अफ़ग़ानिस्तान में आया तालिबान तो भारत का क्या होगा?

  • 11 सितंबर 2019
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अफ़ग़ानिस्तान में लंबे समय से जारी गृहयुद्ध को ख़त्म की कोशिश करने वाली अमरीका और तालिबान की बातचीत को चाहे तोड़ दिया गया हो, सवाल उठ रहे हैं, इस पूरी तस्वीर में भारत कहां है?

भारत ने सालों अफ़ग़ानिस्तान में शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं के सुधार में सहायता दी है लेकिन दोहा में पिछले क़रीब एक साल से जारी नौ दौर की बातचीत में न अफ़ग़ानिस्तान सरकार शामिल थी, न भारत.

भारत में चिंता है कि अगर भविष्य की अफ़ग़ानिस्तान की सरकार में तालिबान का असर रहा तो ये उसके लिए अच्छी ख़बर नहीं होगी.

तालिबान पाकिस्तान के नज़दीक है और भारत-पाकिस्तान के रिश्ते जग-ज़ाहिर हैं.

5 सितंबर को काबुल के बेहद सुरक्षित ग्रीन ज़ोन में तालिबान के एक कार बम हमले में 12 लोग मारे गए थे जिसमें एक अमरीकी सैनिक भी था. उसके बाद एक ट्वीट से अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ बातचीत के ख़त्म होने की घोषणा की.

इस घोषणा के बाद अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा में तेज़ी आई है.

ग्रीन ज़ोन में कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इमारते हैं, जैसे अफ़ग़ानिस्तान सुरक्षा सर्विस नेशनल डायरेक्टोरेट ऑफ़ सिक्योरिटी का दफ़्तर और अमरीकी दूतावास.

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दोनो पक्षों के बीच बातचीत के बाद ड्राफ़्ट सहमति पत्र पर सहमति भी बन चुकी थी.

अमरीकी सेना के वापस जाने के एवज़ में तालिबान इस बात पर राज़ी हुए कि वो ये सुनिश्चित करेंगे कि कोई चरमपंथी संगठन अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के ख़िलाफ़ न करे. अफ़ग़ानिस्तान में अभी भी क़रीब 14,000 अमरीकी सैनिक हैं.

लेकिन हिंसा का चक्र फिर से शुरू हो गया है.

भारत की चिंता

9-11 के हमलों में अमरीका में क़रीब 3,000 लोग मारे गए थे, जिसके लिए अमरीका ने इस्लामी चरमपंथी गुट ओसामा बिन लादेन को ज़िम्मेदार माना. ओसामा बिन लादेन उन दिनों अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की शरण में थे.

अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और तालिबान को सत्ता से हटा दिया लेकिन तालिबान पूरी तरह ग़ायब नहीं हुए और उन्होंने धीरे-धीरे अपनी जड़ें मज़बूत की.

तभी से अमरीका और उसके सहयोगी देशों की कोशिश रही हैं कि वो तालिबान के हमलों को बंद कर पाएं लेकिन ऐसा नहीं हो सका है.

लंबे समय से बाहरी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक मामलों में दख़ल देना जारी रखा है और इसे अफ़ग़ानिस्तान की आज की परिस्थिति के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है. चाहे वो उस वक़्त के सोवियत यूनियन हो, या फिर अमरीका या पाकिस्तान.

अफ़ग़ानिस्तान में भारत एक दोस्त की तरह देखा जाता है जिसने अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया है.

अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत के दौरान भारत के कुछ हलक़ों में चिंता थी कि अगर भविष्य की अफ़ग़ानिस्तान सरकार में तालिबान की महत्वपूर्ण भूमिका रही तो अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन को भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है, ख़ासकर तब जब तालिबान को पाकिस्तान के नज़दीक देखा जाता है और पूर्व में भारत विरोधी चरमपंथी गुट अफ़ग़ानिस्तान में अपने ट्रेनिंग कैंप लगाते रहे हैं.

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इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान में भारत के सालों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक निवेश का क्या होगा और लोगों के बीच संपर्क कैसे जारी रह पाएगा.

भारत में ये भी चिंता थी कि इस बातचीत में अफ़ग़ान सरकार भी शामिल नहीं है. भारत और अफ़ग़ान सरकार के संबंध बहुत अच्छे हैं.

तालिबान का कहना था कि वो पहले अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना को हटाने पर बात करेंगे, और उस पर सिर्फ़ अमरीका ही बात कर सकता है. तालिबान अफ़ग़ानिस्तान सरकार को अमरीका की "कठपुतली" मानते हैं जो "अफ़ग़ान लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करती."

भारत में इन चिंताओं पर पूर्व राजनयिक एमके भद्रकुमार के मुताबिक़ अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत में भारत ज्यादा सहयोग नहीं कर सकता.

वो कहते हैं, "अगर अमरीका भारत के साथ ज़्यादा दिखता तो इससे बिना बात के पाकिस्तान नाराज़ होता. अमरीका ने भारत को इस बातचीत पर ज़रूरत के हिसाब से मामलों से अवगत कराकर रखा हुआ है. चाहे वो वॉशिंगटन या दिल्ली में राजनयिकों के माध्यम से हो या फिर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका के विशेष दूत ज़िलमय ख़लीलज़ाद को भारत भेजना हो."

ऐसे वक़्त जब भारत में ये बहस चल ही रही थी, ट्रंप ने बातचीत ख़त्म करने की घोषणा कर दी.

काबुल में एक पत्रकार ने बताया अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत ख़त्म होने की घोषणा पर अफ़ग़ानिस्तान सरकार ख़ुश है और स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि एक अमरीकी सैनिक की मौत पर अमरीका ने इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया और अमरीका-तालिबान की बातचीत के दौरान तालिबान हमलों में जो अफ़ग़ान मारे गए, उनकी ज़िंदगी का क्या.

अफ़ग़ानिस्तान के कुछ हलक़ों में उम्मीद है कि ये बातचीत फिर शुरू होगी. यानि भारत की चिंता ख़त्म नहीं हुई हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में पूर्व सांसद फ़ौज़िया कूफ़ी कहती हैं, "मुझे लगता है कि बातचीत दोबारा शुरू होगी.... अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध का कोई विकल्प नहीं है. क्योंकि युद्ध में कोई नहीं जीतेगा."

क्या भारत को तालिबान से सीधा संपर्क साधना चाहिए?

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भारत ने अभी तालिबान से सीधा राजनयिक संपर्क स्थापित करने से गुरेज़ किया है.

लंदन में बीबीसी पश्तो सेवा में संपादक दाउद आज़मी इस नीति पर सवाल उठाते हैं.

वो कहते हैं, "चाहे पाकिस्तान हो, ईरान हो, चीन हो या रूस या उज़बेकिस्तान, ये सारे लोग तालिबान से मिलते हैं, उन्हें बुलाते है, बातचीत करते हैं. और उन्होंने ये ऑफ़र भी किया है कि हम अफ़ग़ान शांति वार्ता में शामिल होने के लिए तैयार हैं. अगर हिंदुस्तान सरकार ये फ़ैसला कर ले कि हमें तालिबान के साथ मिलना है और बातचीत करनी है, तो तालिबान इसका पॉज़िटिव रिस्पांस देंगे.''

दाउद आगे कहते हैं, "मेरा ख्याल है कि हिंदुस्तान की तरफ़ से कोई इशारा आ जाए तो तालिबान तैयार होंगे कि हिंदुस्तान के साथ बैठ जाएं और बातचीत करें…. जो अमरीका और तालिबान के साथ समझौता हो रहा था, उसमें भी लिखा था कि तालिबान इसकी गारंटी देंगे कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल कोई गुट किसी दूसरे देश के ख़िलाफ़ नहीं करेगा. अगर ये गारंटी लागू हो जाए तो इसमें हिंदुस्तान का भी फ़ायदा होगा.''

"तालिबान मेरे ख्याल में चाहते हैं कि वो हिंदुस्तान के साथ भी बैठ जाएं. क्योंकि तालिबान की कुछ सालों में ये नीति रही है कि अलग-अलग देशों के साथ उनके रिश्ते अच्छे हों और ताल्लुक़ात बन जाएं. इसी सिलसिले में वो मॉस्को भी गए हैं, ईरान भी गए हैं, चीन भी गए हैं. और पाकिस्तान भी गए हैं.

"हिंदुस्तान की ये शिकायत रही है कि अफ़ग़ानिस्तान में ऐसे ग्रुप्स हैं जो वहां पनाह लेते हैं लेकिन उनका असल टार्गेट हिंदुस्तान होता है… अगर ये समझौता हो जाए तो सारे इलाक़े का फ़ायदा होगा. लेकिन हिंदुस्तान की इस्टैब्लिशमेंट की कोई पॉलिसी रही है कि हम तालिबान के साथ बातचीत नहीं करेंगे.... मैं ये कोई सलाह नहीं देना चाहता क्योंकि मैं हिंदुस्तान की सरकार का एडवाइज़र नहीं हूं."

कुछ हलक़ों में भारत के जम्मू-कश्मीर पर तालिबान के वक्तव्य को इसी सोच से देखा जा रहा है.

पाँच अगस्त को भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी कर वहां इंटरनेट, टेलिफ़ोन कनेक्शन काटकर सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी.

मीडिया में छपे एक वक्तव्य में तालिबान ने दोनों भारत और पाकिस्तान से "शांति और सोच-समझ रास्ते के इस्तेमाल" को चुनने को कहा था.

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पाकिस्तान के पेशावर में वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई के मुताबिक़ तालिबान के इस वक्तव्य से पाकिस्तान में कई लोगों को आश्चर्य हुआ.

तालिबान के इस बयान के कारणों को लेकर एक सोच है कि तालिबान एक ज़िम्मेदार देश के नेता की तरह व्यवहार करते दिखना चाहते हैं और इसलिए ऐसे वक्तव्य दे रहे हैं. एक और सोच है कि ऐसे वक्तव्य देकर तालिबान अफ़ग़ान लोगों को ये संदेश देना चाहते हैं कि वो पाकिस्तान की 'कठपुतली' नहीं हैं.

पूर्व राजनयिक एमके भद्रकुमार के मुताबिक़ इस वक्तव्य का भारत के लिए दूसरा संदेश भी हो सकता है, और "वो ये कि अगर भारत तालिबान के पीछे आता है तो भारत को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है."

वो कहते हैं, "ग्रीन ज़ोन पर हमला अमरीका के लिए एक संदेश था, और वो ये कि अगर अमरीका के भेजे गए लड़ाकू विमान, बम आम अफ़ग़ान लोगों के गांवों में लोगों को मार रहे हैं तो ये सोचना कि ग्रीन ज़ोन में रह रहे अमरीकी सुरक्षित हैं, ये ग़लत है. हर ऐक्शन का रिएक्शन होता है. भारत के लिए तालिबान का संदेश है कि वैसे तो उन्हें भारत से कोई दुश्मनी नहीं है और भारत के साथ लेनदेन के लिए तैयार हैं. हमें सिर्फ़ कूटनीतिक रूप से धैर्य रखना होगा."

"तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान के बाहर एजेंडा नहीं है... वो परंपरागत इस्लाम को मानते हैं. वो वैश्विक जिहादी मूवमेंट का हिस्सा नहीं हैं. 9-11 को जो हुआ वो 90 के दशक में तालिबान और अमरीका के रिश्तों की उपज थी जो आज प्रासंगिक नहीं है."

काबुल में एक पत्रकार के मुताबिक़ चाहे तालिबान भारत के साथ बेहतर संबंध चाहे, पाकिस्तान ऐसा नहीं होने देगा, ख़ासकर जिस तरह से उनका तालिबान पर कंट्रोल है और ऐसे वक़्त जब तालिबान के नेता, उनका परिवार पाकिस्तान के शहरों में रहता है, वो वहां की सुविधाओं का लाभ उठाते हैं."

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उधर काबुल में पूर्व सांसद फ़ौज़िया कूफ़ी को भारत से उम्मीद है वो तालिबान से बातचीत की बजाय अफ़ग़ानिस्तान की लोकतांत्रिक आवाज़ों को मज़बूत करने में मदद करेगा.

वो कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में भारत को एक पार्टनर के तौर पर देखा जाता है जो अफ़ग़ानिस्तान की बेहतरी चाहता है. यहां भारत की इज़्ज़त है. अफ़ग़ानिस्तान के स्थायित्व में भारत का महत्वपूर्ण रोल है, और ज़रूरी है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में इंगेज रहे."

भविष्य की अफ़ग़ान सरकार में तालिबान का रोल तय?

पूर्व राजनयिक एमके भद्रकुमार मानते हैं कि आज नहीं तो कल, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का सत्ता में आना तय है और भारत भी ये समझे कि अफ़ग़ानिस्तान को लेकर पाकिस्तान में चिंता उचित है जैसे भारत में नेपाल और भूटान को लेकर है.

एमके भद्रकुमार कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में कोई भी तालिबान का टेकओवर रोक नहीं सकता. जानकार भारतीय राजनयिक समझते हैं कि अमरीका की हवाई शक्ति के बिना अफ़ग़ान सेना कुछ ही हफ़्तों में बिखर जाएगी और कुछ ही वक़्त में तालिबान सरकार को टेकओवर कर लेगा."

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वो कहते हैं, "अगर किसी भी देश के दूसरे देश के साथ दो या ढाई हज़ार किलोमीटर का खुला बॉर्डर होगा तो ये उसके लिए चिंता का विषय होगा. पाकिस्तान चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में जो सरकार हो, उसके साथ उसके दोस्ताना संबंध हों ताकि डूरंड लाइन को माना जा सके.... अगर पाकिस्तान ने अमरीका के साथ सहयोग शुरू कर दिया है तो इसका मतलब है कि अमरीका मानता है कि पाकिस्तान की चिंताएं उचित हैं. इसका मतलब ये कि काबुल में सरकार पाकिस्तान की दोस्त होगी और इससे अमरीका को कोई समस्या नहीं है."

डूरंड रेखा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय रेखा है लेकिन कई अफ़ग़ान इसे मानने से इनकार करते हैं.

एमके भद्रकुमार के मुताबिक़ ये मानना भी ग़लती होगी कि तालिबान पाकिस्तान की जेब में हैं.

वो कहते हैं, "मैं तालिबान को बरसों से जानता हूँ. उनकी एक स्वतंत्र पहचान भी है. ये नहीं है कि तालिबान वही करते हैं जो पाकिस्तान चाहता है. पाकिस्तान की भी ज़रूरत है कि वो तालिबान के साथ चले. ये एक जटिल रिश्ता है जहां पाकिस्तान का प्रभाव अच्छा ख़ासा है लेकिन ये प्रभाव सब कुछ नहीं है."

वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार और दोहा में अमरीका-तालिबान बातचीत कवर करने वाले रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई भी मानते हैं कि तालिबान अपने फ़ायदे के लिए काम करेंगे.

वो कहते हैं, "ऐसा नहीं होगा कि तालिबान पाकिस्तान के फ़ायदे के लिए काम करेंगे. वो अपने फ़ायदे के लिए काम करेंगे. वो अफ़ग़ान हैं, वो अफ़ग़ानिस्तान की बात करेंगे, पाकिस्तान की नहीं. लेकिन ये भी सही है कि तालिबान पाकिस्तान के ज़्यादा नज़दीक रहे हैं और रहेंगे. कारण है कि उनकी परिवार यहां हैं. पाकिस्तान में आना, रहना उनकी ज़रूरत है. वो पाकिस्तान से ताल्लुक़ बनाकर रहेंगे, बिगाड़ेंगे नहीं."

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एमके भद्रकुमार के मुताबिक़ विभिन्न गुटों में बंटी हुई अफ़ग़ान राजनीति में चाहे जो भी परिस्थिति हो भारत अपनी जगह बना लेगा, जैसा कि उसने पूर्व में किया है.

वो कहते हैं, "जब अफ़ग़ानिस्तान में नजीब सरकार गिरी और मुजाहिद्दीन ने टेकओवर कर लिया तब हमारे उनसे कोई संबंध नहीं थे. मैं पहला व्यक्ति था जो अफ़ग़ानिस्तान में अहमद शाह मसूद से मिला. (उस वक़्त के प्रधानमंत्री) नरसिम्हा राव का संदेश साफ़ था - हमारा कोई पसंदीदा नहीं है. जो सत्ता में होगा हम उससे डील करेंगे और अफ़ग़ानिस्तान से हमारे संबंध का बेस है आम लोगों के बीच संपर्क.... ज़रूरी है कि हम अफ़ग़ानिस्तान की आंतरिक मामलों, वहां की गुटबाज़ी में न फंसे.... जो भी सत्ता में होगा, हम उसके हिसाब से ख़ुद को ढाल लेंगे, हम उनसे बातचीत करेंगे और कोशिश करेंगे कि वो हम हमसे क्या चाहते हैं ताकि हम उनकी उम्मीदों को पूरा कर सकें."

भारत-पाक रिश्तों का अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्तों पर असर

पाकिस्तान चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत का असर कम हो और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल न हो.

भारत की कोशिश है कि उसके अफ़ग़ान सरकार के साथ अच्छे ताल्लुक़ बरक़रार रहें और अफ़ग़ानिस्तान या फिर भविष्य की अफ़ग़ान सरकार में तालिबान का असर इतना न बढ़े कि वो भारत के लिए मसला पैदा करे.

यानि भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों का असर दोनो देशों के अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्तों पर पड़ता है.

काबुल में पूर्व सांसद फ़ौज़िया कूफ़ी कहती हैं, "भारत और पाकिस्तान को अपनी आंतरिक मामलों को अफ़ग़ानिस्तान से अलग रखना चाहिए. हमने पहले ही बहुत बड़ी क़ीमत अदा कर चुके हैं."

बीते वक़्त और आज के अफ़ग़ानिस्तान में बड़ा अंतर है.

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एक वक़्त था जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान विरोधी गुट नॉर्दर्न अलायंस था और भारत उसका समर्थन करता था और आज जब तालिबान और अमरीका के बीच बातचीत अंत तक पहुंचने से ठीक पहले रद्द कर दी गई है, भारत क्या करे?

अमरीका और तालिबान के बीच समझौते के बाद बात हो रही थी, अफ़ग़ानों की आपसी बातचीत की - इस पर कि चुनाव किस वक़्त होगा, कौन सा संवैधानिका संशोधान होना है या फिर भविष्य का अफ़ग़ानिस्तान कैसा होना चाहिए.

एमके भद्रकुमार कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में ये बदलाव का दौर है और इस दौर में बहुत परेशान होने की ज़रूरत नहीं. इस बदलाव के बाद नई सरकार सत्ता में आएगी और उस वक़्त भारत को दोबारा शुरुआत करनी होगी. हमें ध्यान देना होगा कि हम कोई बेवक़ूफ़ी न करें. और वो सबसे महत्वपूर्ण बात होगी - कि हम ऐसी को बेवक़ूफ़ी न करें जिससे तालिबान नाराज़ हों."

उधर काबुल में पूर्व सांसद फ़ौज़िया कूफ़ी कहती हैं, "अगर अफ़ग़ान तालिबान के सामने घुटने टेक देते हैं तो ये भारत के लिए ही नहीं अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र के लिए भी ख़तरा होगा."

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