म्यांमार: रोहिंग्या मुसलमानों के गांव उजाड़कर बनाई गई सरकारी इमारतें

  • 11 सितंबर 2019
रोहिंग्या मुसलमान इमेज कॉपीरइट Getty Images

म्यांमार में कई जगहों पर रोहिंग्या मुसलमानों के गांवों को उजाड़ दिया गया है और उनकी जगह पुलिस छावनी, सरकारी इमारतें और शरणार्थी पुनर्वास शिविर बना दिए गए हैं. बीबीसी को अपनी पड़ताल में ऐसे सबूत मिले हैं.

रखाइन प्रांत में एक सरकार प्रायोजित यात्रा के दौरान बीबीसी को चार ऐसी जगहें दिखाई दीं जहां निश्चित रूप से नई इमारतें बनाई गई हैं. इससे पहले यहां सैटेलाइट इमेज में रोहिंग्या मुसलमानों की बस्ती नज़र आती थी.

हालांकि अधिकारियों ने गांवों में इमारतें बनाने से इनकार किया है. रखाइन वो इलाका है, जहां मुख्य रूप से रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी रहती थी.

साल 2017 में एक सैन्य अभियान के दौरान सात लाख से ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमानों को पलायन करना पड़ा था.

संयुक्त राष्ट्र ने इसे "नस्ली सफ़ाया" क़रार दिया था लेकिन म्यांमार ने अपने सुरक्षाबलों पर लगे आरोपों से इनकार किया था.

बौद्ध बहुल म्यांमार शुरू से इससे इनकार करता आया है कि उसकी सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों का 'नस्ली सफ़ाया' या 'जनसंहार' किया. पलायन के बाद बड़े पैमाने पर रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाक़ों में रह रहे हैं. अब म्यांमार सरकार ने कहा है कि वो कुछ शरणार्थियों को वापस लेने के लिए तैयार है.

दूसरी तरफ़, वापस आने के इच्छुक 3,450 लोगों में से किसी को म्यांमार की ओर से मंजूरी नही मिली, इस वजह से बीते महीने रोहिंग्या शरणार्थियों को स्वदेश भेजने का दूसरा प्रयास विफल हो गया.

रोहिंग्या मुसलमानों ने 2017 में हुए अत्याचारों के लिए जवाबदेही की कमी का हवाला दिया. साथ ही उन्हें घूमने-फिरने की आज़ादी या नागरिकता देने के बारे में कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया.

म्यांमार ने इस विफलता के लिए बांग्लादेश को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि वह वापस आने के इच्छुक रोहिंग्या मुसलमानों की एक बड़ी संख्या को बुलाने के लिए तैयार है.

यह दिखाने के लिए उसने बीबीसी और अन्य मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को आमंत्रित किया था.

ये भी पढ़ें: 'बीबीसी के नाम' पर वायरल की जा रही रोहिंग्या तस्वीर ग़लत: फैक्ट चेक

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कैसे पहुंची बीबीसी की टीम?

रखाइन में आम तौर पर प्रवेश प्रतिबंधित है. इसलिए हमने एक सरकारी काफ़िले में यात्रा की और हमें पुलिस निरीक्षण के बिना वीडियो शूट करने या लोगों से साक्षात्कार करने की अनुमति नहीं दी गई थी.

इसके बावजूद हम रोहिंग्या समुदायों को जानबूझकर हटाने के स्पष्ट साक्ष्य देखने में सफल रहे.

सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण करने वाली ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि 2017 की हिंसा में कम से कम 40 फ़ीसदी रोहिंग्या गांवों को नुकसान पहुंचा था और उसके बाद उन्हें पूरी तरह उजाड़ दिया गया.

म्यामांर में बीबीसी को क्या मिला?

सरकार हमें 'हला पोई कउंग'शिविर ले गई. कहा जा सकता है कि यह वापस आने वाले 25 हज़ार लोगों का घर है, जो स्थायी आवास में जाने से पहले दो महीना यहां रुक सकते हैं.

करीब साल भर पहले बनाए गए शिविर की स्थिति दयनीय है. सार्वजनिक शौचालय दूर-दूर हैं.

यह रोहिंग्याओं के दो गांवों 'हाव रि तू लार' और 'थार जे कोने' की ज़मीन पर बनाया गया है जिन्हें 2017 की हिंसा के बाद ध्वस्त कर दिया गया था.

इमेज कॉपीरइट Maxar Technologies
Image caption 16 सितंबर, 2017 की सैटेलाइट तस्वीर

हमने जब शिविर के प्रशासक सोई शवे अउंग से पूछा कि उन्होंने गांवों को क्यों उजाड़ दिया तो उन्होंने किसी भी तरह के तोड़फोड़ से इंकार किया.

फिर जब हमने सैटेलाइट तस्वीरों का ज़िक्र किया उन्होंने कहा कि वह हाल ही में नौकरी पर आए हैं और इस बारे में जवाब नहीं दे सकते.

इमेज कॉपीरइट Maxar Technologies
Image caption 23 दिसंबर, 2018 को ली गई तस्वीर

इसके बाद हम एक नए स्थान क्येंइन चउंग पर बनाए गए एक शिविर गए, जहां वापस आने वाले शरणार्थियों के लंबे समय तक रहने के लिए जापान और भारत की ओर से दी गई राशि से घर बनाए गए हैं.

इस शिविर के लिए म्यार जिन के नाम से जाने जाने वाले रोहिंग्याओं के एक गांव को ज़मींदोज कर दिया गया जो बॉर्डर गार्ड पुलिस की एक विशाल बैरक के करीब है.

यह सुरक्षा बलों की वो इकाई है जिस पर 2017 में रोहिंग्या के साथ गंभीर दुर्व्यवहार करने का आरोप है. ऑफ़ कैमरा बातचीत में अधिकारियों ने म्यार जिन में तोड़फोड़ की बात स्वीकार की.

इमेज कॉपीरइट Maxar Technologies
Image caption 22 सितंबर 2017 की तस्वीर

मुख्य शहर मउंगडाउ के ठीक बाहर स्थित मयो थू गयी में एक समय 8,000 से ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमान रहते थे.

सितंबर 2017 में जब मैं एक अन्य सरकारी काफ़िले में गया था, तब हमने मयो थू गयी की शूटिंग की थी.

उस समय कई घरों को जला दिया गया था लेकिन बड़ी संख्या में इमारतें बची हुई थीं और रखाइन गांवों के आस-पास तब भी पेड़ थे. लेकिन अब मयो थू गयी जाते समय भारी संख्या में सरकारी और पुलिस इमारत नजर आते हैं और वहां के पेड़ गायब हो चुके हैं.

इमेज कॉपीरइट Maxar Technologies
Image caption 19 अप्रैल, 2019 की तस्वीर

हमें इन्न डिन भी ले जाया गया जो सितंबर 2017 में मुसलमानों के जनसंहार के आरोपों की वजह से एक बदनाम गांव है. यह म्यांमार सेना द्वारा स्वीकार किए गए कुछ अत्याचारों में से एक है.

इन्न डिन में करीब तीन चौथाई जनसंख्या मुसलमानों की थी और बाकी आबादी रखाइन बौद्धों की थी. यहां रोहिंग्याओं के घरों के पास जो पेड़ थे, वे अब गायब हैं.

उनकी जगह कांटेदार तार के बाड़ों के भीतर बॉर्डर गार्ड पुलिस के लिए एक बहुत बड़ी नई बैरक बना दी गई है.

रखाइन बौद्ध निवासियों ने हमें बताया कि वो अपने पड़ोस में मुसलमानों की रिहाइश को कभी स्वीकार नहीं करेंगे.

ये भी पढ़ें: रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में झूठी ख़बर का पूरा सच

इमेज कॉपीरइट Getty Images

शरणार्थियों के लिए इसका मतलब क्या मतलब हुआ?

साल 2017 में सैन्य कार्रवाई ख़त्म होने के बाद रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ व्यापक और लगातार कार्रवाई होती रही जिसके कारण उनका वहां जाना और फिर से जीवन शुरू करना मुश्किल लगता है.

लौटने वाले शरणार्थियों के लिए हला पोई कउंग जैसे जीर्ण-शीर्ण ट्रांज़िट शिविरों और क्येइन चउंग जैसे स्थानांतरित किए गए शिविरों में केवल तैयारियां नजर आ रही हैं.

इससे रोहिंग्याओं को वापस लाने की सार्वजनिक प्रतिबद्धता की ईमानदारी को लेकर सवाल खड़ा होता है.

यंगून वापस आते समय हम एक विस्थापित रोहिंग्या नौजवान से मिलने में सफल हुए. हम सतर्क थे क्योंकि बिना अनुमति के विदेशियों को रोहिंग्याओं से मिलने की अनुमति नहीं थी.

2012 में भड़की एक हिंसा के बाद उसे सितवे स्थित अपने घर से पलायन करना पड़ा और वह सात साल तक आईडीपी शिविर में अपने परिवार के साथ फंसा रहा. उस हिंसा में एक लाख 30 हज़ार रोहिंग्या विस्थापित हुए थे.

वह नौजवान बिना अनुमति के विश्वविद्यालय या शिविर से बाहर नहीं जा सकता. उसने बांग्लादेश में रहने वाले शरणार्थियों को वापस आने का जोख़िम न उठाने और उन्हें उसकी तरह संरक्षित शिविरों तक सीमित रहने की सलाह दी.

ये भी पढ़ें: रोहिंग्या मुसलमान घर वापसी से क्यों डर रहे हैं

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सरकार का क्या कहना है?

हमने रखाइन में अपने तथ्यों पर म्यांमार सरकार के प्रवक्ता से संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन हमें जवाब नहीं मिल पाया.

अधिकारिक तौर पर सरकार बांग्लादेश के साथ सहयोग से शरणार्थियों की एक चरणबद्ध वापसी की प्रतिबद्धता जता चुकी है.

बांग्लादेश सरकार ने रोहिंग्या शरणार्थियों की नागरिकता और गतिविधि की स्वतंत्रता की गारंटी के आग्रहों को ठुकरा दिया है. वह उन्हें 'राष्ट्रीय सत्यापन कार्ड' देने को तैयार है.

हालांकि अधिकांश रोहिंग्याओं ने यह कार्ड लेने से इंकार कर दिया है क्योंकि ऐसे में उन्हें ख़ुद की पहचान बंगालियों के रूप में बतानी ज़रूरी हो जाएगी.

सितंबर 2017 की शुरुआत में जब रोहिंग्याओं के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान चरम पर था, म्यांमार सशस्त्र बल के जनरल मिन आंग हलांग ने कहा था कि वे 1942 से अधूरा छोड़े गए काम को पूरा कर रहे हैं.

वह रखाइन में जापानी और ब्रिटिश बलों के बीच संघर्ष का हवाला दे रहे थे जिसमें रोहिंग्या और रखाइन बौद्ध एक दूसरे के खिलाफ़ लड़ रहे थे. वे अक्सर एक दूसरे की हत्या कर देते थे और इस कारण भारी पैमाने पर नागरिकों का विस्थापन हुआ.

कमांडर ने कहा कि मुसलमान आज की तारीख़ में बांग्लादेश से लगी सीमा से उत्तरी रखाइन राज्य में घुस आए.

सीमा पर मउनगडाउ और बुथिडाउंग ज़िलों में जहां 2017 के बाद से सबसे ज़्यादा गांवों को उजाड़ा गया है, वह म्यामांर का इकलौता मुस्लिम बहुल इलाक़ा था.

रोहिंग्याओं के जाने के बाद से यहां सिर्फ़ दस फ़ीसदी मुसलमान बचे हैं. अब वे यहां अल्पसंख्यक हैं.

ऐसा लगता है कि प्रामाणिक जांच, आवाजाही की आज़ादी या नागरिकता पर साफ़ रास्ता देने से इनकार किए जाने के कारण, वापस आने के इच्छुक शरणार्थी भी वापस नहीं लौट पाएंगे.

संभवत: 'अधूरा काम' अब पूरा हो गया है.

ये भी पढ़ें: विशेष अवसरों में ऐसे तैयार होती हैं रोहिंग्या लड़कियाँ

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार