कुर्द अपनी ही ज़मीन पर क्यों हैं तबाह

  • 11 अक्तूबर 2019
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कुर्दों की जांबाज़ी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1920 में इराक़ में कुर्दिस्तान की लड़ाई के लिए बने हथियारबंद संगठन का नाम 'पेशमेगा' था जिसका मतलब होता है 'वो लोग जो मौत का सामना करते हैं.'

संयुक्त कुर्दिस्तान को लेकर शुरू हुई लड़ाई आज कई संगठनों में बँट चुकी है. अरब, कुर्दिस्तान और उत्तरी अफ़्रीका उस्मानी हुक़ूमत यानी ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा हुआ करते थे.

पहले विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद अलग-अलग देश अस्तित्व में आए जिसके बाद कुर्दिस्तान का इलाक़ा आज सीरिया, इराक़, तुर्की, ईरान और अर्मेनिया जैसे देशों में बंट चुका है. आज इन इलाक़ों में रहने वाले कुर्दों की आबादी तकरीबन साढ़े तीन करोड़ है.

इतने इलाक़ों में बँटे कुर्दों का कोई एक केंद्रीय संगठन नहीं है. अलग-अलग देशों में अलग-अलग संगठन कुर्दिस्तान के लिए लड़ रहे हैं. आख़िर इसकी क्या वजह है जो ये सभी संगठन एक मंच पर नहीं आ सके.

इस सवाल पर मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आगा कहते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह इनका अलग-अलग देशों में बँटा होना है.

वो कहते हैं, "ये संगठन अलग-अलग देशों में बँटे हुए हैं. इनकी जद्दोजहद एक होकर कुर्दिस्तान बनाने की है लेकिन इनके आपस में मतभेद हैं. इन लोगों के अलग हुए 100 साल से अधिक हो गए हैं. इस वजह से इनके अपने स्वार्थ पैदा हो गए हैं."

"तुर्की में मौजूद कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) इनका सबसे बड़ा संगठन है जो विचारधारा से मार्क्सवादी हैं और गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहे हैं. सीरिया में स्वायत्त राज्य बनाने के लिए वाईपीजी समूह लड़ रहा है और इसको अमरीका से समर्थन हासिल था. तुर्की से लगी सीमा पर कुर्दों का बड़ा हिस्सा है."

"तुर्की का मानना है कि यह वाईपीजी समूह चरमपंथी संगठन है और वह इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा. उसे लगता है कि वाईपीजी उसके यहां अव्यवस्था फैला सकता है. वाईपीजी को अमरीका समर्थन करता आया था लेकिन अब उसने अपना समर्थन वापस ले लिया है."

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Image caption उत्तरी सीरिया में अमरीकी सुरक्षाबलों के साथ गश्त लगाते तुर्की के सुरक्षाबल

पीकेके को चरमपंथी क्यों मानता है तुर्की

कुर्दों को इराक़ के उत्तर पश्चिम में एक स्वायत्त राज्य मिला हुआ है जबकि तुर्की के दक्षिण पूर्व में यह स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं. वहीं, सीरिया के उत्तर-पूर्व में यह अपना शासन चला रहे हैं. ईरान के उत्तर पश्चिम में भी कुर्द हैं लेकिन वहां कुर्दिस्तान के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं चल रहा है.

तुर्की अपने यहां सक्रिय रहे कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी यानी की पीकेके को चरमपंथी संगठन घोषित कर चुका है. तुर्की के साथ ही अमरीका और यूरोपीय यूनियन भी पीकेके को चरमपंथी संगठन मानता है.

इस पर अंकारा की यिल्दिरिम बेयाज़ित विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस कहते हैं, "1974 में अब्दुल्ला ओजलान ने जब पीकेके नामक संगठन बनाया तो इसने हिंसक रुख़ अपनाया. उस वक़्त अब्दुल्ला ओजलान और उसके संगठन ने तुर्की में कई हमले किए जिनमें तक़रीबन 40 हज़ार लोगों की मौतें हुईं. इसके बाद अब्दुल्ला ओजलान भागकर सीरिया चले गए और उन्हें वहां बशर अल असद के पिता हाफ़िज़ उल असद ने पनाह दी. वहां रहकर उन्होंने बहुत सारे संगठन बनाए."

"आज सीरिया में मौजूद कुर्द संगठन वही हैं जिनको अब्दुल्ला ओजलान ने ट्रेनिंग दी थी."

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Image caption तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन 32 किलोमीटर चौड़ा एक 'सेफ़ ज़ोन' बनाना चाहते हैं. इसका नक्शा उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया था.

कुर्दिस्तान को लेकर आज सबसे बड़ी लड़ाई सीरिया-तुर्की की सीमा पर मौजूद पीवाईडी और वाईपीजी संगठनों ने छेड़ी हुई है क्योंकि तुर्की में इस समय दो करोड़ कुर्द लोग रहते हैं. तुर्की पीकेके की ही तरह पीवाईडी और वाईपीजी को अपना दुश्मन मानता है.

तुर्की ने साल 2018 में पश्चिमी सीरिया में कुर्दों के नियंत्रण वाले आफ़रिन प्रांत में हमला किया था जिसमें कई आम लोग मारे गए थे और दस हज़ार लोग विस्थापित हुए थे.

आईएस के ख़िलाफ़ सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ॉर्सेज़ (एसडीएफ़) ने अमरीका के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी. एसडीएफ़ में कुर्द और अरब लड़ाके समूह हैं. इन्हीं में से एक वाईपीजी अमरीकी फ़ौज का साथी रहा है लेकिन अब अमरीका ने उत्तर-पूर्व सीरिया से जाने की घोषणा कर दी है.

अमरीका का कहना है कि वह आईएस के ख़िलाफ़ लड़ाई जीत चुका है. अमरीका की वजह से अब तक पीवाईडी और दूसरे संगठनों को सुरक्षा हासिल थी लेकिन उनके चले जाने के बाद तुर्की आराम से वाईपीजी का सफ़ाया कर सकता है.

हालांकि, अमरीका चेता चुका है कि अगर ऐसा होता है तो वह तुर्की को आर्थिक रूप से तोड़कर रख देगा.

अमरीका के उत्तर-पूर्व सीरिया से जाने के बाद तुर्की कुर्दों के क्षेत्र में क्या करेगा? इस पर ओमेर कहते हैं कि तुर्की सीरिया के साथ लगी सीमा पर सेफ़ ज़ोन बनाने जा रहा है जहां उसने सीरियाई शरणार्थियों को बसाने की योजना पेश की है.

वो कहते हैं, "इस समय सीरिया से भागकर तुर्की में आने वाले शरणार्थियों की संख्या 10 लाख से अधिक है. तुर्की इन शरणार्थियों को अपनी सीमा पर बसाना चाहता है. इसको लेकर उसका अमरीका से समझौता हुआ था जिसमें 30 किलोमीटर दूर तक एक सेफ़ ज़ोन का निर्माण करना था. इसके निर्माण के लिए तुर्की वाईपीजी जैसे संगठनों से भी टकराएगा."

अगस्त में तुर्की और अमरीका एक 'सेफ़ ज़ोन' बनाने पर राज़ी हुए थे. लेकिन दो महीने बाद अमरीका ने कहा कि तुर्की के सुरक्षाबल ख़ुद यह सेफ़ ज़ोन बनाएंगे. इसके बाद तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा कि वह 30 किलोमीटर चौड़ा और 480 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर बनाएंगे.

इसके अलावा ऐसा समझा जा रहा है कि इस क्षेत्र में जेलों में मौजूद आईएस लड़ाकों को भी तुर्की इसी सेफ़ ज़ोन में रखेगा.

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Image caption सीरिया में आईएस के ख़िलाफ़ सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ॉर्सेज़ ने लड़ाई लड़ी जिसका वाईपीजी सबसे बड़ा समूह है.

इराक़ी कुर्द कितने मज़बूत

इराक़ में धीरे-धीरे कुर्दों की स्थिति सुधरी है. इस समय इराक़ में मौजूद कुर्द सबसे ताक़तवर हैं क्योंकि उनके पास वहां एक स्वायत्त राज्य है.

फिर इराक़ के कुर्द, सीरिया, तुर्की और ईरान के कुर्दों की मदद क्यों नहीं करते हैं. इस पर क़मर आगा कहते हैं कि इराक़ी कुर्दिस्तान के तुर्की से अच्छे संबंध हैं.

वो कहते हैं, "इराक़ के कुर्द सबसे ताक़तवर हैं क्योंकि उनके पास बहुत पैसा है और साथ ही उनको इराक़ी सरकार ने स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा दिया हुआ है. उनके पास तेल के बड़े भंडार हैं और वो बिज़नेस का केंद्र बन चुका है. पश्चिमी देशों की मदद से सद्दाम हुसैन के वक़्त में ही उन्हें काफ़ी स्वायत्तता मिल गई थी. लेकिन कुर्द नेता मुल्ला मुस्तफ़ा बर्दानी के वक़्त से ही उनके रिश्ते तुर्की से बहुत अच्छे हैं. इनके अमरीका से भी अच्छे रिश्ते हैं."

"इनके सीरिया के वाईपीजी और पीकेके से अच्छे रिश्ते नहीं रहे हैं लेकिन इराक़ का आम तुर्क इन संगठनों की मदद करना चाहता था. इन लोगों के राजनीतिक मतभेद भी हैं क्योंकि सीरिया और तुर्की के कुर्द संगठन मार्क्सवादी हैं और इराक़ी कुर्दिस्तान के संगठन मार्क्सवादी नहीं हैं. यह सोचना की सब एक साथ आ जाएंगे ऐसा होना फ़िलहाल मुश्किल है."

हालांकि, सितंबर 2017 में इराक़ी कुर्दिस्तान में स्वतंत्रता के लिए जनमत संग्रह हुआ था जिसमें 92 फ़ीसदी लोगों ने अलग देश की मांग की थी. इस जनमत संग्रह को इराक़ की सरकार ने असंवैधानिक कहकर ख़ारिज कर दिया था. इसके बाद इराक़ ने कुर्द क्षेत्र में सुरक्षाबल तैनात कर दिए थे जिसके बाद इस मुद्दे को बातचीत से सुलझाया जा रहा है.

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अमरीका क्यों नहीं करता कुर्दों की मदद

अमरीका ने जब उत्तर-पूर्वी सीरिया में आईएस को ख़त्म करने के लिए वाईपीजी की मदद ली तो इस कुर्द संगठन को लगा कि उसके स्वायत्त देश का सपना जल्द पूरा हो जाएगा. अमरीका ने वाईपीजी की पैसे और हथियारों से मदद की और इस संगठन ने आईएस को हराने में बड़ी भूमिका निभाई.

वहीं, वाईपीजी के साथ सुरक्षा अभियान चलाने पर तुर्की अमरीका से नाराज़ हो गया था. अमरीका ने तुर्की को सिर्फ़ एक इलाक़े में सुरक्षा अभियान चलाने की अनुमति दी थी. अब अमरीका ऐसे समय में उत्तर-पूर्वी सीरिया से जा रहा है जब कुर्दों को अपना एक अलग देश बनता नज़र आ रहा था.

आख़िर अमरीका ने एक स्वतंत्र कुर्दिस्तान बनाने में मदद क्यों नहीं की?

इस सवाल पर ओमेर अनस कहते हैं, "ऐसा कभी नहीं लगता कि अमरीका और यूरोपीय यूनियन एक स्वतंत्र कुर्दिस्तान के लिए कोई कोशिश करेंगे. स्वतंत्र कुर्दिस्तान से ईरान, इराक़, तुर्की और सीरिया जैसे चार राष्ट्र जुड़े हुए हैं."

"अगर अमरीका ऐसी कोशिश करता है तो इन चारों राष्ट्रों की सेनाएं एक साथ हो जाएंगी और यूरोप-अमरीका की ऐसी किसी भी कोशिश को नाकाम कर देंगी. इसलिए वे ऐसा नहीं करेंगे. हालांकि, अमरीका और यूरोप इन देशों में रह रहे कुर्दों को अधिक अधिकार दिलवाने की कोशिश कर सकते हैं."

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Image caption उत्तर-पूर्व सीरिया में वाईपीजी लड़ाकों का दबदबा है. इसे पीवाईडी संगठन की ही सेना माना जाता है.

ईरान के कुर्दों का क्या है हाल

तुर्की ने पीकेके के नेताओं के साथ शांति के लिए 2013 और 2015 में कई दौर की बातचीत की लेकिन वह अंजाम तक नहीं पहुंची. अरब स्प्रिंग के दौरान पीकेके के लड़ाकों को लगा कि वह भी कुर्द क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर सकते हैं इस वजह से बातचीत टूट गई.

कुर्द अधिकतर सुन्नी मुस्लिम हैं और इराक़-सीरिया में कुर्द शिया मुस्लिम भी हैं. यह काफ़ी जुझारू किस्म के लोग हैं. इराक़ को छोड़कर इनके ज़्यादातर समूह धर्म-निरपेक्ष हैं. इराक़ में मुल्ला मुस्तफ़ा बर्ज़ानी का समूह धार्मिक रहा है.

ईरान में कुर्दों की आबादी 7 से 10 फ़ीसदी है. सभी देशों की तरह यहां भी इनकी सरकार से गहमागहमी रहती है लेकिन वहां तुर्की और सीरिया जैसे हालात नहीं हैं. इसकी क्या वजह है.

इस पर क़मर आगा कहते हैं, "ईरान में कुर्दों के लिए काम हुआ है. वहां कुर्द बहुत पढ़े लिखे हैं. उनकी शिक्षा और विकास का काम हुआ है. ईरान में इनके एकजुट होने की ख़बर आती हैं लेकिन वहां कोई बड़ा समूह नहीं है. ऐसे ही इराक़ में भी कुर्दों के लिए काम हुआ है. सद्दाम के कार्यकाल में वह ज़रूर हाशिए पर थे. उनके हालात ठीक होने शुरू हुए तो आईएसआईएस आ गया. इस दौरान उनको ज़रूर दिक़्क़त हुई लेकिन अब हालात इराक़ में सुधरे हैं. तुर्की और दूसरे देशों से इराक़ी कुर्दिस्तान में निवेश आ रहा है."

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कभी बन पाएगा कुर्दिस्तान?

क्या एक कुर्दिस्तान की जंग कभी मूर्त रूप ले पाएगी? इस पर क़मर आगा कहते हैं, "सबके दिमाग़ में एक कुर्दिस्तान होने की चाह है लेकिन यह पूरा होते नहीं दिख रहा है. अभी तक कोई ऐसी संस्था नहीं बन पाई है. पीकेके जैसा संगठन बना लेकिन वह वामपंथी विचारधारा वाला है जिस पर सब राज़ी नहीं हुए. पीकेके और वाईपीजी लंबे समय से लड़ रहे हैं लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई."

"इसके अलावा हर एक देश में इनके कई संगठन हैं और हर नेता के बीच मतभेद भी दिखते हैं. कुर्दों की संस्कृति में भी अंतर आ गया है. भाषा सबकी एक ज़रूर हो गई है. लेकिन यहां पर कई अलग-अलग धर्मों के संगठन हैं."

सीरिया में स्वायत्त क्षेत्र बन जाता तो उसकी उम्मीद थी कि एक राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हो सकता था. अब तुर्की की सेना सीरिया में जाएगी वो वहां कार्रवाई करेगी. फ़िलहाल कुर्दों को लेकर कोई बड़ा संगठन बन पाएगा और कुर्दिस्तान का ख़्वाब मुकम्मल हो पाएगा ऐसी कोई सूरत नहीं दिख रही है.

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