भारत, पाकिस्तान ने गणतंत्र को भी अपने जैसा बना लिया है: वुसअत का ब्लॉग

  • 3 दिसंबर 2019
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कोई भी राजनीतिक गुट भले कहीं का भी हो, कितना भी पुराना या नया हो, धार्मिक हो या सेक्यूलर, बायां हो या दायां, उत्तरी हो कि दक्षिणी - वो तब तक आदर्श रहता है जब तक सत्ता का ख़ून उसके मुंह को न लगे.

सत्ता के अपने नियम और उसूल होते हैं.

सत्ता दसअसल रोम की तरह होती है और "डू इन रोम ऐज़ रोमन्स डू" यानी रोम में वही करो जो हर रोमवासी करता है.

जब यही राजनीतिक गुट सत्ता से बाहर कर दिया जाता है तो फ़ौरन आदर्श, उसूल और नज़रिए कि बुक्कल फिर से मार लेता है.

इसे आप मौक़ापरस्ती कह लें, तोता-चश्मी या कलाबाज़ी कहलें या नज़रिए से बेवफ़ाई कह लें- मगर राजनीति यही थी, है और रहेगी.

पसंद नहीं तो जंगल में कुटिया बना लें, भले साधु संत बन जाएं, लेकिन राजनीति यही रहेगी.

अब यही देखिए कि अंग्रेज़ साम्राज्य के ख़िलाफ़ कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्टों ने अपने-अपने हिसाब से आज़ादी के लिए क्या-क्या संघर्ष नहीं किया, ताकि भारतीय उप महाद्वीप के लोग अपनी क़िस्मत ख़ुद तय कर सकें.

फिर हुआ क्या?

आज भी हिंदुस्तान और पाकिस्तान में जिन क़ानूनों के ज़रिए लोगों की आज़ादी छीनी जाती है या उन पर रोक लगाई जाती है, वो सब के सब अंग्रेज़ों से विरासत में मिले थे.

ब्रिटेन ने तो उन्हें कब का त्याग दिया पर हमारा शासन इन क़ानूनों को अम्मा के दहेज में आए लोटे की तरह सीने से लगाए बैठा है.

पहले गोरा इन क़ानूनों के ज़रिए कालों को दबाता था. आज काला इसी गोरे क़ानून के ज़रिए दूसरे काले को दबा रहा है.

ऐसा नहीं है कि आज़ादी के बाद बदलाव नहीं आया.

ब्रिटिश इंडियन पीनल कोड को इंडियन या पाकिस्तानी पीनल कोड पुकारा जाने लगा. क्या ये कम बदलाव है?

हमने कितने अरमानों से लोकतंत्र का तसव्वुर अंग्रेज़ों से नक़ल किया. लेकिन इस लोकतंत्र को भी ख़ालिस नहीं रहने दिया. उसे अपने जैसा बना लिया.

यानी सत्ता हासिल करने या बने रहने के लिए ज़रूरत होने पर गधे को भी बाप बना लो, और ज़रूरत हो तो बाप को भी गधा बना दो.

जनता का बस एक ही काम रह गया है, जब कहा जाए वोट डालो, तो वोट डाल दो.

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इसके बाद भारत में कम्युनिस्ट और जनसंघ एक दूसरे से इत्तेहाद कर लें या मायावती और बीजेपी में गहरी छने या फिर बीजेपी के मुक़ाबले में एसपी-बीएसपी गठबंधन हो जाए या मोदी के ख़िलाफ़ शिव सेना और कांग्रेस मिल के महाराष्ट्र में हूकूमत बनाएं.

या फिर पाकिस्तान बनने की विरोधी और औरत की हुक्मरानी को ग़ैर इस्लामी बताने वाली जमात-ए-इस्लामी, जनरल अय्यूब ख़ान के ख़िलाफ़ जिन्ना साहब की बहन मोहतरमा फ़ातिमा जिन्ना का साथ दे और ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो फ़ातिमा जिन्ना के ख़िलाफ़ अय्यूब ख़ान का चुनाव अभियान चलाएं.

और फिर यही भुट्टो अय्यूब ख़ान के ख़िलाफ़ हो जाएं और वही जमात-ए-इस्लामी जनरल याह्या ख़ान के फ़ौजी शासन की समर्थक हो जाए.

और इमरान ख़ान सत्ता में आने से पहले हर सेनापति की मुलाज़िमत में एक्सटेंशन के ख़िलाफ़ हों और सत्ता में आ जाएं तो जनरल बाजवा की मुलाज़िमत में एक्सटेंशन के लिए सारे घोड़े खोल दें.

पर क्या करें? राजनीति का कोठा ऐसे ही चलता है.

भले पूरब हो कि पश्चिम, इंडिया हो कि पाकिस्तान या पापुआ न्यू गिनी.

सब गंदा है, पर धंधा है ये.

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