G7 समूह क्या है और यह क्या करता है?

  • 25 अगस्त 2019
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जी-7 समूह देशों का 45वां शिखर सम्मेलन फ्रांस में हो रहा है. इस सम्मेलन में भारत को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने फ्रांस जाएंगे.

लेकिन ये जी-7 क्या है और इसके सदस्य देश कौन-कौन हैं और यह क्या करता है?

जी-7 क्या है?

जी-7 दुनिया की सात सबसे बड़ी कथित विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों का समूह है, जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमरीका शामिल हैं. इसे ग्रुप ऑफ़ सेवन भी कहते हैं.

समूह खुद को "कम्यूनिटी ऑफ़ वैल्यूज" यानी मूल्यों का आदर करने वाला समुदाय मानता है. स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतंत्र और क़ानून का शासन और समृद्धि और सतत विकास, इसके प्रमुख सिद्धांत हैं.

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यह क्या करता है?

शुरुआत में यह छह देशों का समूह था, जिसकी पहली बैठक 1975 में हुई थी. इस बैठक में वैश्विक आर्थिक संकट के संभावित समाधानों पर विचार किया गया था. अगले साल कनाडा इस समूह में शामिल हो गया और इस तरह यह जी-7 बन गया.

जी-7 देशों के मंत्री और नौकरशाह आपसी हितों के मामलों पर चर्चा करने के लिए हर साल मिलते हैं.

प्रत्येक सदस्य देश बारी-बारी से इस समूह की अध्यक्षता करता है और दो दिवसीय वार्षिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी करता है.

यह प्रक्रिया एक चक्र में चलती है. ऊर्जा नीति, जलवायु परिवर्तन, एचआईवी-एड्स और वैश्विक सुरक्षा जैसे कुछ विषय हैं, जिन पर पिछले शिखर सम्मेलनों में चर्चाएं हुई थीं.

शिखर सम्मेलन के अंत में एक सूचना जारी की जाती है, जिसमें सहमति वाले बिंदुओं का जिक्र होता है.

सम्मलेन में भाग लेने वाले लोगों में जी-7 देशों के राष्ट्र प्रमुख, यूरोपीयन कमीशन और यूरोपीयन काउंसिल के अध्यक्ष शामिल होते हैं.

यूरोपीयन कमीशन के अध्यक्ष ज्यां क्लॉड यंकर हैं, जो स्वास्थ्य कारणों से इस बार के सम्मेलन में भाग नहीं ले रहे हैं. वहीं यूरोपीयन काउंसिल के वर्तमान अध्यक्ष डोनल्ड टस्क हैं, जो इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं.

शिखर सम्मेलन में अन्य देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों को भी भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है. इस साल भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया गया है.

इस बार शिखर सम्मेलन में चर्चा का मुख्य विषय "असमानता के ख़िलाफ़ लड़ाई" है.

हर साल शिखर सम्मेलन के ख़िलाफ़ बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन होते हैं. पर्यावरण कार्यकर्ताओं से लेकर पूंजीवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले संगठन इन विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होते हैं.

प्रदर्शनकारियों को आयोजन स्थल से दूर रखने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है.

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जी-7 कितना प्रभावी?

जी-7 की आलोचना यह कह कर की जाती है कि यह कभी भी प्रभावी संगठन नहीं रहा है, हालांकि समूह कई सफलताओं का दावा करता है, जिनमें एड्स, टीबी और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक फंड की शुरुआत करना भी है. समूह का दावा है कि इसने साल 2002 के बाद से अब तक 2.7 करोड़ लोगों की जान बचाई है.

समूह यह भी दावा करता है कि 2016 के पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने के पीछे इसकी भूमिका है, हालांकि अमरीका ने इस समझौते से अलग हो जाने की बात कही है.

चीन इस समूह का हिस्सा क्यों नहीं है?

चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवथा है, फिर भी वो इस समूह का हिस्सा नहीं है. इसकी वजह यह है कि यहां दुनिया की सबसे बड़ी आबादी रहती हैं और प्रति व्यक्ति आय संपत्ति जी-7 समूह देशों के मुक़ाबले बहुत कम है.

ऐसे में चीन को उन्नत या विकसित अर्थव्यवस्था नहीं माना जाता है, जिसकी वजह से यह समूह में शामिल नहीं है. हालांकि चीन जी-20 देशों के समूह का हिस्सा है, इस समूह में शामिल होकर वह अपने यहां शंघाई जैसे आधुनिकतम शहरों की संख्या बढ़ाने पर काम कर रहा है.

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रूस भी कभी शामिल था?

साल 1998 में इस समूह में रूस भी शामिल हो गया था और यह जी-7 से जी-8 बन गया था. लेकिन साल 2014 में यूक्रेन से क्रीमिया हड़प लेने के बाद रूस को समूह से निलंबित कर दिया गया था.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का मानना है कि रूस को समूह में फिर से शामिल किया जाना चाहिए "क्योंकि वार्ता की मेज पर हमारे साथ रूस होना चाहिए."

जी-7 के सामने चुनौतियां

जी-7 समूह देशों के बीच कई असहमतियां भी हैं. पिछले साल कनाडा में हुए शिखर सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का अन्य सदस्य देशों के साथ मतभेद हो गया था.

राष्ट्रपति ट्रंप के आरोप थे कि दूसरे देश अमरीका पर भारी आयात शुल्क लगा रहे हैं. पर्यावरण के मुद्दे पर भी उनका सदस्य देशों के साथ मतभेद था.

समूह की आलोचना इस बात के लिए भी की जाती है कि इसमें मौजूदा वैश्विक राजनीति और आर्थिक मुद्दों पर बात नहीं होती है.

अफ्रीका, लैटिन अमरीका और दक्षिणी गोलार्ध का कोई भी देश इस समूह का हिस्सा नहीं है.

भारत और ब्राज़ील जैसी तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं से इस समूह को चुनौती मिल रही है जो जी-20 समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन जी-7 का हिस्सा नहीं हैं.

कुछ वैश्विक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जी-20 के कुछ देश 2050 तक जी-7 के कुछ सदस्य देशों को पीछे छोड़ देंगे.

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