BREXIT को लेकर क्यों मची है उठापटक, कहां अटका है मामला

  • 21 अक्तूबर 2019
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ब्रेग्ज़िट यानी ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने को लेकर संशय बना हुआ है.

प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का शुरू से रुख़ रहा है कि ब्रिटेन को तय तारीख़ यानी 31 अक्तूबर तक हर हाल में यूरोपीय संघ से बाहर निकालना है. मगर इसकी राह अभी भी आसान नहीं दिख रही.

गुरुवार को ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच एक नए समझौते पर सहमति बनी मगर शनिवार को ब्रितानी संसद ने इस समझौते के विरोध में मतदान किया.

इसके बाद ब्रितानी सरकार को एक बार फिर यूरोपीय संघ को चिट्ठी भेजकर ब्रेग्ज़िट के लिए और मोहलत देने की गुज़ारिश करनी पड़ी मगर अब एक वरिष्ठ मंत्री ने विरोधाभासी बयान देते हुए कहा है कि ब्रिटेन हर हाल में तय तारीख़ को यूरोपीय संघ से बाहर निकलेगा.

इस तरह से एक बार फिर ब्रेग्ज़िट को लेकर प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या यह 31 अक्तूबर को होगा या नहीं. अगर होगा तो किस सूरत में और नहीं तो उसके क्या परिणाम होंगे.

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मगर यह अनिश्चितता तभी से बनी हुई है जब 2016 में इस विषय पर करवाए गए जनमतसंग्रह के नतीजे आए थे. 52 प्रतिशत लोगों ने ब्रेग्ज़िट के पक्ष में वोट दिया था.

नतीजे आने के बाद सत्ताधारी कंज़र्वेटिव पार्टी ने कहा कि जनता के आदेश का पालन किया जाएगा. 2017 में जब फिर चुनाव हुए, तब लेबर पार्टी ने भी अपने मेनिफ़ेस्टो में यही बात कही.

इस तरह से सभी पक्षों ने जनमत संग्रह के नतीजों के साथ ख़ुद के हाथ-पैर बांध लिए. अब आप उससे पीछे नहीं हट सकते क्योंकि यह लोकतंत्र के ख़िलाफ़ होगा कि आपने लोगों को प्रस्ताव दिया, उन्होंने उस पर वोट किया और फिर आप कहेंगे कि हम आपकी बात नहीं मान सकते.

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नॉदर्न आयरलैंड सबसे बड़ा मुद्दा

जैसे-जैसे ब्रेग्ज़िट की प्रक्रिया 2016 से आगे बढ़ी है तो यह बिल्कुल साफ़ दिखाई देने लगा है कि इसके परिणाम ब्रिटेन के लिए हानिकारक होने वाले हैं.

ये परिणाम न सिर्फ़ आर्थिक रूप से नकारात्मक होंगे बल्कि नॉदर्न आयरलैंड को लेकर भी बड़ा मसला खड़ा हो जाएगा. अभी तक जिस भी डील की बात हुई है, उसमें इस विषय को हल करने को लेकर कुछ ख़ास नहीं दिखा है.

नॉदर्न आयरलैंड और आयरलैंड एक ही द्वीप के अंदर दो यूनिट्स हैं. आयरलैंड स्वतंत्र देश है जबकि नॉदर्न आयरलैंड यूके का हिस्सा है. आयरिश युद्ध को ख़त्म करने के लिए गुड फ़्राइडे अग्रीमेंट के तहत जो शांति क़ायम हुई थी, उसका आधारभूत बिंदू है कि दोनों के बीच हार्ड बॉर्डर नहीं रहेगा. अभी दोनों के बीच किसी तरह की रोकटोक या पाबंदी नहीं है.

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Image caption आयरलैंड और नॉदर्न आयरलैंड के बीच हार्ड बॉर्डर बनने की आशंका को लेकर प्रदर्शन होते रहे हैं

हार्ड बॉर्डर न होने का मतलब है कि अभी लोगों के आने-जाने, सामान लाने-ले जाने के बीच कोई सीमा का बंधन नहीं है. लेकिन 2016 में हुए रेफ़पेंडम के बाद यह स्पष्ट हो गया कि यूके की यूनिट्स (इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉदर्न आयरलैंड) भी यूरोपीय संघ से बाहर हो जाएंगी.

अब नॉदर्न आयरलैंड भी जब बाहर हो जाएगा तो पेचीदा मसला खड़ा हो जाएगा क्योंकि हार्ड बॉर्डर लगाना पड़ेगा. बोरिस जॉनसन आयरलैंड गए थे और टेक्निकल बॉर्डर की बात की मगर अव्यावहारिक होने के कारण इसे बाद में ठुकरा दिया गया.

बोरिस जॉनसन ने अब आयरिश सी में बॉर्डर बना देने की बात की है. यानी ब्रिटेन और पूरे आयरलैंड के द्वीप के बीच सीमा बना देंगे. ऐसे में नॉदर्न आयरलैंड की पार्टी डीयूपी कहती है कि अगर हमें ब्रिटेन के बाक़ी क्षेत्र से अलग ट्रीट किया गया तो इससे यह हो सकता है कि नॉदर्न आयरलैंड कल को आयरलैंड से मिल सकता है और आयरलैंड का एकीकरण हो सकता है.

यानी इसे हल करना आसान नहीं है. इसके अलावा जॉनसन ने जो प्रस्ताव पेश किया है, वह बिल्कुल साफ़ नहीं है.

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आने वाले 10 दिनों में क्या होगा?

हर दिन ब्रेग्ज़िट मामले में नया मोड़ आ जाता है. आज जो होता है, वह दो दिन में ही अप्रासंगिक हो जाता है. लेकिन 31 तारीख़ तक यूरोपीय संघ से निकलना मुश्किल होगा. अगर ऐसा हुआ भी तो क़ानूनी प्रक्रिया तोड़-मरोड़कर ही किया जा सकेगा.

बोरिस जॉनसन ने यूरोपीय संघ को जो चिट्ठियां भेजी हैं, उनमें से एक में उनके हस्ताक्षर ही नहीं हैं. यानी वह आधिकारिक पत्र है या नहीं, यह कोई कहने को तैयार नहीं है.

ब्रेग्ज़िट को लेकर एक महीने से संसदीय कार्यवाही चल रही है. इसमें बेन एक्ट नाम का कानून पास हुआ था जिसके तहत ब्रितानी प्रधानमंत्री के लिए यूरोपीय संघ से ब्रेग्ज़िट को टालने की मांग करना ज़रूरी था.

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इसते तहत उन्होंने मोहलत मांगी और जो चिट्ठी भेजी, उसमें बेन्स एक्ट की फ़ोटोकॉपी भेजी, जिसमें हस्ताक्षर की जगह सिर्फ़ प्रधानमंत्री का नाम टाइप किया गया था.

फिर एक चिट्ठी में पहले वाली चिट्ठी को ख़ारिज करते हुए कहा कि आगे हमें मोहलत नहीं चाहिए होगी. अब सोमवार को यह बात पता चलेगी कि कौन सी बात क़ानूनी और न्यायसंगत है, कौन सी नहीं.

फिर भी, बोरिस जॉनसन क़ानून तोड़ते हुए 31 अक्तूबर तक ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से बाहर ले आएं, इसकी संभावना 50 प्रतिशत तो लग ही रही है.

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ब्रेग्ज़िट से ब्रिटेन पर क्या असर होगा

अभी तक जो अनुमान आए हैं, उनके मुताबिक़ ब्रिटेन की एक प्रतिशत जीडीपी ब्रेग्ज़िट रेफरेंडम से आज तक ख़त्म हो चुकी है.

जो औद्योगिक क़स्बे हैं, वहां जापानी या जर्मनी की कार कंपनियों ने इसलिए अपने प्रॉडक्शन यूनिट खोले थे क्योंकि ब्रिटेन के अंदर अच्छी और क़ाबिल वर्कफ़ोर्स मानी जाती है और यहां पर मज़दूरी भी स्थिर रहती है.

लेकिन ब्रिटेन ईयू से बाहर आता है तो जितनी भी चीज़ें यहां बनती हैं तो वे कहीं और बनानी होंगी. तो काफ़ी नौकरियों पर संकट पैदा हो जाएगा. माना जा रहा है कि लाख से डेढ़ लाख नौकरियों पर सीधा असर पड़ सकता है.

खाने-पीने की जीज़ों के दाम पर भी असर पड़ेगा. ब्रिटेन में किसी भी दुकान में अधिकतर रोज़मर्रा की चीज़ें यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों से आती हैं और वे महंगी हो जाएंगी.

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ब्रिटेन में किसानों और ख़ासकर मटन (लैम) फ़ार्म वालों की अधिकतर बिक्री यूरोपीय संघ के अन्य देशों में होती है. उनपर भी प्रभाव पड़ेगा. ऑटो, फ़ार्मिंग समेत हर सेक्टर पर कुछ न कुछ असर होगा.

ध्यान देने वाली बात है कि पहले बहुत से फ़ार्म मालिकों ने ब्रेग्ज़िट के पक्ष में वोट दिया था. उन्हें लगा था कि सब्सिडी जो मिलती है ईयू से, वो शायद मिलती ही रहेंगी.

लेकिन जनमतसंग्रह के समय लोगों के सामने सिर्फ़ ये सवाल थे कि आप चाहते हैं कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ में रहे या नहीं. उस समय प्रचार के दौरान यह नबीं बताया गया था कि आपके सेक्टर पर कितना असर पड़ेगा, सेल गिरेगी या बढ़ेगी, आप उसे बर्दाश्त कर पाएंगे या नहीं.

उस समय चर्चा आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि भावनात्मक आधार पर हो रही थी. लोगों को लग रहा था कि यूरोपीय संघ हमारे लिए फै़सले ले रहा है और हमारा अपनी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण नहीं हैं.

लेकिन अब यह डेटा सामने आ रहा है कि किस सेक्टर को कितना नुक़सान होगा. इसी कारण लेबर पार्टी के रुख़ में भी बदलाव आया है. पहले लगता था कि वे किसी संशय में हैं. मगर अब उनका रुख़ सेंसिबल लगता है.

वे कह रहे हैं कि अब हमारे पास अनुमान हैं कि ब्रेग्ज़िट का क्या परिणाम रहने वाला है. तो जो भी डील है, उसे हमें जनता तक लेकर जाना चाहिए कि हमारे पास यह सब है, अब बताइए आपको यह मंज़ूर है या नहीं? आप कोई और डील तो नहीं चाहते? या फिर हमें यूरोपीय संघ में ही रहना चाहिए?

अभी मामला इसी सब पर अटका हुआ है.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से बातचीत पर आधारित)

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