अफ़ग़ानिस्तानः ट्रंप ने कहा तालिबान के साथ वार्ता मर चुकी है

  • 10 सितंबर 2019
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अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में 18 साल से जारी युद्ध को ख़त्म करने के इरादे से तालिबान के साथ जो बातचीत हो रही थी वो "मर" चुकी है.

ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से कहा, "जहाँ तक मेरी बात है, तो (मेरे लिए) वो बातचीत मर चुकी है."

अमरीकी राष्ट्रपति को रविवार को कैंप डेविड में तालिबान के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत करनी थी मगर इससे एक दिन पहले ट्रंप ने बैठक रद्द कर दी.

दोनों पक्ष एक समझौते के काफ़ी करीब पहुँच चुके थे.

तालिबान ने अफ़ग़ान शांति वार्ता से पीछे हटने के अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा कि इससे ज़्यादा नुक़सान अमरीका को ही होगा.

अमरीकी राष्ट्रपति ने अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी फ़ौज की वापसी को अपनी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बनाया हुआ है मगर वहाँ मौजूद 14,000 अमरीकी सैनिकों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "हम वहाँ से निकलना चाहते हैं मगर हम सही समय पर वहाँ से बाहर निकलेंगे."

अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने बातचीत ख़त्म करने के अमरीका के फ़ैसले का स्वागत करते हुए इसे सही वक़्त पर उठाया गया सही क़दम बताया है.

क्या कहा ट्रंप ने

अमरीकी राष्ट्रपति ने अंतिम लम्हों में मुलाक़ात रद्द करने के फ़ैसले के पीछे काबुल में हुए कार बम धमाके को ज़िम्मेदार ठहराया जिसमें एक अमरीकी सैनिक समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी. तालिबान ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.

पत्रकारों से बात करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "उन्हें लगा कि लोगों को मारने से वो बातचीत में बेहतर सौदेबाज़ी करने की स्थिति में होंगे....मगर ये एक बड़ी ग़लती थी."

ट्रंप ने कहा, "हमारी मुलाक़ात तय थी. ये मेरा फ़ैसला था और उसे ख़त्म करना भी मेरा ही फ़ैसला है. मैंने किसी और से इस बारे में कोई चर्चा भी नहीं की.

"मैंने कैंप डेविड वार्ता रद्द की क्योंकि उन्होंने ऐसा काम किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था."

अमरीका को होगा ज़्यादा नुक़सानः तालिबान

अफ़ग़ानिस्तानः ट्रंप ने तालिबान से समझौता रद्द किया

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समझौते के क़रीब

अफ़ग़ानिस्तान के लिए विशेष अमरीकी राजदूत ज़ल्मे ख़लीलज़ाद ने गत सोमवार को तालिबान के साथ 'सैद्धांतिक तौर' पर एक शांति समझौता होने का एलान किया था.

प्रस्तावित समझौते के तहत अमरीका अगले 20 हफ़्तों के भीतर अफ़ग़ानिस्तान से अपने 5,400 सैनिकों को वापस लेने वाला था.

हालाँकि अमरीकी राजदूत ने कहा था कि समझौते पर अंतिम मुहर राष्ट्रपति ट्रंप को ही लगानी है.

गुरुवार को काबुल में हुए कार बम धमाके के बाद ये चिंता जताई जाने लगी थी कि तालिबान के साथ वार्ता के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान में आए दिन होने वाली हिंसा बंद नहीं हो पाएगी.

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मज़बूत होता तालिबान

2001 में अमरीकी सैन्य अभियान के बाद से फ़िलहाल पहली बार अफ़ग़ानिस्तान में एक बहुत बड़े हिस्से पर चरमपंथियों का नियंत्रण हो गया है.

तालिबान अभी तक अफ़ग़ान सरकार से बातचीत करने से ये कहते हुए इनकार करते रहे हैं कि वो अमरीका की कठपुतली है.

अमरीका और तालिबान के बीच क़तर में अब तक नौ दौर की शांतिवार्ता हो चुकी है.

प्रस्तावित समझौते में ये प्रावधान था कि अमरीकी सैनिकों की विदाई के बदले में तालिबान ये सुनिश्चित करता कि अफ़ग़ानिस्तान का इस्तेमाल कभी भी अमरीका और उसके सहयोगियों पर हमले के लिए नहीं किया जाएगा.

हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान में कई लोगों को ये आशंका है कि इस समझौते के बाद कहीं दोबारा तालिबान के शासन में लगी पाबंदियों वाला दौर ना आ जाए.

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तालिबान ने 1996 से 2001 तक अफ़ग़ानिस्तान पर शासन किया था.

अफ़ग़ानिस्तान में 2001 में अमरीका की अगुआई में शुरु हुए सैन्य अभियान के बाद से अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेना के लगभग 3,500 सदस्यों की जान जा चुकी है जिनमें 2,300 अमरीकी हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के आम लोगों, चरमपंथियों और सुरक्षाबलों की मौत की संख्या का अंदाज़ा लगाना कठिन है.

2019 में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वहाँ 32,000 से ज़्यादा आम लोगों की मौत हुई है.

वहीं ब्राउन यूनिवर्सिटी के वॉटसन इंस्टीच्यूट का कहना था कि वहाँ 58,000 सुरक्षाकर्मी और 42,000 विद्रोही मारे गए.

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