चीन की 70वीं वर्षगांठ से पहले मुश्किलों से घिरे हैं शी जिनपिंग

  • 30 सितंबर 2019
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चीन की स्थापना की 70वीं वर्षगांठ को बीजिंग प्रशासन बड़े पैमाने पर सेलिब्रेट करने की तैयारी कर रहा है लेकिन ठीक इसी वक़्त चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए मुश्किलें भी बढ़ती दिख रही हैं.

अमरीका के साथ लंबे समय से चल रहा ट्रेड वॉर, हॉन्गकॉन्ग में चल रहा लगातार विरोध प्रदर्शन और सुअर मांस की बढ़ती क़ीमतें, इन सबने जश्न के मूड को फीका किया हुआ है- भले ही भव्य समारोह इसे एक अलग छाप देते.

बीते तीन सितंबर को शी जिनपिंग ने अपने एक संबोधन में चाइनीज़ शब्द 'डूजेंग' का इस्तेमाल 50 से ज्यादा बार किया, इस शब्द का मतलब होता है 'संघर्ष करना'.

ज़ीहिर है अपने संबोधन से शी जिनपिंग युवा कैडरों को 'कई जोखिमों और प्रयोगों' के लिए तैयार कर रहे होंगे जिन्हें वे आज़मा रहे हैं.

चीन का सरकारी मीडिया कभी भी सरकार की उपलब्धियों को प्रचारित करने का मौक़ा नहीं गंवाती है, लेकिन इस बार चुनौतियों और उससे निपटने की तैयारियों के बारे में भी चर्चा हो रही है.

चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने 22 सितंबर को लिखा है, "इस वर्षगांठ पर चीन की ताक़त नई ऊंचाईयों तक पहुंच चुकी है लेकिन इसी समय इसे असाधारण चुनौतियों को सामना करना पड़ रहा है."

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मुश्किल वक़् में 70वीं वर्षगांठ

ये चेतावनियां देश में बढ़ती चिंता को ज़ाहिर करने वाला है लेकिन यह राष्ट्रवादी नज़रिया से भी ओतप्रोत हो सकता है.

माना जा रहा है कि शी जिनपिंग एक अक्तूबर के अपने संबोधन में राष्ट्रवादी भावनाओं को उभार सकते हैं.

चीनी राष्ट्रपति को इन दिनों कई मोर्चों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और ऐसे ही मुश्किल वक़्त में 70वीं वर्षगांठ मनाने का मौक़ा आया है.

वास्तव में शी जिनपिंग अपने सात साल के शासन के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं.

हॉन्गकॉन्ग में विरोध प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहा है, जबकि एक दुर्लभ घटनाक्रम में- चीन की सत्तारूढ़ कम्यूनिस्ट पार्टी ने विवादास्पद प्रत्यर्पण विधेयक को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया है.

हॉन्गकॉन्ग के दैनिक समाचार पत्र ने इसे पार्टी के चेहरे के लिए सबसे बड़ा नुक़सान भी बताया है.

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5G टेक्नॉलॉजी की रेस में चीन की कंपनी ख़्वावे ने सभी को पीछे छोड़ दिया है.

युवा छात्रों का विरोध प्रदर्शन

एक दबंग और मज़बूत सरकार के सामने युवा छात्रों के विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें वैश्विक मंच तक पहुंचे, ऐसा शी जिनपिंग नहीं चाहते होंगे, ख़ासकर तब जब देश अपनी स्थापना की वर्षगांठ मना रहा हो.

शी जिनपिंग के तीन सितंबर का संबोधन चीनी सरकारी टीवी चैनल सीसीटीवी पर शाम के प्राइम टाइम में छाया रहा, इसे चीन की सभी सरकारी मीडिया ने प्रमुखता से दिखाया.

इस संबोधन में शी जिनपिंग ने स्वीकार किया है कि हॉन्गकॉन्ग, मकाओ और ताइवान में पार्टी की चुनौती जटिल होती जा रही है.

चीन के शिनजियांग प्रांत के वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ सरकार की नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना भी बढ़ रही है.

इन सबके अलावा अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भी शी जिनपिंग के लिए लगातार सिरदर्द साबित हो रहे हैं.

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हांगकांग में जारी प्रदर्शनों के बीच माता-पिता को सता रही है बच्चों के भविष्य की चिंता

नया शीत युद्ध

चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के मुख्य पत्र पीपल्स डेली के सोशल मीडिया एकाउंड शियाकेडाओ पर 4 सिंतबर को मौजूद एक लेख में कहा गया है कि चीन-अमरीका के साथ ट्रेड वॉर अचानक से शुरू हो गया.

इसमें कहा गया है, "किसी ने आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किया, एक दिन पहले भी किसी ने ट्रेड वॉर में नहीं बताया, यह सीधे शुरू हो गया. यह संघर्ष जैसा है."

बीजिंग की कथित तकनीकी निगरानी की चिंताओं के बीच कई दौर की बातचीत व्यापार गतिरोध को तोड़ने में नाकाम रही है. अब यह दूसरे क्षेत्रों में भी फैल चुकी है.

अगर अब कोई कारोबारी समझौता हो भी जाए तो भी यह कहना सही होगा कि चीन-अमरीका के संबंधों में तेज़ी से टकराव बढ़ रहा है. इसे अब नया शीत युद्ध या फिर सभ्यताओं का टकराव भी कहा जाने लगा है.

शी जिनपिंग की विदेश नीति बेहद मुखर है, उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की बजाए इस पर ज्यादा ध्यान दिया है. इसके चलते भी पश्चिमी देशों में चीन के प्रभुत्व का विरोध बढ़ रहा है.

शी जिनपिंग की सबसे अहम विदेशी नीति- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई)- को भी कुछ देशों में झटका लगा है. पारदर्शिता का अभाव, क़र्ज़ संबंधी मामले और बीजिंग के बढ़ते प्रभाव के चलते इस योजना में उम्मीद के मुताबिक़ तेज़ी नहीं दिख रही है.

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चीन के विरोध और लोकतंत्र के समर्थन में लाखों लोग हॉन्गकॉन्ग की सड़कों पर उतर रहे हैं.

दबाव में जनता का नेता?

ट्रेड वॉर के चलते घरेलू मोर्चे पर चीनी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है, जो पहले से ही मुश्किल में है.

उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति कम हुई है, बेरोज़गारी और प्रति परिवार क़र्ज़ बढ़ा है. सबसे अहम बात यह है कि कामकाजी आबादी तेज़ी से कम हो रही है.

बीते तीन दशक में सबसे कम जीडीपी ग्रोथ रेट इसी साल दर्ज किया गया है. विदेशी आलोचक शी जिनपिंग की इसलिए भी आलोचना करते आए हैं कि वे आर्थिक सुधारों को लागू नहीं करा पाए हैं.

हालांकि चीन की सरकारी मीडिया उस नैरेटिव को बढ़ावा दे रही है जिसमें चीनी अर्थव्यवस्था के लचीलेपन को उतार चढ़ाव झेलने में सक्षम बताया जा रहा है.

इन सबके अलावा चीनी राष्ट्रपति को एक अनोखी समस्या का सामना भी करना पड़ रहा है, ख़ास बात यह है कि सुअर मांस के बढ़ते दाम की यह समस्या आम लोगों से सीधे जुड़ी हुई है.

चीन में यह पूरा साल 'सुअरों के साल' के तौर पर मनाया जा रहा है. चीनी अधिकारियों के सामने इस साल सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि वे लगातार कोशिशों के बाद भी सुअर के मांस की क़ीमतों पर अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं.

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हांगकांग में जारी प्रदर्शन को लेकर पुलिसवालों के परिवार ने जताई चिंता

पार्टी की छवि को नुक़सान

सरकारी मीडिया शी जिनपिंग को लोगों का नेता बताता रहा है लेकिन सुअर मांस की बढ़ती क़ूमत उनकी छवि को प्रभावित ज़रूर करेगी.

चीन के एक औसत नागरिक को आर्थिक विकास दर की बहुत ज्यादा चिंता नहीं होगी लेकिन एक मुख्य खाद्य आइटम की बढ़ती क़ूमत उसका असंतोष बढ़ा सकती है, भले ही उसे वह सार्वजनिक तौर पर व्यक्त नहीं कर पाए.

चीन के उप-प्रधानमंत्री हू चुनहुआ ने अगस्त के अंत में चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर लोग सुअर का मांस ख़रीद नहीं पाएंगे तो यह पार्टी की छवि को नुक़सान पहुंचाएगा. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि सुअर के मांस का उत्पादन बढ़ाना, सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है.

हॉन्ग कॉन्ग से प्रकाशित साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट (एससीएमपी) अख़बार ने 15 सितंबर को लिखा है, "खाने का कोई एक आइटम अभी देश की राजनीति में बेहद अहम हो गया है, ऐसा कम ही देखने को मिलता है."

अख़बार ने ये भी लिखा है, "शी जिनपिंग को किसी चुनावी दबाव का सामना नहीं करना पड़ रहा है. लेकिन अगर वे लोगों की मुश्किलों को कम करने की कोशिश में नाकाम रहते हैं तो इस मुद्दे पर लोगों के बढ़ते आक्रोश से उनके दबदबे और उनके नेतृत्व के ख़िलाफ़ आक्रोश बढ़ सकता है."

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असंतोष को दबाता चीन

कितना है आंतरिक संघर्ष

इस बात में कोई शक नहीं है कि शी जिनपिंग, माओत्से तुंग के बाद सबसे मज़बूत नेता हैं. सारी ताक़त उनके इर्द गिर्द ही है, ऐसे में अगर कुछ ग़लत होता है तो उसका दोष भी उन्हें ही झेलना होगा.

चीनी राजनीति की अपारदर्शिता को देखते हुए यह बताना मुश्किल ही है कि उनके ख़िलाफ़ कोई गतिविधि चल रही हो. अगर ऐसा पर्दे के पीछे भी हो रहा हो तो भी असंतोष को तुरंत शांत करा दिया जाता है.

उम्मीद के मुताबिक़ ही चीन की सरकारी मीडिया में उन नीतियों की नाकामी का ज़िक्र नहीं मिलता है जिसके चलते ये चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं. इसकी जगह इसे बाहरी कारकों और अनिश्चितताओं का परिणाम बताया जाता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉन्ग कॉन्ग के चाइना मीडिया प्रोजेक्ट के सह निदेशक डेविड बेंडुरस्की बताते हैं, "निश्चित तौर पर, शी जिनपिंग को इतना संघर्ष कभी नहीं करना पड़ा होगा."

बेंडुरस्की ने 10 सितंबर को हॉन्ग कॉन्ग फ्री प्रेस की वेबसाइट पर प्रकाशित अपने लेख में कहा है, "शी जिनपिंग के हालिया भाषण के बाद हमें इस संभावना को ध्यान से देखना होगा कि उन्हें पार्टी के अंदर ही वास्तविक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वे कई मुश्किलों से घिरे हैं."

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जिनपिंग की बढ़ती ताक़त और सोशल मीडिया पर विरोध

आंतरिक चुनौतियों का सामना

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के अंदर उन्हें आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, हालांकि पार्टी में शी जिनपिंग की स्थिति कमज़ोर होने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं.

उन्होंने हाल के दिनों क्रांतिकारी जगहों का दौरा किया है. वे कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा मुश्किलों और माओत्से के समय की चुनौतियों से जोड़ सके.

जापानी अख़बार निक्केई एशियन रिव्यू ने 12 सितंबर को पार्टी सूत्रों के हवाले से लिखा है, "शी जिनपिंग केवल माओत्से की शैली की नक़ल करके अपने आधार को मज़बूत बनाना चाहते हैं. वे चीन की स्थापना की 70वीं वर्षगांठ से पहले मौजूदा चुनौतियों से पार पाना चाहते हैं."

इस आलेख में ये भी लिखा गया है, "संकट इस तरह का है कि अगर प्रशासन ने जल्दी से कार्रवाई नहीं की तो शी जिनपिंग धीरे-धीरे पार्टी पर अपनी पकड़ खो सकते हैं."

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दुनियाभर में दिखेगा चीन में हुए इस बदलाव का असर?

अति राष्ट्रवाद

वैसे अगर लोगों का भरोसा उनपर क़ायम रहा और पार्टी उनके साथ खड़ी रही तो शी जिनपिंग मौजूदा चुनौतियों के बहाने ज्यादा ताक़तवर भी हो सकते हैं.

लेकिन अति राष्ट्रवाद की ओर क़दम बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा.

क्लेरेमोंट मेक्केना कॉलेज की मिनशिन पेई कहते हैं, "विपक्षियों पर अंकुश और राष्ट्रवाद पर ज़ोर देने से थोड़े समय तक तो मदद मिल सकती है लेकिन दो साल बाद चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की सौवीं वर्षगांठ (2021 में) मनाने के लिए सत्ता में बने रहना चुनौतीपूर्ण होगा."

मिनशिन पेई ने 22 सितंबर को साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट (एससीएमपी) में लिखे अपने लेख में इस चिंता को ज़ाहिर करते हुए लिखा है, "पार्टी के नेता और कैडरों में भविष्य को लेकर लगातार चिंता बढ़ रही है."

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