अफ़ग़ानिस्तान: अगस्त में हर रोज़ 74 लोग मारे गए..

  • 17 सितंबर 2019
अफ़ग़ानिस्तान

अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी ने अपनी एक ख़ास पड़ताल में पाया है कि अगस्त के महीने में यहां रोज़ औसतन 74 लोगों की मौत हुई. इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.

बीबीसी ने पाया है कि अमरीका युद्ध ग्रस्त अफ़ग़ानिस्तान में 18 सालों से मौजूद अपने सैनिकों को अब बाहर निकालना चाहता है और इस पर चर्चा कर रहा है. इन चर्चाओं के बीच अफ़ग़ानिस्तान के हर कोने में हिंसा में बढ़ोतरी देखी जा रही है.

हिंसा से होने वाली मानवीय क्षति का अंदाज़ा लगाने के लिए बीबीसी ने अगस्त के पूरे महीने में होने वाली हिंसा की हर घटना का दस्तावेज़ तैयार किया है.

बीबीसी इस बात की पुष्टि करता है कि इस एक महीने के दौरान सुरक्षा में चूक की कुल 611 घटनाएं हुई हैं, जिनमें क़रीब 2,307 लोगों की मौत हुई है. इन मामलों में कुल 1,948 लोग घायल हुए हैं.

हालांकि ये केवल आँकड़े हैं, लेकिन एकत्र किए गए डेटा से पता चलता है कि हाल में वक़्त में अधिक मौतें आम नागरिकों और तालिबान लड़ाकों की हुई है.

तलिबान और अफ़ग़ानिस्तान की सरकार ने बीबीसी के इन आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं.

अमरीका के लिए अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेना निकालना उसकी विदेश नीति का मुख्य हिस्सा है. सप्ताह भर पहले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने तालिबान और अमरीका के बीच चल रही अफ़ग़ानिस्तान शांति वार्ता को रद्द कर दिया था. हालांकि अब भी आगे बातचीत की गुंजाइश ख़त्म नहीं हुई है.

लेकिन इस दौरान औपचारिक तौर पर किसी तरह का युद्धविराम न होने के कारण अफ़ग़ानिस्तान में हर सप्ताह सैंकड़ों लोगों की मौत हो रही है. इसी महीने के आख़िर में अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और उससे पहले यहां हिंसा और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.

अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा के संबंध में बीबीसी ने कैसे आँकड़े एकत्र किए, ये जानने के लिए रिपोर्ट के आख़िर में जाएं.

महीने भर तक लगातार हिंसा

जमा किए गए आँकड़ों से बीबीसी को पता चला कि अगस्त महीने में हर दिन अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब 74 लोगों की मौत हिंसक घटनाओं में हुई है.

इस्लाम में माने जाने वाले ईद-उल-अज़हा के त्योहार के दौरान तालिबान और अफ़ग़ान सरकार ने तीन दिनों कर अनौपचारिक तौर पर युद्धविराम का पालन किया.

लेकिन बीबीसी के आंकड़े इस बात कि पुष्टि करते हैं कि त्योहार के दिनों में 10 अगस्त की शाम से लेकर 13 अगस्त की शाम तक 90 लोगों की मौत हुई.

जिस एक दिन में सबसे अधिक लोग हताहत हुए थे वो है 27 अगस्त की तारीख जब एक हवाई हमले में 162 लोगों की मौत हुई और 47 लोग घायल हुए. इनमें से अधिकांश तालिबान लड़ाके थे.

आम नागरिकों पर सबसे घातक हमला 18 अगस्त को हुआ था. इन हमलों में 112 लोगों की जानें गई थीं. इनमें से एक आत्मघाती हमले में सबसे अधिक 92 लोगों की मौत हुई थी, जब वो क़ाबुल में हो रहे एक शादी समारोह में शामिल होने पहुंचे थे. इस हमले में 142 लोग घायल हुए थे.

इस शादी में दूल्हा बनने वाले थे मीरवाइज़ जडो पेशे से एक टेलर हैं. उनकी ज़िंदगी का ये सबसे बेहतर दिन होने वाला था और इसके लिए उन्होंने पहले से पैसे जोड़े थे.

लेकिन इस आत्मघाती हमले में उनके कई क़रीबी दोस्त मारे गए थे. उनकी दुल्हन के भाई और कई कज़न भाई हमले में मारे गए. मीरवाइज़ कहते हैं कि उनकी पत्नी अब अपनी शादी के कपड़े और शादी का एलबम जला कर राख कर देना चाहती हैं.

उन्होंने बबीसी को बतया, "एक ही झटके में उनकी सारी उम्मीदें और उनकी खुशी ख़त्म हो गई."

इस हमले की ज़िम्मेदारी कथित इस्लामी चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली थी.

हिंसा से सबसे प्रभावित कौन?

साल 2001 के बाद से तालिबान कभी भी अधिक शक्तिशाली नहीं रहा, लेकिन बीबीसी के आंकड़ों के अनुसार अगस्त में मारे गए लोगों में से करीब पचास फ़ीसदी मौतों के लिए तालिबान के लड़ाके ज़िम्मेदार हैं. ये आंकड़ा अपने आप में काफ़ी बड़ा है और आश्चर्यजनक भी.

आंकड़ों में इस बात के सामने आने के पीछे कई कारक हो सकते हैं, जिसमें यह भी शामिल है कि शांति वार्ता के दौरान तालिबान आक्रामक रहा है और इसके जवाब में अमेरिकी नेतृत्व वाली सेना हवाई हमले किए हैं और रात के अभियान बढ़ाए हैं. इस कारण कई तालिबान लड़ाकों और नागरिकों की मौत हो गई है.

अब तक इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं है कि हाल के सालों में तालिबान के कितने लड़ाके मारे गए हैं. माना जाता है कि तालिबान के पास अब भी लगभग 30,000 हथियारबंद लड़ाके हो सकते हैं.

अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के कितने सैनिक हिंसा की घटनाओं में मारे गए हैं- यह आंकड़े टॉप सीक्रेट हैं. इस कारण बीबीसी के द्वारा एकत्र किए गए आंकड़े वास्तविक आंकड़ों से कम हो सकते हैं. इसी साल जनवरी में अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने कहा था कि 2014 के बाद से अब तक सुरक्षा बलों के 45,000 सदस्य मारे गए हैं.

बीबीसी इस बात की पुष्टि करता है कि अगस्त में 473 आम नागरिक मारे गए और कुल 786 आम नागरिक घायल हुए हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र मिशन (यूएनएएएमए) के लिए मानवाधिकार के प्रमुख फियोना फ्रेज़र का कहना है कि "इस संघर्ष का आम नागरिकों पर बुरा प्रभाव पड़ा है."

"संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों से पता चलता है कि दुनिया में किसी और जगह के मुक़ाबले अफ़ग़ानिस्तान में सशस्त्र संघर्ष के कारण अधिक आम नागरिक हताहत हुए हैं."

"हालांकि, नागरिकों के हताहत होने से जुड़े आंकड़े बड़ी संख्या दर्शाते हैं लेकिन आंकड़ों की पुष्टि की कड़ी प्रक्रिया के कारण प्रकाशित आंकड़े निश्चित रूप से सही तस्वीर नहीं दिखाते हैं."

अमरीका और अफ़ग़ान सेना नियमित तौर पर आम नागरिक के हताहतों के आंकडों को या तो खारिज करते रहे हैं या इनकी संख्या नहीं बताते.

कैसी होती है संघर्ष की तस्वीर?

देश के उत्तरी शहर कुंदूज़ की लड़ाई और क़ाबुल में शादी समारोह में आमघाती हमला जैसी हिंसा की बड़ी घटनाएं अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियाँ बनीं.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में आमतौर पर अफ़ग़ान सुरक्षा बलों और तालिबान के बीच लड़ाई या मुठभेड़ जैसी लगातार छोटी-मोटी हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के 34 प्रांतों में से केवल तीन ही प्रांतों में बीबीसी अगस्त में हुई हिंसा की घटनाओं की पुष्टि करने में असमर्थ रहा.

अफ़ग़ानिस्तान में होने वाली हर दस मौतों में से एक मौत तालिबान के नियंत्रण में मौजूद और अपेक्षाकृत शांत ग़ज़नी प्रांत में हुई. ये इस कारण अफ़ग़ान सैन्य अभियानों का मुख्य लक्ष्य रहा है.

गज़नी में होने वाले 66 हमलों में से एक तिहाई संदिग्ध तालिबान ठिकानों पर हवाई हमले थे.

अफ़ग़ानिस्तान के नागकिर मानते हैं कि वो अत्यधिक अनिश्चितता के माहौल में रहते हैं.

कंधार के मुख्य अस्पताल में बीबीसी की मुल़ाकात उरुज़गान प्रांत के मोहिबुल्लाह से हुई. उनके भाई के कंधे से डॉक्टरों ने एक गोली निकाली थी.

मोहिबुल्लाह गुस्से में हैं. वो बताते हैं, "जब भी हमारे इलाक़े कोई अभियान होता है, तो आम नागरिक कहीं आ-जा नहीं सकते. अगर वे किसी कारण ऐसा करते हैं, तो अमरीकी या अफ़ग़ान सैनिक उन्हें गोली मार देते हैं."

"वे जहां चाहें बम गिरा देते हैं. हमारे आसपास के सभी घर नष्ट हो चुके हैं."

क्या दुनिया में सबसे हिंसक संघर्ष है?

अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे युद्ध को अब चार दशक हो गए हैं और वहां कई सालों से गतिरोध बना हुआ है.

बीते साल के आख़िर में आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेन्ट डेटा प्रोजेक्ट (एसीएलईडी) अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध के कारण होने वाली मौतों के संदर्भ में इसके दुनिया में सबसे हिंसक संघर्ष बताया था.

साल 2019 के लिए हताहतों के संबंध में एसीएलईडी के आंकड़ों के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान अब भी हिंसक संघर्ष का गढ़ बना हुआ है. इन आंकड़ों के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में अगस्त के महीने में सीरिया या यमन की तुलना में तीन गुना अधिक मौतें हुई हैं.

वहीं जून 2019 में, ग्लोबल पीस इंडेक्स रिपोर्ट ने अफ़ग़ानिस्तान को दुनिया में सबसे कम शांतिपूर्ण जगह का नाम दिया गया था.

बीबीसी ने कैसे एकत्र किया डेटा

साल 2019 में 1 अगस्त से लेकर 31 अगस्त के बीच बीबीसी ने अफ़ग़ानिस्तान में होने वाली 1,200 से अधिक हिंसक घटनाओं की सूची तैयार की.

इसके बाद बीबीसी अफ़ग़ान सेवा से जुड़े पत्रकारों ने हर रिपोर्ट में उल्लेख की गई घटनाओं का पता लगाया- भले ही वो बड़ी अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बनने वाली ख़बर हो या फिर हिंसा की छिट-पुट घटना. बीबीसी ने हर ख़बर की पुष्टि कर उसकी पड़ताल करने के सरकारी अधिकारियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, कबिले के बुजुर्गों, स्थानीय निवासियों, चश्मदीदों, अस्पताल के दस्तावेज़ और तालिबान से जुड़े स्रोतों समेत अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद अपने अनेक स्रोतों से संपर्क किया और इसके लिए अपनी व्यापक ग्राउंड टीम का इस्तेमाल किया.

हर घटना की पुष्टि के लिए बीबीसी को कम से कम दो विश्वसनीय स्रोतों की ज़रूरत होती है.

हिंसा की घटनाओं की पुष्टि करने के दौरान हताहतों की संख्या से जुड़े जिस सबसे कम आंकड़े की पुष्टि दो स्रोतों ने की उसे दस्तावेज़ में रिकॉर्ड किया गया.

जिन मामलों में हताहतों की संख्या एक सीमा में दी गई ती (जैसे 10 से 12), उनमें न्यूनतम संख्या को ही सबसे विश्वसनीय माना गया.

अगर अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले आंकड़ों में फ़र्क़ दिखा तो ऐसे मामलों में हताहतों की सबसे कम संख्या को ही विश्वसनीय माना गया. इसके फलस्वरूप हिंसा के सैकडों मामलों को आंकड़ों में शामिल ही नहीं किया जा सका, और इस कारण हताहतों की असल संख्या कहीं अधिक हो सकती है.

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