ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोल्टन की छुट्टी की

  • 11 सितंबर 2019
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अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन की छुट्टी कर दी है.

पिछले तीन वर्षों में इस पद से तीसरी बार किसी को हटाया गया है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने बोल्टन को बताया कि अब उनकी सेवाओं की ज़रुरत नहीं है. उन्होंने कहा कि बोल्टन के कई फ़ैसलों से उन्हें गहरी आपत्ति थी.

ट्रंप ने ट्वीट में कहा, "मैंने जॉन से इस्तीफ़ा मांगा, और आज सुबह मुझे वो सौंप दिया गया."

मगर बोल्टन दावा कर रहे हैं कि उन्हें हटाया नहीं गया बल्कि उन्होंने ख़ुद इस्तीफ़ा दिया है.

जॉन बोल्टन को अप्रैल 2018 में नियुक्त किया गया था. वे माइकल फ़्लिन और एच आर मैक्मास्टर के बाद ट्रंप के तीसरे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे.

ट्रंप और बोल्टन के बीच अमरीका की लगभग हर बड़ी विदेश नीति को लेकर मतभेद रहे हैं जिनमें उत्तर कोरिया, ईरान और वेनेज़ुएला जैसे देशों के मुद्दे शामिल हैं.

मगर समझा जाता है कि उनके रिश्तों का अंत अफ़ग़ानिस्तान को लेकर हुआ जब बोल्टन ने आख़िरी लम्हों में तालिबान के साथ बैठक रद्द करने के अमरीकी राष्ट्रपति के फ़ैसले की आलोचना की.

बोल्टन ने क्या कहा?

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव स्टेफ़नी ग्रिशम ने पत्रकारों से कहा, "राष्ट्रपति को उनकी कई नीतियाँ पसंद नहीं थीं, उनमें मतभेद था."

प्रवक्ता ने बताया कि बोल्टन से सोमवार रात को इस्तीफ़ा मांगा गया और वो मंगलवार सुबह मिल गया.

मगर इस बारे में राष्ट्रपति ट्रंप के ट्वीट के थोड़ी ही देर बाद बोल्टन ने भी ट्विटर का सहारा लेते हुए एक अलग ही कहानी सुनाई.

उन्होंने कहा कि दरअसल उन्होंने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की थी, मगर ट्रंप ने उनसे कहा कि इस बारे में कल बात करते हैं.

बोल्टन ने वाशिंगटन पोस्ट अख़बार के रिपोर्टर रॉबर्ट कोस्टा को टेक्स्ट कर बताया कि "मैं उचित समय पर अपनी बात रखूँगा और मेरी एकमात्र चिंता अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा है".

विदाई से दो घंटे पहले बोल्टन को विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और वित्त मंत्री स्टीवन मैनुशिन के साथ व्हाइट हाउस में एक प्रेस ब्रीफ़िंग करनी थी.

कुछ पत्रकारों ने उन्हें सुबह व्हाइट हाउस में देखा मगर बताया जा रहा है कि वो वहाँ से बिना किसी सुरक्षा के लौट गए.

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ट्रंप और बोल्टन के बीच मतभेद क्यों?

आक्रामक विदेश नीति वाले जॉन बोल्टन ईरान के विरुद्ध ट्रंप की सख़्त नीति के मुख्य कर्ता-धर्ता थे.

मगर उत्तर कोरिया, रूस और अफ़ग़ानिस्तान को लेकर सख़्ती बरतने के प्रयासों में उन्हें वैसी कामयाबी नहीं मिली.

अमरीकी अधिकारी इस साल फ़रवरी में वियतनाम में ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन की बैठक रद्द होने के लिए बोल्टन को ज़िम्मेदार मानते हैं जब उन्होंने ऐसी शर्तें रख दीं जिसे उत्तर कोरिया ने मानने से मना कर दिया.

बोल्टन ने तालिबान के साथ शांतिवार्ता पर भी आपत्ति की थी जिसे ट्रंप ने रद्द कर दिया है.

तालिबान के नेताओं को बातचीत के लिए अमरीका बुलाने की आलोचना की जा रही थी, ख़ासकर तब जब इसका समय 11 सितंबर के हमलों की बरसी के काफ़ी करीब था.

फॉरेन पॉलिसी पत्रिका के अनुसार बोल्टन ये मानते थे कि एक चरमपंथी गुट के नेताओं को कैंप डेविड में बुलाने से एक ग़लत प्रथा चल पड़ेगी.

इस साल के आरंभ में ऐसी ख़बरें आईं कि ट्रंप वेनेज़ुएला में अमरीकी नीति के विफल रहने से ख़फ़ा हैं और वो ये मानते हैं कि बोल्टन ने उन्हें इस बारे में ग़लत सलाह दी कि वेनेज़ुएला से राष्ट्रपति निकोला मादुरो को हटाना कितना आसान होगा.

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