रॉबर्ट मुगाबे: नायक कैसे बना 'खलनायक'

  • 12 सितंबर 2019
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''शराब मत पियो, सिगरेट मत पियो, कसरत करो और फल-सब्ज़ी खाओ.''

साल 2012 में ने रॉबर्ट मुगाबे ने ये बात तब कही थी जब वो अपना 88वां जन्मदिन मना रहे थे.

''मुझे ईश्वर ने नियुक्त किया है, ईश्वर के अलावा कोई और मुझे हटा नहीं सकता.''

रॉबर्ट मुगाबे ने ये दावा साल 2008 में एक चुनावी रैली के दौरान किया था.

''हम भूखे नहीं है...ये खाना हम पर क्यों थोप रहे हो. हम नहीं चाहते कि हमारा दम घोंटा जाए. हमारे पास जो है, पर्याप्त है.''

रॉबर्ट मुगाबे ने ये दो टूक बात साल 2004 में स्काई टीवी को दिए एक इंटरव्यू में तब कही थी जब ज़िम्बाब्वे खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था.

''क्रिकेट लोगों को सभ्य बनाता है, सज्जन बनाता है. मैं चाहता हूं कि ज़िम्बाब्वे में हर व्यक्ति क्रिकेट खेले. मैं चाहता हूं कि हमारा देश सज्जनों का देश बने.''

रॉबर्ट मुगाबे के ये तमाम बयान उनकी शख़्सियत के अलग-अलग पहलुओं को बयां करते हैं.

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कौन हैं रॉबर्ट मुगाबे?

कुछ के शैतान, कुछ के क्रांतिकारी

मुगाबे के बारे में ये कहा जाता है कि वो उन नेताओं में शुमार रहे जिन्हें लेकर वैश्विक राय हमेशा बंटी रही.

कुछ लोगों को उनमें शैतान और तानाशाह नज़र आया, जिन्हें मुगाबे की वजह से अपनी ज़िंदगी जेल की सलाखों के पीछे गुज़ारनी पड़ी.

वहीं कुछ लोगों के लिए मुगाबे एक क्रांतिकारी हीरो थे, जिन्होंने नस्ली दमन के ख़िलाफ़ जंग लड़ी, जिसने पश्चिमी साम्राज्यवाद और नव-उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ अपना झंडा हमेशा बुलंद रखा.

मौजूदा ज़िम्बाब्वे, अफ्रीकी महाद्वीप में ज़मीन का वो टुकड़ा है जो आज़ाद होने से पहले रोडेशिया कहलाता था.

ब्रिटेन की कॉलोनी होने की वजह से, गोरे यहां संख्या में कम होने के बावजूद शासक थे, जबकि काले बहुसंख्यक होते हुए भी ग़ुलामी का दंश झेल रहे थे.

विरोध करने पर मुगाबे को बिना किसी सुनवाई के जेल भेज दिया गया. एक दशक से ज्यादा समय जेल में बिताने के बाद जब मुगाबे की रिहाई हुई, उन्होंने मोज़ाम्बिक़ जाकर छापामारों की मदद से रोडेशिया को आज़ाद कराने की कोशिश की, और चतुर वार्ताकार की तरह राजनीतिक समझौतों के ज़रिए एक नए और आज़ाद ज़िम्बाब्वे गणराज्य का मार्ग प्रशस्त किया.

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Image caption साल 1960 की इस तस्वीर में सबसे बाईं और बैठे है रॉबर्ट मुगाबे

जंग-ए-आज़ादी में मुगाबे की अहम भूमिका का नतीजा ये हुआ कि साल 1980 में हुए पहले चुनाव में जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाकर सत्ता की चाबी उनके हवाले कर दी.

सत्ता की ये चाबी लगभग चार दशक तक मुगाबे की मुट्ठी में क़ैद रही.

बेहद नाटकीय घटनाक्रम के बीच ज़िम्बाब्वे ने एक नई सुबह साल 2017 में तब देखी जब सेना ने सत्ता पर नियंत्रण करके मुगाबे को इस्तीफ़े के लिए मजबूर कर दिया और इमर्सन मननगागवा देश के नए राष्ट्रपति बने.

'नायक बना खलनायक'

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वर्ष 1980 में आज़ादी के बाद रॉबर्ट मुगाबे के एक भाषण को ज़िम्बाब्वे में लोग आज भी याद करते हैं.

इस भाषण में मुगाबे ने कहा था, ''आप गोरे है या काले, मैं आपको आमंत्रित करता हूं, अपने अतीत को भूलते हुए, माफ़ करते हुए आइए हम एक-दूसरे से हाथ मिलाएं और एक नया ज़िम्बाब्वे बनाएं.''

रॉबर्ट मुगाबे के साथ स्कूल में पढ़े लॉरेंस वॉम्वे इस भाषण को याद करते हुए कहते हैं, ''मुगाबे के ये शब्द कमाल के थे. ये शब्द मेरा सीना चौड़ा कर देते हैं. संघर्ष के बाद जो गोरे लौट कर जा रहे थे, उनमें से कई ने महसूस किया कि ये आदमी बुरा नहीं है और वो यहीं बस गए.''

रॉबर्ट मुगाबे का एक अलग चेहरा साल 1983 में नज़र आया, जब उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को ख़त्म करने के लिए अपनी सेना की एक चुनिंदा ब्रिगेड का इस्तेमाल किया. एक अनुमान के मुताबिक इसमें लगभग 20 हज़ार लोगों को बेरहमी से मारा गया.

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अर्श से फ़र्श तक मुगाबे

ज़िम्बाब्वे में राजनीतिक विश्लेषक जॉन मकुम्बे बताते हैं, ''रॉबर्ट मुगाबे को जब भी किसी ने चुनौती दी, उनका अलग रंग नज़र आया. मसलन यदि किसी ने कैबिनेट से इस्तीफ़े की धमकी दी तो मुगाबे ने इस्तीफ़े को नामंज़ूर करके उसे सीधे बर्ख़ास्त कर दिया.''

राष्ट्रपति मुगाबे के साथ सूचना मंत्री के तौर पर काम चुके जॉनाथन मॉयो, एक और उदाहरण देते हुए बताते हैं, ''जब भी कोई अहम बैठक होती, राष्ट्रपति मुगाबे सबसे आख़िर में पहुंचते. मुगाबे के आने से पहले माहौल बड़ा हल्का-फुल्का रहता, सब आपस में विचार-विमर्श करते, लेकिन जैसे ही मुगाबे का आगमन होता, सब चुप हो जाते और मुगाबे की हां में हां मिलाते.''

मंडेला बनाम मुगाबे

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दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के ख़िलाफ़ लंबा संघर्ष करने वाले नेल्सन मंडेला, मुगाबे के समकालीन थे. मंडेला ने मुगाबे से अधिक समय जेल में बिताया.

साल 1990 में मंडेला के जेल से छूटने के बाद मुगाबे को लगा कि मंडेला के आगे उनका कद छोटा पड़ रहा है.

ब्रिटेन के विदेशमंत्री रहे सर माल्कम रिफकेन याद करते हैं, ''इसमें कोई संदेह नहीं कि मुगाबे अफ्रीका में मुक्ति आंदोलन के एक हीरो थे. लेकिन तभी तक, जब तक कि नेल्सन मंडेला जेल से रिहा नहीं हुए थे. मुगाबे ने मंडेला की रिहाई का स्वागत तो किया, लेकिन वो अफ्रीका में अचानक नंबर दो की पोजीशन पर पहुंच गए थे.''

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चाटुकार, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार

मुगाबे अक्सर चाटुकारों से घिरे रहे और उनकी सरकार कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार में डूबती रही.

मुगाबे की पहली पत्नी सेएली उन चंद लोगों में शुमार थीं, मुगाबे जिनकी थोड़ी-बहुत सुनते थे. लेकिन सेएली के निधन के बाद लोगों को लगा कि मुगाबे को रोकने वाला अब कोई नहीं रहा.

वर्ष 1996 में लोगों को तब हैरानी हुई जब मुगाबे ने अपनी सेक्रेटरी ग्रेस से दूसरा विवाह किया. बेहद ख़र्चीला विवाह समारोह का आयोजन किया गया जिसमें हज़ारों अतिथियों को बुलाया गया.

ग्रेस, मुगाबे से 40 साल छोटी थीं और उनके शौक इतने महंगे थे कि लोग उन्हें अमेज़िग ग्रेस के नाम से बुलाने लगे.

मुगाबे ने देश की जंग-ए-आज़ादी में शामिल हुए वरिष्ठ नागरिकों को लाखों डॉलर भुगतान करने का अप्रत्याशित फ़ैसला करके ज़िम्बाब्वे के बजट को पटरी से उतार दिया. कांगो गणराज्य से क्षेत्रीय युद्ध की वजह से अर्थव्यवस्था ने भी गोता लगाना शुरू किया.

जब विपक्ष ने राष्ट्रपति की शक्तियों को कम करने के लिए संविधान में बदलाव की मांग की, राष्ट्रपति मुगाबे ने हिंसा के ज़रिए इसका आधिकारिक जबाव दिया.

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Image caption इमरसन मननगागवा

लेकिन जब विरोध-प्रदर्शन बढ़ता गया, राष्ट्रपति मुगाबे ने दमन की जगह संविधान पर जनमत संग्रह का रास्ता चुना, जिसे ख़ारिज करके लोगों ने राष्ट्रपति मुगाबे को चुनाव में हराकर पहला बड़ा झटका दिया.

देश में लोकतांत्रिक और संवैधानिक सुधारों की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही थी. हिंसा के हथकंड़े कारगर साबित नहीं हो रहे थे. मुगाबे ने इसका भी तोड़ निकाला और ज़मीन को नए सिरे से लोगों में बांटने का फैसला किया.

लेकिन ज़मीन की बांट, बंदरबाट साबित हुई जिससे हालात और ख़राब हो गए. अर्थव्यवस्था की हालत नाज़ुक होने लगी और विदेशी निवेशकों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए. दम तोड़ती अर्थव्यवस्था की वजह से लाखों लोग ज़िम्बाब्वे छोड़कर चले गए. मुगाबे ने इसका ठीकरा ब्रिटेन के सिर फोड़ा.

हैरानी की बात ये रही कि ब्रिटेन को कोसने के बावजूद मुगाबे अपने दूसरी पत्नी ग्रेस के साथ शॉपिंग करने के लिए लंदन आते रहे.

इसबीच रॉबर्ट मुगाबे को लेकर अमरीका और यूरोपीय परिषद की पाबंदियों की वजह से ज़िम्बाब्वे अलग-थलग पड़ता जा रहा था. चुनाव में धांधली की शिकायतों की वजह से उसे अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना भी करना पड़ रहा था.

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Image caption रॉबर्ट मुगाबे के इस्तीफ़े की मांग करते हुये लोगों का विरोध प्रदर्शन

बदलते समीकरण

फिर साल 2008 में उम्मीद की दुर्लभ किरण नज़र आई जब रॉबर्ट मुगाबे ने अपने विरोधी के साथ मिलकर सरकार बनाई.

हालात कुछ समय के लिए बेहतर हुए लेकिन अगले ही चुनाव में मुगाबे और उनकी पार्टी की इस कदर जीत हुई कि विपक्ष ने इसे धांधली बताकर ख़ारिज कर दिया.

लेकिन मुगाबे फिर भी सत्ता में टिके रहे और उनके तौर तरीक़ों की वजह से अर्थव्यवस्था गोते लगाती रही और आम लोगों की ज़िंदगी दूभर होती रही.

साल 1980 में जिन सपनों को दिखाकर मुगाबे पहली बार सत्ता में आए थे, वो सपने सामाजिक और आर्थिक पैमानों पर चार दशक बाद भी पूरे नहीं हुए.

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नतीजा ये हुआ कि साल 2017 में सेना ने मुगाबे को सत्ता से बेदखल कर दिया और इमरसन मननगागवा को राष्ट्रपति बनाया गया, जो कभी मुगाबे के ही ख़ास आदमी हुआ करते थे.

लेकिन नई सरकार के बावजूद ज़िम्बाब्वे की अर्थव्यवस्था आज भी डांवाडोल है और ग़रीबी अपनी जगह. ज़िम्बाब्वे के लिए फ़िलहाल यही मुगाबे की विरासत है.

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