इमरान ख़ान की कोशिश को FATF से झटका

  • 7 अक्तूबर 2019
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एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) की रिपोर्ट पाकिस्तान के लिए झटका है. एपीजी की फ़ाइनल रिपोर्ट में मनी लॉन्डरिंग और आतंकवाद के वित्त पोषण को लेकर कहा गया है कि पाकिस्तान ने संतोषजनक क़दम नहीं उठाया है.

एपीजी ने मनी लॉन्डरिंग पर अपनी रिपोर्ट फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) की समग्र बैठक से 10 दिन पहले जारी की है. इस बैठक में ही रिपोर्ट के आधार पर पाकिस्तान के ग्रे लिस्ट में बने रहने पर फ़ैसला होना है.

एपीजी रिपोर्ट के बाद पाकिस्तान पर यह ख़तरा मंडरा रहा है कि एफ़एटीएफ़ की बैठक में पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में बना रह सकता है.

एपीजी रिपोर्ट का कहना है कि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 के तहत आतंकवादी संगठनों के ख़िलाफ़ ठोस क़दम नहीं उठाया. एफ़एटीएफ़ की बैठक 13 और 18 अक्तूबर के बीच होनी है.

लेकिन पाकिस्तान का कहना है कि वो एफ़एटीएफ़ के सदस्यों को संतुष्ट करने में सफल होगा.

पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि पाकिस्तान ने इस मामले में काफ़ी प्रगति की है.

बीबीसी उर्दू की संवाददाता नादिया सुलैमान से फ़ोन पर बातचीत के दौरान पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी का कहना था, ''हिन्दुस्तान तो बढ़-चढ़ कर पाकिस्तान का विरोध कर रहा है. यह किसी से ढकी-छुपी बात नहीं है. वो तो पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में धकेलना चाहता है, लेकिन दुनिया जानती है और एशिया पैसिफिक ग्रुप की अभी बैंकाक में जो बैठक हुई थी उसमें उन्होंने उसका पूरा जायजा लिया है. और मैं समझता हूं कि उनमें ख़ासा इत्मीनान है कि पाकिस्तान ने इस मामले में ख़ासा प्रोग्रेस की है.''

क़ुरैशी ने कहा कि इमरान ख़ान के हालिया अमरीका दौरे में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रेम्प से मुलाक़ात के दौरान पाकिस्तान ने एफ़एटीएफ़ के मामले में अपना नज़रिया पेश किया था.

क़ुरैशी ने उम्मीद जताई कि अमरीका पाकिस्तान का नज़रिेया समझेगा और इस मामले में पाकिस्तान के साथ सहयोग करेगा.

यह रिपोर्ट पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को निराश करने वाली है. संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में 27 सितंबर को बोलते हुए इमरान ख़ान ने भारत पर आरोप लगाया था कि वो पाकिस्तान को एफ़एटीएफ़ की ब्लैक लिस्ट में डलवाने की कोशिश कर रहा है.

इमरान ख़ान ने कहा था, ''भारत चाहता है कि पाकिस्तान आर्थिक रूप से दिवालिया हो जाए. हम भारत से शांति वार्ता की कोशिश करते रहे और भारत अपने एजेंडा पर लगा रहा.''

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हालांकि पाकिस्तान को एफ़एटीएफ़ ब्लैकलिस्ट करेगा, इसकी आशंका कम ही है. इस बार एफ़एटीएफ़ प्रमुख का पद चीनी बैंकर शिंजामिन लियू के पास है और कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के लिए यह राहत भरी स्थिति है.

हाल के हफ़्तों में तुर्की और मलेशिया कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ खुलकर सामने आए हैं. एफ़एटीएफ़ के मामले में भी पाकिस्तान को तुर्की और मलेशिया से मदद मिल सकती है.

जून 2018 में पाकिस्तान जब ग्रे लिस्ट में आया था तो चीन और तुर्की ने पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में आने से बचने में मदद की थी. आख़िरकार चीन ने पाकिस्तान को लेकर अपनी आपत्ति वापस ले ली थी.

क्या है एफ़एटीएफ़

एफ़एटीएफ़ एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसकी स्थापना G7 देशों की पहल पर 1989 में की गई थी. संस्था का मुख्यालय पेरिस में है, जो दुनिया भर में हो रही मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए नीतियां बनाता है.

साल 2001 में इसने अपनी नीतियों में चरमपंथ के वित्तपोषण को भी शामिल किया था. संस्था अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली को सही रखने के लिए नीतियां बनाता है और उसे लागू करवाने की दिशा में काम करता है.

इसके कुल 38 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत, अमरीका, रूस, ब्रिटेन, चीन भी शामिल हैं.

जून 2018 से पाकिस्तान दुनिया भर के मनी लॉन्ड्रिंग पर नज़र रखने वाले संस्थाओं के रेडार पर है. पाकिस्तान इन संस्थाओं के निशाने पर तब आया जब उसे चरमपंथियों को फंड करने और मनी लॉन्ड्रिंग के ख़तरे को देखते हुए 'ग्रे लिस्ट' में डाल दिया गया था. ग्रे लिस्ट में सर्बिया, श्रीलंका, सीरिया, त्रिनिदाद, ट्यूनीशिया और यमन भी हैं.

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तुर्की पाकिस्तान के साथ

तुर्की एकमात्र ऐसा देश था जो खुलकर भारत के लाए गए इस प्रस्ताव का विरोध कर रहा था. भारत के इस प्रस्ताव का समर्थन अमरीका और ब्रिटेन कर रहे थे, वहीं पाकिस्तान का लंबे वक़्त से साथ देने वाला चीन उस समय इस पर चुप था.

चीन अब तक सभी मंचों पर पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करते आया है लेकिन अब वो भी शांत है.

एफ़एटीएफ़ और एशिया पैसिफिक ग्रुप के संयुक्त समूह का सदस्य देश भारत चाहता था कि पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में शामिल किया जाए.

भारत का पक्ष था कि पाकिस्तान वित्तीय अपराधों का मुक़ाबला करने में अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने में विफल रहा है.

लेकिन चीन, मलेशिया, तुर्की की मदद से पाकिस्तान ने ख़ुद को इससे बचा लिया था. चीन ने इस पूरे मामले में ख़ुद को बिल्कुल अलग रखा लेकिन भारत के पक्ष में नहीं आने से फ़ायदा पाकिस्तान को ही हुआ.

38 सदस्यीय देशों वाले एफ़एटीएफ़ के नियमों के अनुसार ब्लैकलिस्ट से बचने के लिए किसी भी देश को तीन सदस्यों के समर्थन की ज़रूरत होती है.

पिछले हफ़्ते एफ़एटीफ़ की फ़्लोरिडा में हुई बैठक के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने माना था कि "पाकिस्तान पर संकट के बादल अभी टले नहीं हैं."

अंतरराष्ट्रीय संस्था औपचारिक रूप से पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट में शामिल नहीं करने के फ़ैसले की घोषणा अगले हफ़्ते पेरिस में होने वाली बैठक में करेगा.

तब कुछ अधिकारियों ने नाम नहीं ज़ाहिर करने की शर्त पर अनादोलू समाचार एजेंसी से कहा था, "यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक क़दम है कि तुर्की, चीन और मलेशिया के समर्थन के कारण (एफ़एटीएफ़ द्वारा) पाकिस्तान पर तत्काल ब्लैकलिस्ट होने का ख़तरा नहीं है."

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मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए आधिकारी को सार्वजनिक बयान देने की अनुमति नहीं दी गई थी.

लेकिन अधिकारी ने कहा था कि पाकिस्तान को एफ़एटीएफ़ की डेडलाइन को पूरा करना चाहिए था, जो जनवरी 2019 में तय की गई थी. इस वक़्त तक मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य वित्तीय ख़ामियों को पूरी तरह से दूर करना था.

इस साल फ़रवरी के महीने में एफ़एटीएफ़ ने अपने एक बयान में कहा था, "जनवरी 2019 में एक्शन प्लान आइटम पर धीमी प्रगति को देखते हुए एफ़एटीएफ़ ने पाकिस्तान से अपने लक्ष्य को पूरा करने का आग्रह किया है, ख़ासकर मई 2019 की समयसीमा के लिए निर्धारित किए गए लक्ष्यों को."

संस्था ने इस बात पर सहमति जताई कि पाकिस्तान ने पिछले साल एफ़एटीएफ़ के सदस्यों से बातचीत के बाद कार्ययोजना को लागू करने की दिशा में प्रगति की थी, लेकिन इस दिशा में प्रतिबंध और पक्ष रखने की ज़रूरत है.

पिछले महीने चीन के ग्वांगझू में हुए एक बैठक में पाकिस्तान को इस मामले में और अधिक कार्रवाई करने को कहा गया था क्योंकि एक्शन प्लान में 27 में 18 सूचकों पर इसका काम असंतोषजनक पाया गया था.

हाल के महीनों में पाकिस्तान ने एक्शन प्लान के अनुसार कुछ बड़े क़दम उठाए थे, जिसमें विदेशी मुद्राओं के लेनदेन पर अनुमति लेना और मुद्रा परिवर्तन के लिए पहचान पत्र देना शामिल है.

इसके अलावा पाकिस्तान ने भी कई चरमपंथी समूहों पर मुक़दमा चलाया और उनकी संपत्ति ज़ब्त की है.

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ग्रे लिस्ट में आने से हर साल 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान

पाकिस्तान विदेश मंत्रालय का कहना है कि पाकिस्तान, तुर्की और बाक़ी सहयोगी देशों के साथ लगातार संपर्क में है और कोशिश कर रहा है कि इन देशों के अधिकारी उसे 'ग्रे लिस्ट' से बाहर लाने में मदद करेंगे.

इससे पहले पाकिस्तान साल 2011 में भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर चुका है. उस वक़्त भी इसे ग्रे लिस्ट में डाल दिया गया था. इसके बाद साल 2015 में पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से तभी बाहर आ पाया जब इसने सफलतापूर्वक ऐक्शन प्लान लागू किया.

इस वक़्त पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए 36 वोटों में से कम से कम 15 वोटों की ज़रूरत है.

इस लिस्ट में आने से पाकिस्तान को हर साल लगभग 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है.

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