिर हमारे अपने गली मुहल्लों से शुरुआत हुई. हम कश्मीर को थोड़ा भूल से गए थे.

साल-दर-साल 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' के नारे लगाकर अपना मन बहलाते रहे.

दूसरी तरफ़, भारतीय कश्मीर में माहौल गर्माया तो कश्मीरी लड़के पाकिस्तानी झंडे उठाकर सड़कों पर अपनी गुलेलों के साथ पांच लाख फौज का मुक़ाबला करने को तैयार होने लगे.

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कश्मीर पर हो चुके युद्ध

हिंदुस्तान पाकिस्तान लगभग साढ़े तीन-चार लड़ाइयां भी लड़ बैठे हैं. एलओसी पर रोज़ तोपें भी चलती हैं... हम बूढ़ें होने लगे हैं पर मसला-ए-कश्मीर वहीं का वहीं है, जहां हमने अपना प्राइमरी स्कूल छोड़ा था.

अब हमारे वज़ीर-ए-आज़म इमरान ख़ान अमरीका गए, ट्रंप ने बिठाकर दहाड़ मारी कि भारत तो तैयार है. मैं बिचौलिया बनूंगा और तुम्हारा पुराना मसला-ए-कश्मीर हल कर देते हैं.

ख़ान साहब वापस आ गए. उनकी पार्टी ने इतने ढोल बजाए. इतने हार पहनाए, जैसे ख़ान साहब कश्मीर पर पाकिस्तान का झंडा फहराकर आए हों.

हफ़्ते बाद ही मोदी सरकार ने मसला-ए-कश्मीर हल कर छोड़ा. उन्होंने कहा, कौन सा मसला, कौन बिचौलिये. पांच लाख फौज वहां पहले से ही थी, पैंतीस हज़ार और भेज दी.

टीवी बंद, अख़बार बंद, इंटरनेट बंद, मोबाइल, लैंडलाइन, सब बंद. पाकिस्तान के प्यारे नेता तो बंद होने ही थे. साथ ही, दिल्ली के लाडले नेता भी जेलों में डाल दिए गए.

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कश्मीरी जाएं तो जाएं कहां

ऐसे समझिए जैसे कश्मीरियों को एक पिंजरे में बंद करके एलान कर दिया गया कि बताओ तुम्हारा मसला क्या था.

जो कश्मीरी कश्मीर से बाहर हैं वे अपने घर वालों से बात नहीं कर सकते. जो कश्मीरी कश्मीर में हैं, उनके पास भागने का कोई चारा नहीं.

मोदी भक्त ऐसे जश्न मना रहे हैं जैसे एक ही दिन में अंग्रेज़ों से आज़ादी भी मिल गई हो और उसी ही दिन क्रिकेट का वर्ल्ड कप भी जीत लिया हो.

जो भक्त नहीं हैं वो इस बात से ख़ुश हैं कि कश्मीरी बड़ा उछलते थे, कई तो पाकिस्तान के झंडे लिए घूमते थे, अब इनको इनकी औकात याद दिलाओ.

कश्मीरियों से ही पूछो

एक भारतीय लेखक से बात हुई. बड़ा ख़ुश था. मैंने कहा, "यार बात सुन, तुम्हारा कोई फोन छीन ले, इंटरनेट बंद कर दे, तुम्हारे घर के दरवाज़े पर एक फौजी बैठा दे, तुम्हारा बच्चा घर से राशन लेने निकले, उसे गोली मारकर अंधा कर दे, फिर तुम ख़ुश होगे?"

कहने लगा, "देखिए जी, जब मर्ज़ पुराना हो जाता है तो मरीज़ को ऑपरेशन के लिए ज़बरदस्ती ले जाना पड़ता है और जब वो शोर मचाता है तो कोई नर्स या डॉक्टर उसके मुंह पर हाथ रख देता है."

मैंने कहा, "शरम कर, कितने बड़े डॉक्टर हो तुम, एक पूरी कौम को मरीज़ कह रहे हो."

कहने लगा, "आप ही बताएं तो क्या हल है क्योंकि बाकी सब तो हम आज़मा चुके हैं."

मैंने कहा, "हल का मुझे पता कोई नहीं लेकिन एक चीज़ है जिसे न कभी हिंदुस्तान ने आज़माया है, न कभी पाकिस्तान ने."

उसने पूछा, वो क्या?

मैंने कहा, "कश्मीरियों को. उनके साथ बैठकर उनसे पूछो कि भाइयों ये तो बताओ कि तुम चाहते क्या हो?"

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