गांधी @ 150: पाकिस्तान से आई आवाज़, नये हुक्मरानों से तो गांधी अच्छा थाः ब्लॉग

  • 26 सितंबर 2019
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Image caption मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी

महात्मा गाँधी डेढ़ सौ साल पहले पैदा हुए थे. यार लोगों ने सवाल किया है कि पाकिस्तान में लोग गाँधी के बारे में क्या सोचते हैं. पहले तो दिल किया कि बता दें कि हमारे घर में अपने ही इतने पंगे हैं, हमें गाँधी के बारे में सोचने का मौक़ा ही नहीं मिला.

फिर याद आया कि हमें स्कूल में गाँधी के बारे में इतना पढ़ाया गया था कि वह हिन्दू था, बाक़ी बात आप ख़ुद ही समझ लो.

साथ ही यह भी बताया गया कि गाँधी मक्कार था, गाँधी बनिया था, पाकिस्तान बनने के बहुत ख़िलाफ़ था, भारत माता की पूजा करता था, हम मुसलमानों ने सदियों तक जो हिन्दुओं पर हुकूमत की है वह उसका बदला लेना चाहता था.

गाँधी के मुक़ाबले में हमारा बाबा क़ायदे-आज़म था. वह लंदन का पढ़ा-लिखा वकील, उसने गाँधी का गिरेबान पकड़ कर ऐसा धोबी पटका मारा कि पाकिस्तान ले लिया.

थोड़ा बड़ा हो कर गाँधी फ़िल्म देखी तो पता चला कि हिन्दुओं का बाबा कोई मलंग सा आदमी था जो हिन्दुस्तान में आज़ादी का युद्ध लड़ने से पहले दक्षिण अफ़्रीका में भी गोरों से दो-दो हाथ कर चुका था. फ़िल्म पर पाकिस्तानियों को एतराज़ था कि गोरे निर्देशक ने हिन्दुओं के बाबा को तो हीरो बना दिया और हमारे बाबा को कोई सनकी सा विलेन दिखाया है.

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हम गाँधी और जिन्ना की पुरानी तस्वीरें देख कर ख़ुश होते हैं. इन तस्वीरों में हमारे बाबा ने उस्तरे की धार से तेज़ लंदन से सिलवाया सूट पहना होता है और हाथ में विलायती सिगरेट पकड़ा होता है. एक सयाने ने कहा था कि जब पाकिस्तान में पच्चास हज़ार का नोट बनेगा तो तब उस नोट पर यह तस्वीर लगेगी.

इन तस्वीरों में महात्मा गाँधी ने अपनी आधी धोती ऊपर उठाई होती है और हाथ में खूंटी पकड़ी होती है. किसी-किसी फ़ोटो में दोनों बाबा हंस भी रहे हैं. अगर दोनों को पता होता कि आगे चल कर उनके हिंदुस्तान-पाकिस्तान के साथ क्या होने वाला है तो शायद गले मिल कर रो भी पड़ते.

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दो मुल्क काटो और यहां से भागो...

एक तस्वीर में महात्मा गाँधी हाथ उठा कर बहस कर रहे हैं जैसे कह रहे हों कि हमें छोड़ कर मत जाओ. हमारा बाबा क़ायदे आज़म ने विलायती सिगरेट का कश लगा कर ऐसा मुंह बनाया है जैसे कह रहा हो, "यार गाँधी तुम अब जल्दी करो, अब हम बूढ़े हो गए हैं, बंटवारा तो होकर रहेगा."

हमारे बाबा क़ायदे आज़म ने इतनी अंग्रेज़ी बोली कि गोरे भी मान गये कि हिन्दू और मुसलमान दो क़ौम हैं, रातोंरात दो मुल्क काटो और यहां से भागो. बाक़ी काटने-चीरने का बंदोबस्त हमने ख़ुद कर लिया. हमारा बाबा जीत गया, गाँधी हार गया.

हिंदुस्तान और पाकिस्तान बनने के अगले साल ही दोनों बाबा चल बसे. एक को तपेदिक खा गई और एक को उसी के हिन्दू भाई ने गोली मार दी.

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Image caption 30 जून 1948 को नथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मार दी थी

हमें बचपन में गाँधी से नफ़रत करना सिखाया गया था. उर्दू के एक बुज़ुर्ग लेखक ने एक बार लिखा था, "सोचो अगर पाकिस्तान ना बनता तो आपके दरवाज़े पर गाँधी जैसा कोई हिन्दू धोती उठा कर मूत रहा होता."

अच्छा हुआ, हमने ज़्यादातर हिन्दू यहां से भगा दिए. अब एक-दूसरे के दरवाज़े पर मूतने का काम हम ख़ुद ही कर लेते हैं.

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पहले पाकिस्तान में गाँधी का नाम गाली होता था

उस तरफ़ जिस गाँधी को हम बड़ा हिन्दू समझते थे, उसे नए हिन्दुओं ने कहा, "चलो तुम इतने भोले हिन्दू हो, तुम्हारे लिए नए हिंदुस्तान में कोई जगह नहीं. तुम अब सिर्फ़ नोटों पर नज़र आओगे."

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Image caption गांधी के कातिल नथूराम गोडसे की यह तस्वीर 12 मई 1948 की है

हिंदुस्तान में अभी उन लोगों का राज है जो गाँधी के क़ातिल को अपना हिन्दू मानते हैं. पहले पाकिस्तान में गाँधी का नाम गाली होता था, अब हिंदुस्तान में भी कलंक बन गया है.

वहां पर हमारे भाई सोचते होंगे कि जिन्होंने अपने बाबा गाँधी को नहीं छोड़ा वह हमारे साथ क्या करेंगे. यहां हम कहते तो नहीं पर कभी-कभी सोचते ज़रूर हैं कि इन नए वालों से तो गाँधी ही अच्छा था.

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