परवेज़ मुशर्रफ़ अदालत से क्यों भागे-भागे फिर रहे हैं

  • 4 दिसंबर 2019
परवेज़ मुशर्रफ़, Pervez Musharraf, पाकिस्तान, Pakistan

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ का कहना है कि संविधान की अवहेलना और गंभीर देशद्रोह के मामले में उनका बयान दर्ज करने के लिए आयोग उनके पास आए और यह भी देख ले कि उनका स्वास्थ्य कैसा है.

दुबई के एक अस्पताल से जारी किए गए एक वीडियो बयान में उन्होंने कहा कि उनकी हालत बहुत ख़राब है और उन्हें लगातार अस्पताल में भर्ती कराया जाता रहा है.

अपने ख़राब स्वास्थ्य के संबंध में उन्होंने कहा कि मंगलवार की सुबह भी चक्कर आने के बाद बेहोशी की हालत में उन्हें अस्पताल लाया गया था.

संविधान की अवहेलना और गंभीर देशद्रोह के मुक़दमे पर उन्होंने कहा, "यह मामला मेरे विचार में पूरी तरह से निराधार है. देशद्रोह की बात छोड़ें, मैंने तो इस देश की बहुत सेवा की, युद्ध लड़े हैं और दस साल तक देश की सेवा की है."

ध्यान रहे कि उनके ख़िलाफ़ गंभीर देशद्रोह मामले की सुनवाई कर रही विशेष न्यायालय ने 28 नवंबर को परवेज़ मुशर्रफ़ को अपना बयान दर्ज करवाने के लिए पाँच दिसंबर की अंतिम समय सीमा देते हुए कहा था कि उसके बाद न्यायालय कोई आवेदन नहीं लेगी.

परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा कि संविधान की अवहेलना के मामले में उनकी सुनवाई नहीं हो रही है.

उन्होंने कहा, "मेरे वकील सलमान सफ़दर तक को न्यायालय नहीं सुन रही है. मेरे विचार में यह बहुत ज़्यादती हो रही है और मेरे साथ न्याय नहीं किया जा रहा."

उनका कहना था कि आयोग बयान लेने उनके पास आए और साथ ही उनके स्वास्थ्य की स्थिति भी देख ले और फिर निर्णय किया जाए.

उन्होंने माँग की कि इस आयोग को न्यायालय में सुना जाए और उनके वकील को भी सुना जाए. उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उनके साथ न्याय किया जाएगा.

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कोर्ट ने क्या दिया था आदेश?

इससे पहले 28 नवंबर को विशेष न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश वक़ार सेठ ने परवेज़ मुशर्रफ़ के वकील से कहा था कि न्यायालय ने अभियुक्त को एक और मौक़ा दिया है और परवेज़ मुशर्रफ़ अगली सुनवाई से पहले जब चाहें आकर बयान दर्ज करा सकते हैं.

संवाददाता आज़म ख़ान के अनुसार इसके साथ ही न्यायालय ने अभियोजन पक्ष को पूरी तैयारी के साथ आने के लिए निर्देश दिया और यह स्पष्ट किया कि 5 दिसंबर से इस मामले की सुनवाई प्रतिदिन होगी.

इस्लामाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर टिप्पणी करते हुए परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ राजद्रोह मामले की सुनवाई करने वाली विशेष न्यायालय के एक सदस्य का कहना था कि हम केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं हाई कोर्ट के आदेशों का नहीं.

ध्यान रहे कि विशेष न्यायालय को इस विषय में 28 नवंबर (गुरुवार) को निर्णय देना था, लेकिन 27 नवंबर को इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की अर्ज़ी को स्वीकार करते हुए विशेष न्यायालय को ऐसा करने से रोक दिया था.

इस्लामाबाद हाई कोर्ट के निर्णय के आलोक में विशेष न्यायालय ने केंद्र सरकार को 5 दिसंबर तक अभियोजन टीम नियुक्त करने का समय दिया और पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को 5 दिसंबर तक अपना बयान दर्ज करने का निर्देश दिया.

इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने क्या आदेश दिया था?

इससे पहले इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने विशेष न्यायालय से कहा था कि वह अभी निर्णय नहीं दे, पहले निष्पक्ष रूप से दोनों पक्षों को सुने उसके बाद ही कोई निर्णय दे.

न्यायालय ने विशेष न्यायालय से यह भी कहा है कि वह परवेज़ मुशर्रफ़ के वकील बैरिस्टर सलमान सफ़दर की दलील भी सुने.

विशेष न्यायालय ने परवेज़ मुशर्रफ़ के न्यायालय से लगातार अनुपस्थित रहने और बयान दर्ज न करवाने के कारण उन्हें लापता अभियुक्त घोषित कर किया था और उनके वकील को न्यायालय में अपने पक्षकार का पक्ष रखने से रोक दिया था.

इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने भी सरकार को गंभीर राजद्रोह मामले में 5 दिसंबर तक अभियोजक नियुक्त करने का निर्देश दिया है, जबकि विशेष न्यायालय से कहा है कि वह मामले की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी करे.

इससे पहले इमरान ख़ान की सरकार ने 24 अक्तूबर को पूर्व सैनिक राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ संविधान की अवहेलना का मुक़दमा चलाने वाली अभियोजन टीम को भंग कर दिया था.

बैरिस्टर सलमान सफ़दर ने न्यायालय को बताया था कि पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ इस समय गंभीर रूप से बीमार हैं और विशेष न्यायालय द्वारा दिए गए विकल्प के बावजूद मानसिक रूप से इस स्थिति में नहीं हैं कि वह स्काइप पर अपने बयान दर्ज करा सकें.

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निर्णय के बाद बैरिस्टर सलमान सफ़दर ने मीडिया से कहा कि क़ानून कहता है कि अगर कोई वकील न्यायालय में मौजूद नहीं हो तो केंद्र सरकार या न्यायालय एक वकील की नियुक्ति करती है. ऐसे वकील की नियुक्ति तब की जाती है जब अभियुक्त को वित्तीय कठिनाई होती है.

उन्होंने न्यायालय से कहा कि परवेज़ मुशर्रफ़ स्वस्थ होने के बाद ही ट्रायल का हिस्सा हो सकते हैं, अभी वह इस स्थिति में नहीं हैं.

'न्यायपालिका नहीं सरकार के लिए अपमान की स्थिति'

अतिरिक्त अटॉर्नी जनरल इलियास भट्टी ने न्यायालय से कहा कि सरकार चाहती है कि अपनी भूल सुधार ली जाए ताकि भविष्य में न्यायपालिका को अपमानित न होना पड़े, जिस पर न्यायमूर्ति आमिर फ़ारूक़ ने कहा कि यह न्यायपालिका के लिए नहीं केंद्र सरकार के लिए अपमान की बात है.

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परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ देशद्रोह मामले की पृष्ठभूमि

सन 2013 के चुनावों में जीत के बाद पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) सरकार में आई. सरकार आने के बाद पूर्व सैनिक राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ संविधान की अवहेलना का मुक़दमा दायर किया गया था.

पूर्व सैनिक राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ एक गंभीर देशद्रोह मामले की सुनवाई करने वाली विशेष न्यायालय के चार प्रमुख बदल जा चुके हैं, लेकिन मामला अपने तार्किक अंत तक नहीं पहुँचा है.

अभियुक्त परवेज़ मुशर्रफ़ केवल एक बार विशेष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुए हैं जब उन पर आरोप लगाया गया था. उसके बाद से वो आज तक कोर्ट में पेश नहीं हुए हैं.

इस बीच मार्च 2016 में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर मुशर्रफ़ विदेश चले गए. तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी मुस्लिम लीग (नून) ने एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट से उनका नाम हटा लिया था जिसके बाद उन्हें देश छोड़कर जाने की अनुमति दे दी गई थी.

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परवेज़ मुशर्रफ़ मानते हैं, मौजूदा तनाव के लिए मोदी, राजनेता, आर्मी चीफ़ ज़िम्मेदार हैं.

परवेज़ मुशर्रफ़ को अभियुक्त बनाया गया

इस्लामाबाद की विशेष न्यायालय ने 31 मार्च, 2014 को देशद्रोह के एक मामले में पाकिस्तान के पूर्व सैनिक राष्ट्रपति जनरल (रिटायर्ड) परवेज़ मुशर्रफ़ को अभियुक्त बनाया था.

ध्यान रहे कि वह पाकिस्तान के इतिहास में वे पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके विरुद्ध संविधान की अवहेलना का मुक़दमा चल रहा है.

पूर्व प्रधानमंत्री, चीफ़ जस्टिस देशद्रोह मामले में सह-अभियुक्त

पूर्व सैनिक राष्ट्रपति के विरुद्ध गंभीर देशद्रोह मामले की सुनवाई कर रही विशेष न्यायालय ने मुशर्रफ़ की ओर से 3 नवंबर, 2007 को देश में आपातकाल लगाने के निर्णयों में शामिल रहे तत्कालीन केंद्र सरकार, सेना के उच्च अधिकारियों तथा सिविल प्रशासन को भी सहअभियुक्त बनाए जाए के अनुरोध को आंशिक रूप से स्वीकार किया.

21 नवंबर, 2014 को विशेष न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश फ़ैसल अरब ने अपने निर्णय में तत्कालीन प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़, क़ानून मंत्री ज़ाहिद हामिद और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस अब्दुल हमीद डोगर को भी मुक़दमे में शामिल करने का आदेश दिया.

तीन सदस्यीय विशेष न्यायालय के एक सदस्य न्यायमूर्ति यावर अली ने निर्णय का विरोध करते हुए अपनी तरफ़ से नोट लिखा कि अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है जिससे पता चलता हो कि आपातकाल लगाने में शौकत अज़ीज़, अब्दुल हमीद डोगर और ज़ाहिद हामिद की कोई भूमिका थी.

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मुशर्रफ़ के अधीनस्थ लोगों के ख़िलाफ़ जाँच

सितंबर 2015 में पाकिस्तान सरकार की ओर से यह कहा गया कि वह परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ संविधान की अवहेलना के मामले में उनके अधीनस्थों के ख़िलाफ़ भी जाँच करने के लिए तैयार है.

मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ संविधान की अवहेलना के मामले की सुनवाई कर रही विशेष न्यायालय ने 3 नवंबर, 2007 को देश में आपातकाल लागू करने में मदद करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़, क़ानून मंत्री ज़ाहिद हामिद और तब के चीफ़ जस्टिस अब्दुल हमीद डोगर के ख़िलाफ़ कार्रवाई का आदेश दिया था.

मुशर्रफ़ का विदेश जाना

18 मार्च, 2016 को पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ़ इलाज के लिए दुबई चले गए. तब उन्होंने कहा था कि वह कमर की दर्द से पीड़ित हैं और उसके इलाज के लिए जा रहे हैं और जल्द ही पाकिस्तान लौटेंगे और अपने ख़िलाफ़ चल रहे मामलों का सामना करेंगे.

मार्च 2016 में विशेष न्यायालय ने केंद्र सरकार से लिखित स्पष्टीकरण माँगा कि न्यायालय से पूछे बिना अभियुक्त को विदेश जाने की अनुमति क्यों दी गई?

न्यायालय ने गृह सचिव को आदेश देते हुए कहा था के वे इस संदर्भ में लिखित जवाब प्रस्तुत करें. हालाँकि तत्कालीन सरकारी वकील अकरम शेख़ ने न्यायालय को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अभियुक्त का नाम ईसीएल से हटा दिया गया था.

याद रहे कि गंभीर देशद्रोह के आरोप के कारण पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ का नाम 5 अप्रैल, 2013 को एसीएल पर डाल दिया गया था.

स्काइप पर मुशर्रफ़ के बयान को रिकॉर्ड करने का आदेश

इसी साल 7 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ चल रहे संविधान की अवहेलना के मामले में अभियुक्त का बयान वीडियो कॉलिंग के जरिए रिकॉर्ड करने का आदेश दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष न्यायालय में विचाराधीन इस मुक़दमे को तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाने में होने वाली देरी और अभियुक्त की देश वापसी के लिए सरकारी प्रयासों के विषय में जानने के लिए अटॉर्नी जनरल से रिपोर्ट माँगी.

देश वापसी के लिए परवेज़ मुशर्रफ़ की शर्त

इसी साल 11 जून को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नादरा (NADRA) के अधिकारियों को आदेश दिया था कि वह पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ का पहचान पत्र और पासपोर्ट बहाल कर दें.

हालाँकि पूर्व सैन्य राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से उनके ख़िलाफ़ दर्ज होने वाले सभी मुक़दमों में उन्हें ज़मानत देने की शर्त पर देश वापस लौटने की सहमति जताई थी.

लेकिन मुशर्रफ़ लगातार अनुपस्थित रहे

इसी साल 12 जून को विशेष न्यायालय ने पूर्व सैनिक राष्ट्रपति के बचाव के अधिकार को समाप्त करते हुए उनके वकील से कहा था कि वह अब उनका बचाव नहीं कर सकते.

न्यायालय ने मुशर्रफ़ के लगातार अनुपस्थित रहने के कारण उनके बचाव के अधिकार को ख़ारिज कर दिया. मुशर्रफ़ लगभग तीन साल से दुबई में रह रहे हैं.

मुक़दमे को मुशर्रफ़ तक सीमित रखने का आदेश

पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ गंभीर देशद्रोह मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस आसिफ़ सईद खोसा ने केंद्र सरकार की शिकायत के आधार पर इस मामले के लिए गठित विशेष न्यायालय को यह आदेश दिया कि इस मुक़दमे को केवल पूर्व सेना प्रमुख तक ही सीमित रखा जाए.

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Image caption पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री डॉ. फ़रोग़ नसीम और अटॉर्नी जनरल अनवर मंसूर ख़ान देशद्रोह के मामले में पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के वकील रहे हैं

पूरी अभियोजन टीम को भंग कर दिया गया

पिछले महीने पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ गंभीर राजद्रोह मामले में केंद्र सरकार ने पूरी अभियोजन टीम को भंग कर दिया, लेकिन विशेष न्यायालय ने केंद्र के इस क़दम पर स्पष्टीकरण माँगा था.

यहां यह बताना ज़रूरी है कि पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री डॉ. फ़रोग़ नसीम और अटॉर्नी जनरल अनवर मंसूर ख़ान गंभीर देशद्रोह के मामले में पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के वकील भी रहे हैं.

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