सौ साल पहले जब अमरीकी सेना ने लड़ी थी रूस से लड़ाई

  • 17 अगस्त 2019
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Image caption 1918 में हुई इस लड़ाई में अमरीकी सैनिकों को ऐसे इलाके में लड़ना पड़ा जहां परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं थीं

कोई भी आपको बेहिचक बता देगा कि धरती पर हाड़ कंपा देने वाली सबसे ठंडी जगह साइबेरिया है.

प्रथम विश्व युद्ध के करीब दो महीने पहले सितंबर 1918 में क़रीब पांच हज़ार अमरीकी सैनिकों के एक टुकड़ी को उत्तरी रूस के इस इलाके में भेजा गया था. यहां इन सैनिकों और रूस के बोल्शेविक के बीच एक ख़ूनी लड़ाई लड़ी गई.

ये एकमात्र मौक़ा था जब रूसी इलाक़े में अमरीकी सेना ने लड़ाई में हिस्सा लिया था.

अमरीका इतिहास में अब इस लड़ाई का ज़िक्र कम ही होता है. 1918 की इस लड़ाई को 'पोलर बीयर एक्सपीडिशन' के नाम से जाना जाता है.

इस लड़ाई और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुई अन्य घटनाओं पर हाल में किताब लिखने वाले अमरीकी लेखक जेम्स कार्ल नेल्सन कहते हैं कि इस लड़ाई से महत्वपूर्ण शिक्षा ली जानी चाहिए.

बीबीसी से बात करते हुए नेल्सन ने कहा, "रूसी इस बात को नहीं भूले हैं कि कभी अमरीकियों ने उन पर हमला किया था. लेकिन बहुत कम अमरीकियों को इस घटना की जानकारी है."

"और मुझे लगता है कि उन्हें पता होना चाहिए कि हमने बाद में वियतनाम और इराक़ में इस तरह की मुहिम क्यों देखने को मिली, जब अमरीका ने स्पष्ट उद्देश्य के साथ किसी दूसरे देश पर हमला किया."

इस अभियान में हिस्सा लेने वाले एक सैनिक हेनरी जे कॉस्टेलो के अनुसार अभी भी वो संशय में हैं कि उन्हें आख़िर वहां भेजा ही क्यों गया. युद्ध के मैदान से लौट कर उन्होंने अपने अनुभवों पर एक किताब लिखी जो 1920 में प्रकाशित हुई थी.

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एक अप्रत्याशित अभियान

'पोलर बीयर' नाम के इस मिशन में शामिल सैनिकों ने खुद कहा है कि विश्व युद्ध के ख़त्म होने के नौ महीने बाद यह मिशन अगस्त 1919 को ख़त्म हुआ था.

आधिकारिक तौर पर 'उत्तरी रूस में अमरीकी अभियान' के नाम से जाने जाने वाले इस अभियान के लिए सैनिकों को चुनने का काम मार्च 1918 से शुरु हुआ था. इसके लिए नाम लिखवाने वाले सैनिकों में से अधिकतर मिशिगन और विस्कोन्सिन से थे. उन्हें इसका अंदाज़ा भी नहीं था कि आने वाले वक्त में उनके साथ क्या होने वाला है.

नेल्सन लिखते हैं, "हम रूस गए ही क्यों थे? जून 1918 से लेकर अगले साल की गर्मियों के महीने तक आर्कटिक के आर्चेन्जल में फंसे पांच हज़ार से अधिक सैनिक यही सवाल पूछ रहे थे. उन्होंने एक ऐसी लड़ाई लड़ी थी जैसी शायद ही कभी किसी और सैनिक ने लड़ी होगी."

"उस दिन उनके मन में जो सवाल थे उनके उत्तर शायद आज तक नहीं मिले हैं. इस बात को अब सौ साल हो गए हैं."

अमरीकी सैनिकों ने अपनी मुहिम जुलाई 1918 में न्यूयॉर्क से शुरु की, अगस्त महीने की शुरुआत में वो इंग्लैंड पहुंचे.

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Image caption ब्रितानी खोजकर्ता सर अर्नेस्ट शैकल्टन

कई सैनिकों को लग रहा था कि उन्हें युद्ध के पश्चिमी मोर्चे पर फ्रांस भेजा जा रहा है, जहां जर्मन सेनाएं कड़ी टक्कर दे रही थीं.

लेकिन जब ध्रुवीय इलाकों में अभियान चलाने के लिए जाने जाने वाले ब्रितानी खोजकर्ता सर अर्नेस्ट शैकल्टन ने सैनिकों को ट्रेनिंग देनी शुरु की तो इस बात अंदाज़ा लग गया कि उनके नसीब में कुछ और ही लिखा है. शैकल्टन सैनिकों को बेहद ठंडे मौसम में रहने के तरीके सिखा रहे थे.

इसके बाद सितंबर 1918 में अमरीकी सैनिक आर्कटिक की तरफ बढ़ने लगे. आर्कटिक सर्कल से होते हुए वो उसके नीचे मौजूद बंदरगाह शहर आर्चेन्जल पहुंचे. ये इलाक़ा उत्तरी रूस में यूरोप के नज़दीक उस जगह पर था जहां वीना नदी और व्हाइट सी मिलते हैं.

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हाड़ कंपाने वाला नरक

रूस की इस जगह पर पहले से ही फ्रंसीसी, स्कॉटिश और इंग्लैंड के सैनिक मौजूद थे. कॉस्टेलो का कहना है स्थिति बहुत बढ़िया नहीं दिख रही थी, ना तो वहां खाने के लिए पर्याप्त सामान था न ही किसी तरह की कोई आर्थिक गतिविधि थी. वहां की हर वो वस्तु जो किसी तरह के काम आ सकती थी वो बोल्शेविक ले जा चुके थे.

वो कहते हैं, "सारे नाव, रेलवे का सामान, अस्पताल में काम में आने वाला सामान, दवाएं, हथियार और गोला बारूद, खाना, प्रिंटिंग प्रेस में रखा सामान और वहां के धनी लोगों के पास मौजूद धन और सोना-गहना... सब बोल्शेविक ले जा चुके थे."

स्थिति तब और भी ख़राब हो गई जब मित्र देशों की सेना में मौजूद दूसरे कमांडरों ने अमरीकी सेनाओं उनका सारा महत्वपूर्ण सामान और हथियार ले लिए.

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Image caption वहां ठंडी का आलम कुछ ऐसा था कि बारूद और हथियारों को सुरक्षित रखने के लिए कमरे बनाना ज़रूरी था

इसके बदले अमरीकी सैनिकों को जो मिला वो था कपड़े, सर्दियों के लिए ख़ास जूते जो बर्फ़ पर फिसलते थे और जिन्हें पहन कर बर्फ़ पर चलना आसान था. साथ ही उन्हें मिले कुछ टूटे-फूटे हथियार जो उन हथियारों की नकल थे जो रूसी इस्तेमाल कर रहे थे.

वो बताते हैं, "हमारे लोगों को इन हथियारों पर रत्ती भर भरोसा नहीं था लेकिन उनके पास जो कुछ था बस यही था. और उन हालातों में इन्हीं से काम चलाना उनकी मजबूरी थी. जो बंदूकें थीं वो टूट जाती थीं, जम जाती थीं और कभी गोली निकली भी तो निशाने पर नहीं लगती थी."

जद ही वहां सर्दियों ने दस्तक दी और पहले से हालात बद से बदतर हो गए. जब पारा शून्य से नीचे खिसका तो उनके मशीन गनों ने चलने से इनकार कर दिया. कई मीटर चौड़ी बर्फ़ की चादर में धंसे सैनिक उनसे लड़ रहे थे जिनके पास बेहतर हथियार तो थे ही बल्कि बड़ा सैन्यबल भी था.

कॉस्टेलो के शब्दों में अमरीकी टुकड़ी "बर्फ़ीले नरक" में लड़ाई कर रही थी.

नेल्सन के अनुसार उत्तरी रूस में मित्र देशों की सेना के क़रीब 11 हज़ार सैनिक भी थे लेकिन उन की लड़ाई क़रीब साठ हज़ार बोल्शेविक से थी. उनमें से 45 हज़ार आर्चेन्जल के आसपास तैनात किए गए थे.

वो कहते हैं कि मित्र देशों की सेना ने एक ग़लती कर दी. उन्होंने ये मान लिया कि सर्दियां आने के साथ इस इलाक़े में लड़ाई धीमी पड़ेगी और दुश्मन सेना अपनी जगह से बाहर नहीं निकल पाएगी.

लेकिन रूसी सैनिक अधिक व्यवस्थित थे. उनके पास बर्फ़ पर तेज़ी से चलने के लिए स्की और सर्दियों से जूझने के लिए बेहतर कपड़े थे. तो असल में सर्दियों के साथ लड़ाई धीमी पड़ने की बजाय और तेज़ हो गई.

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Image caption आर्चेन्जल के नज़दीक फ्रांसीसी सैनिकों ने क़रीब सौ बोल्शेविकों को क़ैद किया था

लेखक नेल्सन बताते हैं कि इस स्थिति के बावजूद अमरीकी सैनिकों ने अपनी सबसे बेहतर लड़ाई लड़ी और कम जानें गवां कर वहां से निकलने में कामयाब हुए.

वो कहते हैं मार्च से अप्रैल 1919 के बीच सात हज़ार बोल्शेविकों की एक टुकड़ी ने रेलवे लाइन के पास मित्र देशों की सेना की सैनिकों पर हमला किया. इस लड़ाई में क़रीब दो हज़ार रूसी सैनिकों की मौत हुई या उन्हें घायल अवस्था में कैदी बना लिया गया.

लेकिन हर बार मित्र देशों के सेना को जीतने का मौक़ा नहीं मिला.

जनवरी 1919 में आर्चेन्जल से क़रीब 300 किलोमीटर दूर एक निर्जन स्थान पर क़रीब 1,700 बोल्शेविक सैनिकों ने मित्र देशों के 46 सैनिकों पर हमला कर दिया. इस लड़ाई में 25 अमरीकी सैनिकों को अपनी जान गंवाने पड़ी.

नेल्सन के अनुसार इस घटना ने एक तरह से 'पोलर बीयर एक्सपीडिशन' के अंत की शुरुआत की.

प्रतिक्रांति

रूस में किए गए इस अमरीकी सैन्य अभियान का सबसे बड़ा विरोधाभास यह रहा कि असल में प्रथम विश्व विश्व युद्ध के ख़त्म होने से संबंधित युद्धविराम पर हस्ताक्षर करने के बाद ही यहां लड़ने वाले अधिकांश सैनिकों की मौत हुई थी.

इस कारण यहां सैनिकों में चिंता तो थी है, बल्कि गुस्सा भी था. उन्हें समझ नहीं आ रहा ता कि उन्हें क्यों लड़ते रहना पड़ रहा है.

इसका असर ये हुआ कि वहां पर सैनिकों के विद्रोह की इक्का-दुक्का घटनाएं हुईं, जब सैनिकों ने मोर्चे पर जाने से इनकार कर दिया.

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Image caption अमरीकी सैनिकों को अपने हथियारे और असला बारूद बदलने पड़े

अमरीका में इसी वजह को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरु हो गए थे. सीनेट में एक प्रस्ताव भी लाया गया जिसके ज़रिए राष्ट्रपति थॉमस वूड्रो विल्सन पर सैनिकों को वापस बुलाने के लिए दवाब डालने की कोशिश की गई थी. ये प्रस्ताव मात्र एक वोट से रुक गया था.

लेकिन ये सवाल जायज़ था कि युद्धविराम पर हस्ताक्षर होने के बाद अमरीकी सैनिक साइबेरिया में क्या कर रहे थे?

इसका नाता उस वक्त देश में हो रहे राजनीतिक बदलाव और मित्र देशों की सेना के काम करने के तरीके से था.

1917 के आख़िर में शुरु हुई बोल्शेविक क्रांति व्लादिमीर लेनिन के युद्ध से खुद हटा लेने के वायदे के साथ ख़त्म हुई. इसके बाद मार्च 1918 में जर्मन साम्राज्य, बुल्गारिया के साम्राज्य, ऑस्टो-हंगरी साम्राज्य और ऑटोमन साम्राज्य और रूस के बीच ब्रेस्ट-लितोव्स्क शांति समझौता हुआ.

नेल्सन कहते हैं, "इसके बाद जर्मनी ने अपनी सेना की 80 कमानों को पश्चिमी मोर्चे पर भेजा जहां उन्होंने जून की शुरुआत में एक और अभियान छेड़ा और अपने सभी सैनिकों को पेरिस के क़रीब 56 किलोमीटर दूर ले जने लगा. इससे मित्र देशों में चिंता बढ़ी."

वो कहते हैं कि हालात से निपटने के लिए पूर्वी मोर्चे को और मज़बूत करने की कवायद शुरु हुई जिसके लिए और सेनाएं रूस भेजी गईं. इसका उद्देश्य था कि जर्मनी को उनकी सेना हटाने से रोकना या फिर बचे सैनिकों को पेरिस के आसपास रखने के लिए जर्मनी को बाध्य करना.

थॉमस वूड्रो विल्सन को ये आइडिया पसंद नहीं आया और उन्होंने कई महीनों तक इसक विरोध किया. लेकिन जुलाई 1918 में इसके लिए तक राज़ी हुए जब उन्हें ये समझाया गया कि मित्र देशों ने लाखों डॉलर के हथियार और असला-बारूद रूस के लिए रवाना किया है, और ये सब बोल्शेविक या जर्मन सेना के हाथ लग सकता है.

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Image caption अमरीकी सैनिकों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए रेनडीयर और स्ले पर निर्भर रहना पड़ा था

लेखक नेल्सन के अनुसार अमरीकी सेना को रूस के अंदरूनी मामलों में दख़ल देना नहीं चाहिए थे लेकिन जब वो रूस पहुंचे तो दख़ल देना शुरु हो गया.

वो समझाते हैं ब्रितानियों के कारण ऐसा हुआ, जो रूस में मित्र देशों की सेना का नेतृत्व कर रहे थे उन्हें लग रहा था वहां विद्रोह को टालते हुए बोल्शेविक को हराना संभव है.

"ब्रितानियों ने चेक शासकों से संपर्क करने और रूस के पूर्व कैदियों से संपर्क करने की कोशिश की जो साइबेरिया के पूर्व की तरफ थे."

"वो उन्हें तलाश कर, उन्हें वापस बुला कर सेंट पीट्सबर्ग और मॉस्को के लिए होने वाले बोल्शेविक मार्च का हिस्सा बनने के लिए तैयार करेंगे और इस तरह वो रूसी क्रांति को ख़त्म कर सकते हैं."

वो कहते हैं, "इसके बारे में थॉमस वूड्रो विल्सन को जानकारी नहीं थी. उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि उनके सैनिकों का किस तरह महीनों तक ग़लत इस्तेमाल होता रहा. एक तरह से कह जाए तो ये सैनिक प्रताड़न का शिकार हुए थे."

एक अनुमान के मुताबिक़ इस पूरे अभियान में 235 अमरीकी सैनिकों की मौत लड़ते हुए हुई थी जबकि 70 की मौत आर्चेन्जल पहुंचने की कोशिश में सफ़र के दौरान बीमारी से हुई थी.

जून 1919 के अमरीका और मित्र देशों के बीच रूस से अमरीका सैनिकों को हटाने और उनकी जगह पर ब्रितानी सैनिकों को तैनात करने पर सहमति बन गई.

जून 1919 में अमरीकी सेना आख़िरकार अपने घर लौट रही थी. जब वो अपने लौटने का इंतज़ार कर रहे थे उस वक्त खुद को समझने के लिए उन्होंने एक नया शब्द चुना- 'पोलर बीयर्स'.

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