गोटाभाया राजपक्षे होंगे श्रीलंका के अगले राष्ट्रपति, भारत के साथ संबंधों पर कैसा होगा असर

  • 17 नवंबर 2019
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गोटाभाया राजपक्षे श्रीलंका के अगले राष्ट्रपति होंगे.

उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी सजित प्रेमदासा पर निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है, हालांकि अभी आधिकारिक नतीजों की घोषणा नहीं हुई हैं.

चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक अब तक 80 फ़ीसदी मतों की गिनती हुई है जिसमें राजपक्षे को 48 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों का समर्थन मिला है.

इस चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने इस बार चुनाव में नहीं खड़े होने का फ़ैसला किया है. उनकी श्रीलंका फ्रीडम पार्टी इस चुनाव में राजपक्षे का समर्थन कर रही थी.

गोटाभाया राजपक्षे श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति और मौजूदा विपक्ष के नेता महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई है.

जानकार आशंका जताते हैं कि अगर राजपक्षे चुने जाने के बाद देश में धार्मिक और जातीय तनाव उभर सकता है.

भारतीय रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी ने दैनिक मिंट में लिखा, "फ़ैसले से पहले एक कथित युद्ध अपराध अभियुक्त के राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं को लेकर निश्चित ही अल्पसंख्यकों, मीडिया और नागरिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वालों के बीच भय हैं."

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कुछ लोगों को चिंता है कि राजपक्षे राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में धार्मिक और जातीय रूप से अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल देंगे. तमिल विद्रोहियों से लड़न में उनकी भागीदारी और मुसलमान विरोधी विचारों के लिए जाने जाने वाले कट्टर बौद्ध समूह बोदू बाला सीन के साथ उनका दोस्ताना रिश्ता इस अवधारणा को आधार प्रदान करते हैं.

राजपक्षे का चुनावी धोषणापत्र भ्रष्टाचार के ख़ात्मे, अर्थव्यवस्था की मजबूती और निष्पक्ष सोसाइटी बनाने का वादा भी करता है लेकिन उनकी मजबूत छवि अभी भी मतदाताओं के बीच सबसे बड़ा आकर्षण साबित हो सकता है.

कुछ जानकारों का मानना है कि राजपक्षे की चुनावी सफलता चीन के लिए एक बड़ी जीत होगी.

महिंदा राजपक्षे के सत्ता में रहते हुए यहां 10 वर्षों के दौरान चीन ने अपने निवेश में लगातार बढोतरी की है. राजपक्षे 2015 तक यहां सत्ता में रहे.

भारत की झुंझलाहट के बीच महिंदा राजपक्षे ने चीन से अरबों डॉलर का उधार लिया और अपने मुख्य बंदरगाह के द्वार चीनी पनडुब्बियों के लिए खोल दिए. उन्होंने चीन के साथ मिलकर एक विशाल बंदरगाह का निर्माण किया, इसकी वजह से चीन के कर्ज़ तले दबने की आशंका भी जाहिर की गई.

भारत के सामरिक मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी का मानना है कि युवा राजपक्षे के राष्ट्रपति बनने के बाद कमोबेश यही रुझाना जारी रहेगा.

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