क्या पाकिस्तान शिमला समझौता तोड़ने की घोषणा कर सकता है? : नज़रिया

  • 14 सितंबर 2019
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने चेतावनी दी है कि भारत प्रशासित कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों और असहमति का दमन करने से दुनिया भर के मुस्लिमों में चरमपंथ के प्रति झुकाव बढ़ेगा.

इमरान ख़ान ने शुक्रवार को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद में एक सभा को संबोधित किया. ये सभा भारत प्रशासित कश्मीर के लोगों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए आयोजित की गई थी.

इमरान ख़ान ने आरोप लगाया है कि 'घाटी में भारतीय सैनिक अत्याचार कर रहे हैं.' अपने भाषण में इमरान ख़ान ने और भी बहुत सी कड़ी बातें कहीं.

दरअसल अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को भारत ने जब से ख़त्म किया है, इमरान ख़ान की कोशिश है कि किसी तरह इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण किया जाए.

इमरान ख़ान पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि हर शुक्रवार को भारत प्रशासित कश्मीर के लोगों के साथ एकजुटता प्रदर्शित की जाएगी.

इसी के तहत वो शुक्रवार को मुज़फ़्फ़राबाद पहुंचे थे. प्रदर्शन को बड़ा बनाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान की टीवी और फ़िल्मों से जुड़ी बड़ी शख़्सियतों को भी आमंत्रित किया था. इस प्रदर्शन में पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफ़रीदी भी आए हुए थे.

इमरान ख़ान के बड़े बोल

इमरान ख़ान काफ़ी बड़ा शो करने की कोशिश कर रहे हैं और ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि पाकिस्तान भारत प्रशासित कश्मीर के लोगों के साथ खड़ा है.

इसकी वजह ये भी है कि पाकिस्तान पर ये आरोप है कि वो खामोश है और कुछ कर नहीं रहा है.

इसलिए कूटनीतिक मंच पर जो हो रहा है उसके अलावा उनकी कोशिश है कि हर शुक्रवार को जो विरोध प्रदर्शन हो रहा है वो भी चलता रहे.

हालांकि चरमपंथ को लेकर खुद पाकिस्तान काफी लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सवालों में घिरा हुआ है.

इसके बाद भी इमरान ख़ान ने कुछ ऐसी बातें कहीं, जिससे वो और ख़तरा मोल लेते दिखे. प्रदर्शन में आए नौजवानों से इमरान ख़ान ने पूछा कि क्या आप नियंत्रण रेखा के पास जाना चाहते हैं. लोगों का सकारात्मक जवाब मिलने पर उन्होंने कहा कि 'मैं आपको बताउंगा कि किस वक़्त वहां जाना है.'

इस बयान को कुछ लोग इस तरह से भी ले सकते हैं कि इमरान ख़ान का इशारा घाटी में प्राक्सी वार की ओर है और जब पाकिस्तान की सरकार चाहेगी तो वो पत्ता भी खेल सकती है.

हो सकता कि उनके इस बयान पर अगर उनसे सवाल पूछे गए तो उन्हें जवाब देते हुए मुश्किल होगी.

अभी तक सरकार की आधिकारिक नीति ये है कि सरकार चरमपंथ का इस्तेमाल नहीं करेगी लेकिन शुक्रवार के भाषण से तो यही लगता है कि वो भारत को डराने की कोशिश कर रहे हैं और ये बताना चाहते हैं कि ये पत्ता भी अभी उनके पास मौजूद है.

जहां तक अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की बात है तो वहां इमरान ख़ान बहुत कुछ नहीं कर पाए हैं और पाकिस्तान की कोशिशों का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है.

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Image caption पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी

आर्थिक हित पहले

पाकिस्तान के अधिकारी भी मानते हैं कि इस मुद्दे पर मुसलमान देशों से जिस समर्थन की आस थी, वो नहीं मिल पाया है और वो सभी देश अपने आर्थिक हितों को देख रहे हैं. पाकिस्तान की बात कोई सुन नहीं रहा है.

इसलिए इन विरोध प्रदर्शनों से दूसरे देशों के रुख़ में कोई परिवर्तन आए, इसकी उम्मीद भी बहुत कम है. रुख में बदलाव हिंसा की आशंका पैदा होने की स्थिति में हो सकता है, जिसके बारे में इमरान ख़ान ने भी अपने भाषण में ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा कि एक बार भारत अपने यहां कर्फ़्यू उठाकर देखे कि कैसा बदलाव आता है. उन्होंने चेतावनी दी कि वहां काफ़ी गंभीर स्थिति खड़ी हो सकती है.

भारत के फ़ैसले के तुरंत बाद सभी व्यापारिक रिश्ते तोड़ने के कुछ दिन बाद ही पाकिस्तान ने कुछ व्यापारिक रिश्ते बहाल करने का फ़ैसला लिया.

इस बीच करतारपुर साहिब कॉरिडोर को लेकर भी दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ी है.

देखा जाए तो दोनों देशों के बीच सबसे अधिक जो असर पड़ा वो ये कि समझौता एक्सप्रेस बंद हो गई, बस सेवा रुक गई, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर कोई ख़ास असर नहीं दिखाई दे रहा है.

पाकिस्तान की नीति में यहीं विरोधभास दिखाई दे रहा है कि ट्रेन और बस तो नहीं चलने दे रहे हैं लेकिन आप चाह रहे हैं कि करतारपुर नवंबर में खुल जाए.

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पाकिस्तान में प्रतिक्रिया

लोग सवाल कर रहे हैं कि पाकिस्तान ये कौन की नीति अपना रहा है और भारत पर किस तरह से दबाव बनाना चाह रहा है?

पाकिस्तान सरकार का कहना है कि करतारपुर साहिब का मुद्दा अलग है और बाकी मुद्दे अलग हैं, लेकिन ये आम लोगों की समझ में नहीं आ रहा है.

आलोचकों का कहना है कि अगर भारत के साथ व्यापार शुरू हो जाता है तो और क्या रह जाता है जिससे भारत पर दबाव डाला जा सके?

पाकिस्तान ने अपने हवाई क्षेत्र को भारत के लिए बंद करने की बात कही थी लेकिन वो भी लोगों को महज धमकी ही लगती है क्योंकि अभी तक उस पर कोई अमल का इरादा नहीं दिखाई दे रहा है.

इसलिए ऐसा लगता है कि पाकिस्तान सरकार ऐसे आर्थिक फ़ैसले नहीं करना चाहती जिससे खुद उसके देश की पहले से ख़राब आर्थिक हालत पर उल्टा असर पड़े.

इमरान ख़ान सरकार इस मामले को उसी हद तक बढ़ाना चाहती है कि दुनिया देख सके कि पाकिस्तान कुछ कर रहा है लेकिन वो अपने आर्थिक हितों को भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती.

जहां तक पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लोगों की बात है वहां बहुसंख्यक लोग पाकिस्तान की नीति के ही समर्थक हैं. लेकिन कुछ स्वतंत्र राष्ट्रवादी लोगों ने पिछले दिनों धरना देने और एलओसी की ओर मार्च करने की कोशिश की थी.

पुलिस इनमें से 38 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया था. वो अभी तक बंद हैं और कुछ लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर उन्हें छोड़ा नहीं गया तो फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे.

वहां भी एक छोटा समूह है जो पाकिस्तान की नीतियों से ख़ुश नहीं है. उन्हें लगता है कि पाकिस्तान न तो कूटनीतिक मोर्चे पर और ना ही आर्थिक मोर्चे पर ऐसे कदम उठा रहा है जिससे भारत पर दबाव बन सके.

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संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए तैयारी

आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक होनी है. इमरान ख़ान वहां भाषण देंगे और इस मुद्दे को उठाएंगे.

माना ये भी जा रहा है कि ये सब विरोध प्रदर्शन उससे पहले एक माहौल बनाने के लिए किया जा रहा है.

हो सकता है कि वो कोई बहुत बड़ा एलान करें, लोगों को भी उम्मीद है कि वो ऐसा करेंगे और कुछ ऐसे कदम उठाएंगे जिससे भारत के लिए मुश्किलें खड़ी हों.

अभी तक जो देखा जा रहा है कि वो ये है कि कूटनीतिक फ्रंट पर जंग चल रही है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने शुक्रवार को संसद में बयान दिया है कि भारत काफ़ी बैकफ़ुट पर है और पहली बार ऐसा हुआ है कि भारत दबाव में आया है.

पाकिस्तान के दावों से उलट अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि भारत कोई दबाव महसूस कर रहा है.

अभी हाल ही में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा कि पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है.

शिमला समझौते का क्या होगा?

इस बयान की पाकिस्तान में काफ़ी चर्चा रही. असल में भारत ये देखना चाह रहा है कि पाकिस्तान इस पर किस तरह से प्रतिक्रिया देता है. हालांकि उसे ये भी डर है कि अगर कर्फ्यू हटा तो पाकिस्तान से घुसपैठ की कोशिश भी हो सकती है.

कोई प्रतिक्रिया आती है या नहीं ये प्रतिबंधों के हटने के बाद ही पता चल पाएगा क्योंकि अभी तक तो वहां से कोई ख़बर दुनिया को नहीं मिल पा रही है.

दोनों देशों को पता है कि शिमला समझौते के तहत द्विपक्षीय बातचीत से आज तक कोई ख़ास क़ामयाबी नहीं मिल सकी है.

ऐसा माना जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान जो बड़ा एलान कर सकता है वो ये कि अब शिमला समझौते ख़त्म मान लिया जाए. भारत और पाकिस्तान के बीच 1972 में हुआ था शिमला समझौता.

अगर ये घोषणा होती है तो शायद अंतरराष्ट्रीय समुदाय का इस मुद्दे की ओर ध्यान जाए क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माना यही जाता है कि शिमला समझौते की वजह से ही दोनों देश अबतक एक दूसरे को नियंत्रित कर पाए हैं और उसके बाद कोई युद्ध नहीं हुआ.

और अगर इस तरह का कोई समझौता रहेगा ही नहीं तो इस क्षेत्र में युद्ध का ख़तरा बढ़ जाएगा.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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