मध्यपूर्व में ईरान ऐसे बढ़ा रहा है अपना प्रभुत्व

  • 11 नवंबर 2019
ईरान, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption माना जाता है कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स में डेढ़ लाख से अधिक जवान हैं. 22 सितंबर 2018 की ये तस्वीर राजधानी तेहरान में हुए परेड की है.

लंदन में मौजूद इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फ़ोर स्ट्रैटिजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) ने अपने एक अध्ययन में कहा कि मध्यपूर्व के पूरे इलाक़े में अपना प्रभुत्व बढ़ाने की रणनीतिक जंग में ईरान सऊदी अरब समेत अपने अन्य प्रतिद्वंदियों से आगे बढ़ रहा है.

इस अधययन के अनुसार इस इलाक़े में मौजूद ईरान के प्रतिद्वंदी देश पश्चिम में हथियार ख़रीदने में करोड़ों डॉलर ख़र्च कर रहे हैं, और अधिकतर हथियार वो ब्रिटेन से ख़रीद रहे हैं.

वहीं कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा ईरान इससे कहीं कम क़ीमत में सफलतापूर्वक ख़ुद को रणनीतिक तौर पर मध्यपूर्व में बेहद अहम साबित कर रहा है.

सीरिया, लेबनान, इराक़ और यमन जैसे देशों से जुड़े अहम मुद्दों पर वो दूसरों पर प्रभाव डाल सकने वाली स्थिति में है.

'संतुलन बनाए रखा'

दरअसल ईरान चुपचाप मध्यपूर्व में एक सरकार-विरोधी गुटों का नेटवर्क तैयार करने का कामयाब हुआ है. हालांकि ये नेटवक नया नहीं है लेकिन इसे आजकल हम 'प्रॉक्सी मिलिशिया' (यानी छद्म युद्ध करने वाले विद्रोही गुट) के नाम से जानते हैं.

1979 में ईरान में आयतोल्लाह रूहोल्लाह ख़ोमैनी के आने के बाद से ईरान का इस्लामिक गणतंत्र लेबनान के हिज़बुल्लाह की क्रांतिकारी विचारधारा और इस विद्रोही गुट की ताक़त को लेबनान की सरहदों से बाहर लाने की कोशिश कर रहा है.

आईआईएसएस ने अपनी 217 पन्ने की इस रिपोर्ट "ईरान्स नेटवर्क्स ऑफ़ इंफ्लूएंस इन द मिडल ईस्ट" में इस इलाक़े में ईरान के बढ़ते प्रभुत्व और अभियान के बारे में अभूतपूर्व जानकारी दी है.

इस रिपोर्ट के अनुसार, "ईरान के इस्लामिक गणतंत्र ने मध्यपूर्व में मौजूद निर्णायक ताक़तों को अपनी ओर झुका लिया है."

रिपोर्ट लिखने वाले कहते हैं, "ईरान ने इसके लिए अपने अभियान में पारंपरिक ताक़तों को पछाड़ा है और इसके लिए विद्रोही ताक़तों का इस्तेमाल किया है."

इसमें एक प्रमुख घटक है कुड्स फोर्स जो, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की एक शाखा है जो देश के बाहर के अभियानों को अंजाम देती है.

कुड्स सेना और इसके प्रमुख मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी सीधे तौर पर देश के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली ख़ामेनेई के प्रति जवाबदेह होते हैं. ये सेना ईरान के पारंपरिक सैन्य ढांचे से अलग है और इस कारण एक तरह की स्वतंत्र शाखा बन गई है.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption कुड्स सेना के प्रमुख मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी

साल 2003 में अमरीका के नेतृत्व में हुए सैन्य हमलों में इराक़ में सद्दाम हुसैन की सत्ता ख़त्म हो गई. इसके बाद से मध्यपूर्व में कुड्स सेना ने अपने अभियान तेज़ किए. ईरान का समर्थन करने वाले दूसरे देशों के सरकार विरोधी गुटों को कुड्स ने हथियार, पैसे और ट्रेनिंग देनी शुरू की.

साथ ही इसने युद्ध के ग़ैर पारंपरिक तरीक़ों को भी अपनाना शुरु किया जिसका नतीजा ये हुआ कि पारंपरिक हथियारों पर निर्भर रहने वाले अपने विरोधियों पर ईरान को बढ़त मिली. इन तकनीकों में स्वार्म तकनीक (बड़ी सैन्य टुकड़ी के साथ अलग-अलग ठिकानों से लड़ना), ड्रोन का इस्तेमाल और साइबर हमले महत्वपूर्ण हैं.

इसी साल अप्रैल में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान रिवोल्यूशनरी गार्ड्स समेत कुड्स फोर्स को "विदेशी आतंकवादी संगठन" क़रार दिया था. ये पहली बार था जब अमरीका ने किसी दूसरी सरकार से जुड़े एक संगठन को चरमपंथी बताया था.

अमरीका के इस फ़ैसले पर ईरान ने इशारों इशारों में ये कहते हुए प्रतिक्रिया दी कि खाड़ी क्षेत्र में "अमरीकी सेना ख़ुद आतंकवादी गुट से कम नहीं है."

साल 2001 से लेकर 2006 के बीच में ब्रिटेन के विदेश मंत्री रहे जैक स्ट्रॉ ने कई बार ईरान का दौरा किया है. वो मानते हैं कि जनरल क़ासिम सुलेमानी की भूमिका महज़ एक सैन्य कमांडर से कहीं अधिक है.

वो कहते हैं, "सेना की ताक़त के साथ सुलेमानी मित्र देशों के लिए ईरान की विदेश नीति चला रहे हैं."

आईआईएसएस की रिपोर्ट के बारे में लंदन में मौजूद ईरानी दूतावास के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा, "अगर इस रिपोर्ट में ये कहा गया है कि मध्यपूर्व में ईरान की भूमिका का सम्मान होना चाहिए, तो हम इसका स्वागत करते हैं."

"ईरान को नज़रअंदाज़ करने की नीति काम नहीं कर पाई है. ईरान ने इसका विरोध किया है. अमरीका के आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद ईरान उससे होने वाले नुक़सान को क़ाबू करने में कामयाब रहा है. तो, हमें समझना होगा कि इरान एक ताक़तवर देश है और उसके कई देशों के साथ दोस्ताना संबंध हैं और वो कई क्षेत्रीय समझौतों में भी है."

हिज़्बुल्ला- 'युवा सहभागी'

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption बेरूट में हिज़्बुल्ला के समर्थक ऊरान के सर्वोच्च नेता आयतोल्ला अली ख़ामेनेई की तस्वीर के साथ. ये रैली इसी साल 10 सितंबर को हुई थी.

आईआईएसएस की रिपोर्ट में सीरिया और इराक़ से जुड़े ईरान के सप्लाई रूट्स के बारे में जानकारी दी गई है.

लेबनान में इस्लामी आंदोलन चलाने वाला शिया हिज़बुल्लाह एक राजनीतिक पार्टी भी है और एक सशस्त्र विद्रोही गुट है. रिपोर्ट के अनुसार "ईरान के सहयोगियों के बीच ये गुट महत्वपूर्ण स्थिति हासिल कर चुका है."

सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकारी सीरियाई सेना के साथ लड़ने और इराक़ी शिया विद्रोही गुटों की मदद करने में हिज़्बुल्लाह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

हालांकि ये रिपोर्ट हिज़बुल्लाह को "ईरान के लिए एक प्रॉक्सी की तुलना में एक विश्वसनीय युवा सहभागी और बड़ा भाई" बताती है, लेकिन ये रिपोर्ट ये भी कहती है कि ये गुट ईरान के साथ संबंध रखने वाले कई अरब मिलिशिया गुटों और राजनीतिक दलों के लिए एक केंद्रीय वार्ताकार की तरह बन गया है.

इराक़ और सीरिया में भी रखे कदम

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इराक़ पर अमरीकी नेतृत्व में हुए आक्रमण और सद्दाम हुसैन के शासन को उखाड़ फेंकने की घटना ने मध्यपूर्व के परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया. ईरान के लिए इसमें फायदा उठाने के लिए काफी कुछ था.

इस घटना से पहले खाड़ी के अरब देश सुन्नी अरब-शासन वाले इराक़ को ईरान के ख़िलाफ़ गोलबंदी के केंद्र में देख सकत थे.

लेकिन यहां सद्दाम हुसैन के पतन के बाद ईरान ने इराक़ के भीतर अपने धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को सफलतापूर्वक भुनाया. इराक़ में शिया अरब बहुमत है जिसका ईरान ने बखूबी लाभ उठाया.

ईरान ने पॉपुलर मोबिलाइज़ेशन यूनिट्स (पीएमयू) नाम के समूह को न केवल हथियार दिए बल्कि ट्रेनिंग भी दी. इस समूह ने इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ जंग में ईरान की मदद की लेकिन कई इराक़ी इसे ईरान के उपनिवेश के रूप में देखते हैं.

लेकिन ईरान के लिए रास्ता आसान रहा ऐसा नहीं है. इराक़ में हो रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन और हिंसा इस बात की ओर इशारा करती है कि यहां के युवा ईरान का समर्थन करने वाली सरकार से खुश नहीं हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, "पीएमयू को कभी देश में देशभक्त स्वयंसेवकों के एक समूह के रूप में देखा जाता था लेकिन ईरान से मिलने वाली मदद के कारण धीरे धीरे इसकी लोकप्रियता कम होने लगी है."

Image caption जैक स्ट्रॉ

जैक स्ट्रॉ मानते ​​हैं कि इराक़ के मामले में ईरान ने अपनी काबिलियत से अधिक अपने मुंह में भर लिया है.

वो कहते हैं, "इराक़ में जो हो रहा है वो ईरानियों के लिए बेहद गंभीर समस्या हो सकती है क्योंकि उसे वहां नियंत्रण खोने का ख़तरा है."

सीरियाई सरकार भी लंबे समय से एक ईरान की सहयोगी रही है. सीरिया के गृह युद्ध में, ईरानी सेना, हिज़्बुल्ला और दूसरे शिया गुटों ने रूसी सेना के साथ मिल कर राष्ट्रपति असद की काफी मदद की है और इस लड़ाई में विद्रोहियों को पीछे धकेलने में मदद की है.

आईआईएसएस की रिपोर्ट के अनुसार, "सीरियाई सरकार और सीरिया में अनौपचारिक सुरक्षा संरचनाओं को बनाने में ईरान बड़ी भूमिका निभारहा है और इस कारण वो इसराइल के लिए ख़तरा बनता जा रहा है."

खाड़ी में विद्रोहियों पर क़ाबू पाना

ईरान चाहेगा कि अमरीका इस क्षेत्र को छोड़ कर बाहर जाए और उसे यहां पर प्रमुख सैन्य शक्ति के रूप में रहने दे. लेकिन सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ऐसा कतई नहीं चाहेंगे.

साल 2011 में जब अरब स्प्रिंग में विरोध शुरू हुआ उस वक्त ईरान ने बहरीन में हो रहे विरोध का फायदा उठाने की कोशिश की. उसने देश की बहुसंख्यक शिया आबादी के बीच वैध विरोध का इस्तेमाल किया, लेकिन उसने हथियार बनाने में कुछ हिंसक समूहों की भी मदद की.

रिपोर्ट के अनुसार, "बहरीन, सऊदी अरब और कुवैत में विद्रोही गुटों को दी जाने वाली मदद का उद्देश्य था कि वहां की सरकारों को परेशान किया जाए और उन पर दवाब बनाया जाए और अमरीका के नज़दीक जाने का खामियाज़ा भुगतना पड़े."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इस रिपोर्ट के अनुसार इन समूहों से होने वाले ख़तरे को फिर भी काबू पाया जा सका था. लेकिन इसी साल सितंबर में सऊदी अरब की बड़ा तेल कंपनी क ठिकानों पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों ने ये बता दिया कि खाड़ी के देश किसी तरह के अचानक हुए हमले के प्रति कितने संवेदनशील हैं.

सऊदी अरब ने महंगी क़ीमत पर अमरीका से मिसाइल डिफेंस सिस्टम ख़रीदा था लेकिन ये सिस्टम अपेक्षाकृत कम तकनीकी हमले को रोकने में असमर्थ थे. इस हमले ने दुनिया की तेल सप्लाई को भी बुरी तरह प्रभावित किया.

सऊदी विदेश मंत्रालय का कहना था कि, "हमारे पास इसके पुख्ता सबूत हैं कि सऊदी के तेल ठिकानों पर सितंबर में हुए हमलों में ईरान द्वारा बनाई गई मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ था और इसे देश के उत्तर की तरफ़ से दाग़ा गया था."

लेकिन ईरान ने इन हमलों के पीछे अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

एक अन्य थिंक टैंक, यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (ईसीएफ़आर) का मानना है कि ईरान अपने फ़ायदे के लिए कुछ समूहों को मदद दे रहा है और इस तरह अपनी स्थिति मज़बूत बनाता जा रहा है.

इसका कहना है, "पारंपरिक सैन्य क्षमताओं के मामले में ईरान किसी भी तरह सऊदी अरब का मुक़ाबला नहीं कर सकता. जैसे कि उसने अपने हितों की रक्षा के लिए और बाहरी ख़तरों से ख़ुद को बचाने के लिए तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल किया है. लेकिन सऊदी अरब के मुक़ाबले ईरान ने सन्य बल के मामले में दूसरे समूहो का समर्थन कर ख़ुद को मज़बूत बनाया है."

यमन

इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption यमन

2014 के आख़िर में जब यमन में गृहयुद्ध शुरु हुआ, उस वक़्त वहां ईरान की हस्तक्षेप न के बराबर था.

लेकिन मार्च 2015 में हूती विद्रोहियों को उनके क़ब्ज़े वाले इलाक़ों से भगाने के लिए सऊदी अरब के हस्तक्षेप के बाद, ईरान ने इस इलाक़े में अपना समर्थन बढ़ाया.

आईआईएसएस की रिपोर्ट के अनुसार "कम ख़र्च में अपने प्रतिद्वंदी सऊदी अरब को पीछे धकेलने के लिए और रणनीतिक तौर पर अहम लाल सागर के बाब अल-मंदाब में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए आधुनिक हथियारों की साप्लाई की."

यमन के गृहयुद्ध में सऊदी अरब के करोड़ों डॉलर बर्बाद हुए और इस दौरान यमन की सीमा के नज़दीक से छोड़े गए क़रीब 200 मिसाइलें और ड्रोन का खामियाज़ा भी उसे उठाना पड़ा.

सऊदी विदेश मंत्रालय का कहना है, "ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के उल्लंघन करते हुए हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे चरमपंथी संगठनों को बैलिस्टिक मिसाइलें दी हैं."

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption 2015 में ईरान ने हूती विद्रोहियों को समर्थन देना बढ़ाया.

लेकिन सऊदी अरब को होने वाला नुक़सान ख़तरनाक था. वो यमन में युद्ध के कारण परेशान था और कमज़ोर हो गया था.

इस भयावह युद्ध में कोई एक पक्ष नहीं जीत पाया है. सऊदी अरब और उसके सहयोगी, संयुक्त अरब अमीरात दोनों का मानना ​​है कि यमन में उनकी प्रमुख उपलब्धि ईरान को इस इलाक़े में अपने पैर जमाने से रोकना रहा है.

कम ख़र्च में बड़ी कामयाबी

इस रिपोर्ट के अनुसार जब तक अमरीका में राष्ट्रपति की कुर्सी पर ट्रंप क़ाबिज़ हैं ईरान अपना रास्ता नहीं बदलेगा और वो लगातार अपना प्रभुत्व बढ़ाने के मौक़ों की तलाश में रहेगा.

ईरान को लगता है कि अमरीकी राष्ट्रपति के लगाए प्रतिबंध एक तरफ़ उसे नए परमाणु समझौते के लिए बातचीत करने पर विवश करने और दूसरी तरफ़ देश के भीतर विरोधी गुटों को बढ़ावा देने की कोशिश है.

टेक्सास में मौजूद जियो-पॉलिटिकल थिंक टैंक, स्ट्रैटफॉर का कहना है, "ईरान अमरीका के लगाए कड़े प्रतिबंधों का विरोध करना जारी रखेगा. आने वले दो महीनों में वो सऊदी अरब, अमरीका और मधयपूर्व में अमरीका के सहयोगियों पर हमले कर सकता है."

ये बात सच है कि आज ईरान अपने सहयोगियों के साथ एक बड़ा नेटवर्क तो है ही बल्कि भौगोलिक तौर पर इसका विस्तार भी काफ़ी बड़ा है. और इस कारण अगर वो चाहे तो उसके पास ऐसे हमले करने की गुंजाइशें काफी अधिक हैं जिनमें वो अपनी ज़िम्मेदारी से इनकार कर सके.

ये हमले मिसाइल और ड्रोन हमले हो सकते हैं या फिर इराक़ में अमरीकी सेना पर हमले हो सकते हैं या फिर ये होर्मूज़ जलडमरूमध्य से हो जा रहे जहाज़ों का रास्ते को बाधित करना भी हो सकता है. या फिर ये जटिल साइबर हमले भी हो सकते हैं जो इसराइल या खाड़ी से सटे अरब देशों पर किए जाएं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption हाल के वक्त में ईरान अपनी परमाणु ताकत बढ़ाने पर अधिक ध्यान दे रहा है और उसने परमाणु संवर्धन के लिए नए सेंट्रीफ्यूज बनाए हैं.

मूल बात ये है कि बीते 40 सालों से आर्थिक और ट्रेनिंग दे कर अपने सहयोगियों को लगातार मज़बूत बनाने के कारण ईरान पहले से कहीं अधिक ताक़तवर स्थिति में है.

ये माना जा सकता है कि उस पर लगे प्रतिबंधों के कारण उसे नुक़सान हुआ है लेकिन आर्थिक तौर पर ईरान एक भयानक स्तर पर है. लेकिन कुड्स फोर्स ने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर एक ऐसे सिस्टम तैयार किया है जिसमें लागत कम है लेकिन ज़रूरत पड़ने पर उसका असर बड़ा होगा.

आईआईएसएस की रिपोर्ट के अनुसार इस नेटवर्क के कारण रणनीतिक तौर पर ईरान एक ऐसी बड़ी ताक़त बन चुका है जिसके बारे में फिर से एक बार विचार करने की ज़रूरत है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार