कश्मीर पर तुर्की पाकिस्तान के साथ क्यों है

  • 6 अक्तूबर 2019
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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने पिछले महीने 24 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करते हुए कश्मीर का मुद्दा उठाया था.

राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पिछले 72 सालों से कश्मीर समस्या का समाधान खोजने में नाकाम रहा है.

अर्दोआन ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर समस्या को बातचीत के ज़रिए सुलझाएं. तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बावजूद कश्मीर में 80 लाख लोग फँसे हुए हैं.

अर्दोआन के अलावा मलेशिया ने भी यूएन की आम सभा में कश्मीर का मुद्दा उठाया था. कहा जा रहा है कि यूएन की आम सभा में तुर्की और मलेशिया का यह रुख़ भारत के लिए झटका है.

तुर्की के इस रुख़ पर भारत ने खेद जताया है. इसी हफ़्ते शुक्रवार को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है. उन्होंने कहा कि तुर्की और मलेशिया का रुख़ बहुत ही अफ़सोसजनक है.

रवीश कुमार ने कहा, ''भारत और तुर्की में दोस्ताना संबंध हैं. लेकिन छह अगस्त के बाद से हमें खेद है कि तुर्की की तरफ़ से भारत के आंतरिक मामले पर लगातार बयान आए हैं. ये तथ्यात्मक रूप से ग़लत और पक्षपातपूर्ण हैं.''

पाकिस्तान और तुर्की के बीच संबंध भारत के तुलना में काफ़ी अच्छे रहे हैं. दोनों मुल्क इस्लामिक दुनिया के सुन्नी प्रभुत्व वाले हैं. अर्दोआन के पाकिस्तान से हमेशा से अच्छे संबंध रहे हैं.

जब जुलाई 2016 में तुर्की में सेना का अर्दोआन के ख़िलाफ़ तख्तापलट नाकाम रहा तो पाकिस्तान खुलकर अर्दोआन के पक्ष में आया था. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने अर्दोआन को फ़ोन कर समर्थन किया था. इसके बाद शरीफ़ ने तुर्की का दौरा भी किया था. तब से अर्दोआन और पाकिस्तान के संबंध और अच्छे हुए हैं.

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सियासी और आर्थिक संबंध

2017 से तुर्की ने पाकिस्तान में एक अरब डॉलर का निवेश किया है. तुर्की पाकिस्तान में कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है. वो पाकिस्तान को मेट्रोबस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम भी मुहैया कराता रहा है. दोनों देशों के बीच प्रस्तावित फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर अब भी काम चल रहा है.

अगर दोनों देशों के बीच यह समझौता हो जाता है कि तो द्विपक्षीय व्यापार 90.0 करोड़ डॉलर से बढ़कर 10 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है.

पाकिस्तान में टर्किश एयरलाइंस का भी काफ़ी विस्तार हुआ है. इस्तांबुल रीजनल एविएशन हब के तौर पर विकसित हुआ है. ज़्यादातर पाकिस्तानी तुर्की के रास्ते पश्चिम के देशों में जाते हैं.

हालांकि पाकिस्तानियों को तुर्की में जाने के लिए वीज़ा की ज़रूरत पड़ती है. अगर फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट हो जाता है तो दोनों देशों के बीच संबंध और गहरे होंगे. तुर्की में हाल के वर्षों में पश्चिम और यूरोप के पर्यटकों का आना कम हुआ है ऐसे में तुर्की इस्लामिक देशों के पर्यटकों को आकर्षित करना चाहता है.

पाकिस्तान के लिए तुर्की लंबे समय से आर्थिक और सियासी मॉडल के रूप में रहा है. लेकिन वक़्त के साथ चीज़ें काफ़ी बदल गई हैं. पाकिस्तानी सेना के पूर्व प्रमुख और पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ तुर्की के संस्थापक मुस्तफ़ा कमाल पाशा के प्रशंसक रहे हैं.

मुशर्रफ़ पाशा के सेक्युलर सुधारों और सख़्त शासन की प्रशंसा करते रहे हैं. पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अर्दोआन की प्रशंसा करते रहे हैं.

2016 में तुर्की में तख़्तापलट नाकाम करने पर इमरान ख़ान ने अर्दोआन को नायक कहा था. ज़ाहिर है इमरान ख़ान भी नहीं चाहते हैं कि पाकिस्तान में राजनीतिक सरकार के ख़िलाफ़ सेना का तख्तापलट हो, जिसकी आशंका पाकिस्तान में हमेशा बनी रहती है.

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सैन्य और सुरक्षा संबंध

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुर्की-पाकिस्तानी एकता दशकों से साफ़ दिखती रही है. दोनों देश एक दूसरे को अपने आतंरिक मसलों पर समर्थन करते रहे हैं. दोनों देशों की क़रीबी अज़रबैजान को लेकर भी है.

तीनों देशों की यह दोस्ती आर्मेनिया को भारी पड़ती है. पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है जिसने आर्मेनिया को संप्रभु राष्ट्र की मान्यता नहीं दी है. अज़रबैजान विवादित इलाक़ा नागोर्नो-काराबाख़ पर अपना दावा करता है और पाकिस्तान भी इसका समर्थन करता है. तुर्की का भी इस मामले में यही रुख़ है.

इसके बदले में तुर्की पाकिस्तान को कश्मीर पर समर्थन देता है. इसी साल फ़रवरी में भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में कथित चरमपंथी कैंपों पर एयर स्ट्राइक का दावा किया तो दोनों देशों के बीच तनाव काफ़ी बढ़ गया था. पाकिस्तान ने एक भारतीय पायलट को गिरफ़्तार कर लिया था जिसे बाद में छोड़ दिया था. पाकिस्तान के इस क़दम की राष्ट्रपति अर्दोआन ने तारीफ़ की थी.

पाँच अगस्त को जब भारत ने अपने नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया तब भी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने राष्ट्रपति अर्दोआन से संपर्क किया और उन्होंने पाकिस्तान के रुख़ का समर्थन किया.

अर्दोवान ख़ुद को मुस्लिम दुनिया के बड़े नेता और हिमायती के तौर पर भी पेश करते हैं. हालांकि दोनों देशों में भले दोस्ती है लेकिन दोनों के दोस्त एक ही नहीं हैं. तुर्की और चीन के संबंध अच्छे नहीं हैं लेकिन चीन और पाकिस्तान के संबंध बहुत अच्छे हैं. तुर्की चीन में वीगर मुसलमानों के प्रति सरकार व्यवहार की खुलकर आलोचना करता है जबकि पाकिस्तान चुप रहता है.

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तुर्की और सऊदी अरब के रिश्ते ठीक नहीं हैं लेकिन पाकिस्तान और सऊदी के रिश्ते बहुत अच्छे हैं. पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के ख़िलाफ़ तुर्की काफ़ी मुखर रहा लेकिन पाकिस्तान बिल्कुल चुप रहा.

पाकिस्तान और तुर्की एक जैसे अलगाववाद से जूझ रहे हैं. तुर्की में कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी के साथ जारी संघर्ष में पाकिस्तान अर्दोवान के साथ खड़ा रहता है. कुर्द विद्रोहियों के साथ तुर्की का संघर्ष लंबे समय से चल रहा है. 2015 में तो तुर्की ने इस संघर्ष में पाकिस्तान से ख़ुफ़िया और संसाधनों की मदद का भी अनुरोध किया था.

दोनों देशों के बीच मधुर संबंधों में पाकतुर्क स्कूल सबसे विकट मुद्दा बनकर सामने आया. ये स्कूल प्रभावशाली इस्लामिक धार्मिक नेता फ़ेतुल्लाह गुलेन के ग्लोबल नेटवर्क के हिस्सा रहे थे. एक वक़्त में फ़ेतुल्लाह अर्दोआन के सहोयगी हुआ करते थे. इन स्कूलों के ज़रिए तुर्की की संस्कृति के साथ-साथ गुलेन राजनीतिक विचारों को प्रोत्साहन दिया जाता था.

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2016 में जब तख़्तापलट की कोशिश हुई तो अर्दोवान ने इसके लिए गुलेन और उनके हिज़मत आंदोलन को दोषी ठहाराया.

इसके बाद से अर्दोआन ने बाक़ी के देशों से कहा कि गुलेन आतंकवाद के समर्थक हैं इसलिए अपने यहां चल रहे उनके स्कूलों को बंद करे. पाकिस्तान ने अर्दोवान की मांग को ख़ारिज नहीं किया. पहले स्कूलों में काम करने वालों को रेजिडेंस वीज़ा देने से इनकार किया और बाद में उन्हें पाकिस्तान छोड़ने पर मजबूर किया.

इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गुलेनवादियों को आतंकवादी घोषित कर दिया और पाकतुर्क स्कूलों को मारिफ़ फ़ाउंडेशन के हवाले कर दिया. मतलब पाकिस्तान ने अर्दोवान की ख़िदमत में कोई कमी नहीं की.

दूसरी तरफ़ अफ़ग़ानिस्तान समस्या को लेकर भी तुर्की पाकिस्तान के रुख़ का समर्थन करता है. हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के दख़ल के दौरान पाकिस्तान और तुर्की मुजाहिदीन के साथ थे. इसकी वजह से अमरीका के साथ सहयोग के कारण दोनों देश इस्लामिक वर्ल्ड के टकराव से अलग नहीं रहे.

अमरीका ने अक्टूबर 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर जब हमला किया तो पाकिस्तान को तालिबान के ख़िलाफ़ होना पड़ा था.

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