पाकिस्तान: बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए तक्षशिला में क्रॉस के आकार का स्तूप क्यों हैं ख़ास

  • 26 अक्तूबर 2019
बौद्ध मत

बौद्ध धर्म दुनिया के प्रमुख धर्मों में से एक है, मगर पाकिस्तान में इसके बहुत ही कम अनुयायी हैं. इसके बावजूद यहाँ गौतम बुद्ध को मानने वालों के लिए प्राचीन स्थान और बेशक़ीमती कलाकृतियाँ मौजूद हैं.

पिछले कुछ वर्षों से देश में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए करतारपुर कॉरिडोर सहित विभिन्न परियोजनाओं पर काम चल रहा है. साथ ही गंधारा सभ्यता में विदेशी पर्यटकों की दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए बौद्ध मत से जुड़े धार्मिक कार्यक्रम भी होने लगे हैं.

पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक तक्षशिला बौद्ध शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र समझा जाता है. यहाँ विभिन्न स्तूप, पूजा स्थल और पुरातत्विक अवशेष हैं जिनसे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है.

ये जगहें न सिर्फ़ पाकिस्तान के प्राचीन स्थलों में से एक है, बल्कि इन्हें बौद्ध अनुयायियों में एक महत्वपूर्ण पूजास्थल का दर्जा भी हासिल है. भारत, म्यांमार, नेपाल और कोरिया में इस धर्म के मानने वाले बड़ी संख्या में बसे हुए हैं.

'भीमाला स्तूप सबसे पवित्र'

तक्षशिला में बौद्ध अनुयायियों के लिए पिछले साप्ताह एक प्राचीन स्थल पर सातवीं शताब्दी के बाद पहली बार विशेष पूजा समारोह आयोजित किया गया था. ख़ैबर पख़्तूनख़्वा पुरातत्व विभाग की देखरेख में यह समारोह हरिपुर ज़िले के भीमाला स्तूप के पास हुआ. कोरिया के भिक्षुओं ने यहाँ अमन और सलामती का पैग़ाम दिया.

इस बारे में कोरिया के बुज़ुर्ग भिक्षु डॉ. सिनम का कहना था, 'हमारे लिए दुनिया में सात सबसे पवित्र स्थान हैं. यह उनमें से सबसे पवित्र स्थान है. इसका मतलब है कि पूरे ब्रह्मांड की शक्ति यहाँ एकत्र हो जाती है.'

"हमारे लिए यह एक महत्वपूर्ण स्थान है. हम पर इस जगह का एक अनोखा असर होता है.'

यह स्थान ख़ानपुर बाँध के पास एक प्राकृतिक पहाड़ी पर स्थित है. दिलचस्प बात यह है कि यह प्राचीन स्थल ऊपर से क्रॉस की तरह है और अपनी अनूठी उपस्थिति के साथ यह गंधारा सभ्यता की आख़िरी निशानियों में से एक है.

भीमाला स्तूप तक पहुँचने के लिए ख़ानपुर बाँध के पास एक रास्ता निकलता है. सड़क की हालत तो इतनी अच्छी नहीं है लेकिन वादियों में हरू नदी का नज़ारा सफ़र की थकावट को दूर कर देता है.

यह प्राचीन स्तूप 1930 के दशक में ब्रिटिश पुरातत्वविद सर जॉन मार्शल द्वारा खोजा गया था, जिन्होंने सिंध के लड़काना शहर में मुअनजोदड़ो की भी खोज की थी. यूनेस्को की सूची में शामिल इस ऐतिहासिक स्थल के कुछ अवशेष तक्षशिला संग्रहालय में भी देखे जा सकते हैं.

इस स्थान पर पहुँचने और दर्जनों सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद आपको क्रॉस के आकार का स्तूप नज़र आएगा जहाँ हज़ारा विश्वविद्यालय के छात्र अक्सर निरीक्षण में व्यस्त रहते हैं. तीन बार नियमित रूप से खुदाई हो चुकी है. विशेषज्ञ यहाँ महत्वपूर्ण खोजों को लेकर आशान्वित हैं.

स्तूप के चारों तरफ़ सीढ़ियाँ हैं और यहीं पर बौद्ध अनुयायी पूजा करने आते हैं. यहां चूने की मूर्तियाँ, पूजा स्थल और प्राचीन वस्तुएं आसानी से देखी जा सकती हैं.

स्वप्निल बुद्ध की प्रतिमा

विशेषज्ञों का कहना है कि भीमाला स्तूप से मिली बुद्ध प्रतिमा कंजूर पत्थर की है और संभवत: इस क्षेत्र की सबसे प्राचीन बौद्ध प्रतिमाओं में से एक है.

तक्षशिला संग्रहालय के क्यूरेटर अब्दुल नासिर ने बीबीसी को बताया कि 'अफ़गानिस्तान में हेदा और पाकिस्तान में तक्षशिला पूरी दुनिया में गंधारा सभ्यता के अवशेषों के लिए प्रसिद्ध हैं.'

'गंधारा सभ्यता से जुड़ी कला पूरे विश्व में लोकप्रिय है. इस कला का उद्देश्य धर्म का प्रचार और पूजा था.'

वह कहते हैं कि 'यह कला घरों में नहीं, बल्कि किसी स्तूप में भिक्षुओं द्वारा बनाई जाती थी. जिस तरह हम (मुस्लिम) मस्जिद बनाते हैं, इसी तरह ये मूर्तियाँ विशेष पूजा प्रथाओं को चिह्नित करती हैं.'

'इन मूर्तियों के कपड़े, गहने और शैलियाँ दुनिया भर में लगभग एक जैसे नज़र आते हैं.'

भीमाला स्तूप से बरामद होने वाली मूर्तियों के बारे में उन्होंने बताया कि 'स्वप्निल बुद्ध की मूर्ति की ख़ास बात यह है कि गौतम बुद्ध के दुनिया से प्रस्थान करने को दर्शाता है.'

धार्मिक पर्यटन के लिए धार्मिक सद्भाव ज़रूरी

स्तूप पर होने वाले में कार्यक्रम के आयोजकों में शामिल सदफ़ रज़ा ने बताया कि भिक्षु कोरिया से यहाँ ये देखने आए हैं कि पाकिस्तान में गंधारा सभ्यता के संदर्भ में पाकिस्तान सरकार के साथ मिलकर क्या कुछ किया जा सकता है.

'अगर हम इन जगहों को उनके लिए खोल देंगे और उसकी बेहतरी के लिए काम करेंगे तो न सिर्फ़ हमारे देश में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि उन्हें उनके सुकून की जगह मिल जाएगी.'

यह पूजा अनोखी इसलिए भी थी क्योंकि इसका उद्देश्य इस इलाक़े में अमन को बढ़ावा देना था.

भिक्षु डॉ. सिनम ने समारोह के दौरान कश्मीर मुद्दे पर भी चिंता व्यक्त की.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने यह ख़्वाहिश ज़ाहिर की कि वह इस इलाक़े में अमन और सलामती देखना चाहते हैं ताकि धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा मिले.

उन्होंने कहा, 'हम सब एक हैं. हमारे लिए पाकिस्तान हमारे देश जैसा है. आप चाहे बौद्ध मत के मानने वाले हों या इस्लाम को माननते हों, हम सब एक हैं.'

उन्होंने कहा, 'हम एक-दूसरे से नफ़रत करें या एक-दूसरे को तबाह करना चाहें तो ख़ुदा यह नहीं चाहता. हम ख़ुदा के हुक्म की नाफ़रमानी कर रहे हैं.'

'मैं इस इलाक़े में अमन लाना चाहता हूँ क्योंकि हम सब एक जैसे हैं.'

इस विशेष अनुष्ठान के दौरान भिक्षु डॉ. सिनम ने यहाँ के पूजास्थलों और मठों में दूध और फलों का चढ़ावा चढ़ाया.

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