सऊदी अरब और रूस कैसे तेल की वजह से क़रीब आए

  • 13 सितंबर 2019
अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान

प्रिंस अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान सऊदी अरब के नए ऊर्जा मंत्री बने हैं.

क्राउन प्रिंस के सौतेले भाई मोहम्मद बिन सलमान अब्दुलअज़ीज़ ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ (ओपेक) में कई वार्ताओं में प्रमुख भूमिका निभाई है.

अपने पहले सार्वजनिक भाषण में ऊर्जा मंत्री ने कहा कि तेल उत्पादन कम करने पर 'ओपेक प्लस' में बनी सहमति के बाद वो इस नीति को आगे बढ़ाएंगे. 'ओपेक प्लस' दरअसल तेल उत्पादक देशों के संगठन और रूस और अन्य देशों के बीच गठबंधन है.

अब्दुल अज़ीज़ ने अबू धाबी में एक ऊर्जा सम्मेलन को संबोधित करते हुए सोमवार को कहा, "अब हमारे पास एक नया परिवार है, 'ओपेक प्लस'."

उन्होंने कहा, "हम जल्द ही इस गठबंधन का जश्न मनाएंगे, जो हमें एकता के सूत्र में जोड़े रखेगा, मरते दम तक."

उन्होंने साफ़ कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ गठबंधन लंबे समय तक चलेगा.

असल में अब्दुल अज़ीज़ उस टीम का हिस्सा थे जो रूस के साथ 2016 के अंत तक तेल उत्पादन में कटौती के समझौते को अंतिम रूप देने में शामिल रही, ताकि तेल की क़ीमतें बढ़ें. इस समय सीमा को अब मार्च 2020 तक बढ़ा दिया गया है.

हाल ही में कच्चे तेल की क़ीमतें ब्रेंट के प्रति बैरल के लिए 60 अमरीकी डॉलर पर स्थिर हो गई हैं. ये क़ीमत सऊदी अरब और रूस की उम्मीदों से काफ़ी कम है.

तेल उत्पादन पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देश अपने आर्थिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस क़ीमत में 20 अमरीकी डॉलर की बढ़ोतरी चाहते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

तेल से आगे जाने वाला रिश्ता

वॉशिंगटन के ग्लोबल एनर्जी सेंटर फ़ॉर अटलांटिक काउंसिल के निदेशक रैंडोल्फ़ बेल ने कहते हैं, "रूस सऊदी अरब का मुख्य सहयोगी बन चुका है."

वो कहते हैं, "साल 2014 और 2016 में तेल की क़ीमतों में नाटकीय रूप से आई गिरावट के बाद 'ओपेक प्लस' समझौता हाल के सालों में तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी की मांग से संबंधित है."

बेल के अनुसार, "सऊदी अरब और पुतिन की सरकारों के बीच रिश्तों की जड़ें तेल सहयोग से कहीं अधिक गहरी हैं."

"सउदी अरब ने रूस में परियोजनाओं में क़रीब ढाई अरब डॉलर का निवेश किया है."

हालांकि अब्दुलअज़ीज़ को कच्चे तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा.

ये काम बहुत आसान नहीं है, ये देखते हुए कि अमरीका ने पिछले पांच सालों में अपने तेल उत्पादन को बढ़ा दिया है.

और अब अमरीका और चीन के बीच ट्रेड वॉर वजह से वैश्विक आर्थिक विकास दर और साथ ही साथ तेल की मांग को ख़तरा पैदा हो गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ये संभव है कि अगले साल तेल उत्पादक देशों का ये संगठन तेल कटौती के नए लक्ष्य की घोषणा करे.

अमरीका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ टुलस में स्कूल ऑफ़ एनर्जी, पॉलिटिकल एंड ट्रेड इकोनॉमिक्स के निदेशक टॉम सेंग के अनुसार, "मौजूदा दरों पर न तो रूस और ना ही सऊदी अरब अपने बजट खर्चों के लक्ष्य को हासिल कर सकता है."

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption साल 2016 के अंत तक तेल उत्पादन में कटौती पर मोहम्मद बिन सलमान और पुतिन के बीच सहमति बनी थी. अब ये सीमा मार्च 2020 तक बढ़ा दी गई है.

पुतिन की महत्वकांक्षा

सेंग कहते हैं, "चूंकि अभी ये अपनी इच्छा से किए गए समझौते है इसलिए ओपेक रूस के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करना चाह रहा है."

क्योंकि मॉस्को इस गठबंधन से कभी भी पीछे हट सकता है.

ओपेक के तीन सबसे बड़े तेल उत्पादक देश- सऊदी अरब, इराक़ और संयुक्त अरब अमीरात, क़ीमतों को बढ़ने देने के लिए तेल उत्पादन में कटौती की नीति में हमेशा से रुचि दिखाते रहे हैं.

लेकिन रूस का रुख़ साफ़ नहीं है, जबकि वार्ताओं में उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है.

विश्लेषकों के मुताबिक, पुतिन की रुचि वाणिज्यिक हितों से आगे मध्य पूर्व की भू-राजनीति में अपने देश की भूमिका बढ़ाने की बड़ी महत्वाकांक्षा में निहित है.

शेल ऑयल की वजह से अमरीका एक प्रमुख तेल उत्पादक देश के रूप में उभरा है.

एक नई तकनीक जिसे 'फ्रैकिंग' कहा जाता है, इसका इस्तेमाल कर अमरीका 2018 में ही दुनिया का सबसे अग्रणी तेल उत्पादक देश बन गया है, हालांकि यह तकनीक पर्यावरणविदों की आलोचना के निशाने पर है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

क़ीमत निर्धारित करने की ताक़त

विशेषज्ञ बताते हैं कि इस तरह अमरीका की ओर से कच्चे तेल की पर्याप्त आपूर्ति के कारण ओपेक की मंशा सफल नहीं हो पा रही है.

साल 1960 में ओपेक का बग़दाद में गठन हुआ था और तब से ही कच्चे तेल की क़ीमतें तय करने में इस संगठन के पास बेशुमार ताक़त और हस्तक्षेप की क्षमता थी.

मौजूदा समय में ओपेक में 15 देश शामिल हैं, मध्यपूर्व से सात देश, छह अफ़्रीका से और दो लातिन अमरीकी देश (वेनेज़ुएला और इक्वाडोर).

एजेंसी के आधिकारिक डेटा के अनुसार, ये सभी देश मिलकर दुनिया की 44 फ़ीसदी तेल आपूर्ति और 82 प्रतिशत भंडार को नियंत्रित करते हैं.

ओपेक के सहयोगी देश हैं रूस, अज़रबैजान, बहरीन, ब्रूनेई, कज़ाख़स्तान, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, सूडान गणराज्य और दक्षिणी सूडान गणराज्य.

ओपेक को उम्मीद है 'ओपेक प्लस' में इन देशों के साथ मिलकर वो एक बार फिर तेल की क़ीमतें तय करने में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में आ जाएगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए