क्या भारत के रिश्ते पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ रहे हैं: दुनिया जहान

  • 20 दिसंबर 2019
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2014 में जब नरेंद्र दामोदरदास मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने, उनके शपथ ग्रहण समारोह में भारत के सभी पड़ोसी देशों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया. संदेश स्पष्ट था भारत अच्छा पड़ोसी बनना चाहता है.

उसी साल अगस्त में लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने कहा कि वो पड़ोसी देशों के साथ, ख़ास कर सार्क देशों के साथ मिलजुल कर आगे बढ़ना चाहते हैं.

उन्होंने कहा, "क्यों न हम सार्क देशों के सभी साथी देश मिल कर कर ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने की योजना बनाएं, सार्क देश मिल कर दुनिया में अपनी अहमियत खड़ी कर सकते हैं. आवश्यकता है कि हम मिल जुल कर चलें."

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क आठ देशों अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका का संगठन है.

8 दिसंबर 1985 को सार्क इस इरादे के साथ अस्तित्व में आया था कि इसमें शामिल देश आपसी सहयोग से शांति और प्रगति की कोशिश करेंगे.

लेकिन भारत में मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के बाद से कई सार्क देशों के साथ भारत के संबंध बिग़ड़ते चले गए हैं. पहले पाकिस्तान, नेपाल और अब बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्तों की गर्माहट कम हो रही है.

नेपाल में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सीके लाल कहते हैं कि भारत अकेला ऐसा देश है जिसकी सीमाएं लगभग सभी सार्क देशों से जुड़ी हैं. इस कारण भारत के बिना सार्क की अवधारणा लगभग असंभव है लेकिन वो कहते हैं कि पड़ोसी भारत से मित्रतापूर्ण रुख़ की अपेक्षा रखते हैं.

वो कहते हैं, "समस्या खड़ी तब हो जाती है जब भारत का सहयोग ये सारे राष्ट्र चाहते हैं, लेकिन दबदबा स्वीकार करना नहीं चाहते हैं. भारत थोड़ा नम्र हो कर रहता तो संबंध अच्छे रहते. अभी की जो नई दिल्ली की सत्ता है उसमें बाक़ी और जो कुछ भी हो, नम्रता के मामले में हम बहुत ज़्यादा कुछ कह नहीं सकते."

"दूसरी समस्या सार्क के साथ ये है कि कुछ दिनों के लिए लगा था कि पाकिस्तान अलग-थलग सा हो गया है लेकिन जब तक भारत और पाकिस्तान के संबंधों में खटास कम नहीं होगी, तब तक सार्क कहीं जाता हुआ दिख नहीं रहा है."

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Image caption नेपाल के काठमांडू में आयोजित भारत विरोधी प्रदर्शन

नेपाल के साथ भारत के रिश्ते

नेपाल और भारत 1750 किलोमीटर से अधिक की सीमा साझा करते हैं. कहा जाता है कि दोनों के बीच न केवल रोज़ी-रोटी का बल्कि रोटी-बेटी का संबंध रहा है.

लेकिन 2015 में दोनों पड़ोसियों के बीच रिश्तों में तनाव आना शुरू हुआ. मामला जुड़ा था नेपाल के नए संविधान से.

नेपाल और अफ़ग़ानिस्तान में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद कहते हैं कि नेपाल में जब-जब राजनीतिक अस्थिरता रही है भारत को उसके लिए दोष दिया गया.

2015 में जब वहां नया संविधान बनने वाला था, उस वक्त तराई के इलाके में रहने वाले मधेशी इसका विरोध कर रहे थे. उनका दावा था कि सरकार में उनकी भागीदारी नहीं है. विरोध बढ़ा और नेपाल ने भारत पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया.

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Image caption नेपाल के दक्षिणी तराई में चल रहा मधेसी आंदोलन करीब तीन महीने तक चला. ये आंदोलन नए संविधान में कथित पक्षपात के ख़िलाफ़ चलाया गया था. इस दौरान सीमा पर अघोषित नाकेबंदी के कारण देश के हर हिस्से में खाने-पीने की चीज़ों का अभाव हो गया था.

राकेश सूद बताते हैं, "2015 में आख़िरकार जब नेपाल ने नए संविधान को पारित करने की तारीख का ऐलान कर दिया. उस समय भारत ने विदेश सचिव को बहुत सार्वजनिक तौर पर नेपाल भेजा, ये संदेश देने के लिए कि आप ये मत कीजिए. किसी भी देश के साथ इस तरह करना मुझे लगता है कि एक बहुत ही ग़लत संदेश गया. इसके ऊपर हमें थोड़ा सोचना चाहिए था."

2015 में ही बीबीसी से बातचीत में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओला ने आपसी रिश्तों में खटास की बात स्वीकार की थी.

उन्होंने कहा था, "सारी दुनिया ने स्वागत किया लेकिन भारत ने स्वागत के बारे में कुछ नहीं बोला. भारत ने कहा, हां जानकारी मिली है. ये कुछ सहज नहीं लगता. इस पर ध्यान देना चाहिए भारत को. अ-समझदारी जहां पर है उसे हटाना चाहिए. इससे भारत और नेपाल के बीच जो संबंध हैं उसे बिगड़ने नहीं देना चाहिए. ये किसी के हित में नहीं है."

पाकिस्तान के साथ ऐसे बिगड़े रिश्ते

रही पाकिस्तान और भारत के संबंधों की बात तो 2015 दिसंबर में क़ाबुल से दिल्ली लौटते हुए अचानक प्रधानमंत्री मोदी लाहौर पहुँच गए.

खुद पहल करते हुए मोदी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मुलाक़ात करने पहुंचे तो माना गया कि उन्होंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, लेकिन भविष्य कुछ और ही था.

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Image caption 20 दिसंबर 2015 को मोदी का स्वागत करने पहुंचे पाक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़. उस वक्त मोदी के अचानक लाहौर दौरे पर पहुंचने का अधिकतर पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों ने स्वागत किया था, हालांकि कई जगह इसके पीछे की मंशा पर सवाल भी उठाए गए थे.

पाकिस्तान में भारतीय हाई कमीशन में सचिव रहे राकेश सूद बताते हैं वक्त के साथ साथ दोनों के बीच रिश्ते बिगड़ते चले गए.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध काफी जटिल हैं. अगर हम सोचें कि हम एक जन्मदिन पर जाकर या सरप्राइज़ विज़िट दे कर हम मुद्दों को सुलझा लेंगे तो वो नहीं होता है. अब वीज़ा पर भी दोनों तरफ से सख्ती है. आना जाना लोगों का कम हो गया है. सीमा के आर-पार जो व्यापार शुरू हुआ था वो रुक गया है."

"इस वक्त तो मैं ये कहूंगा कि हमारे जो हालात हैं हमने पाकिस्तान से कह दिया है- विदेश मंत्री ने कह दिया है, प्रधानमंत्री ने कह दिया है, कि साहब अगर हमें बात करनी है तो हम सिर्फ़ वो बात करेंगे कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के पास है, उसके अलावा हम पाकिस्तान से कोई बात नहीं करेंगे."

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Image caption पाक प्रधानमंत्री इमरान ख़ान

पहले पठानकोट, फिर उरी, पुलवामा और फिर बालाकोट को लेकर दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव रहा. और फिर इसी साल अगस्त में जम्मू कश्मीर को ख़ास दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के भारत सरकार के फ़ैसले को लेकर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में दस्तक दी.

संयुक्त राष्ट्र में पाक प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा "अगर परमाणु हथियारों से लैस दो पड़ोसी लड़ेंगे तो इसका असर पूरी दुनिय़ा पर होगा. मैं संयुक्त राष्ट्र के पास आया हूं क्योंकि आपके लिए ये परीक्षा की घड़ी है, कश्मीर के लोगों को उनकी पहचान आपने ही दी है."

और फिर रही सही कसर ज़ुबानी जंग ने पूरी कर दी. इसके जवाब में भारतीय पीएम ने कहा "अमेरिका में 9/11 हो या मुंबई में 26/11, उसके साजिशकर्ता कहां पाए जाते हैं?"

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महबूबा मुफ़्ती की बेटी ने कहा कि इमरान ख़ान के भाषण के बाद कश्मीर के लोगों को अच्छा लगा.

अफ़ग़ानिस्तान को किया नज़रअंदाज़

रही अफ़ग़ानिस्तान की बात तो भारत के साथ उसके क़रीबी रिश्ते रहे हैं और ये संबंध कूटनीतिक तौर पर भी अहम माने जाते हैं. भारत आर्थिक तौर पर भी अफ़ग़ानिस्तान की काफ़ी मदद करता रहा है.

लेकिन दशकों से हिंसा से जूझ रहे अफ़ग़ानिस्तान से जब अमरीका ने बाहर निकलने का ऐलान किया तो भारत शांत ही रहा. न तो वो शांति प्रक्रिया में ही शामिल हुआ और न ही किसी और मामले में.

राकेश सूद बताते हैं, "मुझे लगता है कि एक तरह से हम वहां की राजनीतिक हलचल को थोड़ा सा इग्नोर कर गए हैं, पिछले कुछ सालों में. वहां 28 सितंबर को चुनाव हुए थे अभी तक उसने नतीजे ही घोषित नहीं किए गए हैं. ये बताता है कि वहां राजनीति अनिश्चितता किस हद तक जा चुकी है."

"हम ये तो नहीं कर सकते कि हमें कोई लीडरशिप का रोल लेना है लेकिन कम से कम हमको चाहिए कि हमारी थोड़ा सी सक्रिय राजनीतिक भूमिका होनी चाहिए, क्योंकि हमारे लिए तो पड़ोसी हैं. हम लोगों को लगता है कि हम लोग इतना निर्भर हो गए थे कि वहां अमरीकी हैं, शायद हमको उससे पहले सोचना चाहिए था कि वो जाने वाले हैं और उसकी योजना हमें उस तरीके से करनी चाहिए थी."

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Image caption 2016 में मोदी अफ़ग़ानिस्तान में 30 करोड़ अमरीकी डॉलर (क़रीब 2,000 करोड़ रुपए) की लागत से बनने वाले सलमा बांध परियोजना का उद्घाटन करने पहुंचे थे.

बांग्लादेश के साथ मधुर संबंध कटु होने की राह पर

1971 में पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान अलग हुआ और बांग्लादेश नाम का एक नया राष्ट्र बना.

चूंकि इसके गठन में भारत की भूमिका अहम रही इस कारण भारत के साथ इसके रिश्ते भी शुरुआत से मधुर रहे. लेकिन अब आगे ऐसा होता दिख नहीं रहा.

बांग्लादेश में भारतीय उच्चायुक्त रहे देब मुखर्जी समझाते हैं, "हमारी ओर से सबसे बड़ी बात जो थी, जो सबसे अहम चिंता थी, बांग्लादेश में जो उग्रवादियों को समर्थन मिल रहा था वहां बांग्लादेश सरकार उसे सौ फीसद बंद कर चुकी हैं. हमारी बड़ी चिंता अब खत्म हो चुकी है."

"लेकिन हमारी ओर से जो करना था वो हम नहीं कर पाए हैं. 2011 में पश्चिम बंगाल के विरोध के कारण हम तीस्ता समझौते पर दस्तख़त नहीं कर पाए. ये बेहद नकारात्मक था कि हमारी चिंताओं पर बांग्लादेश ने काम किया लेकिन बांग्लादेश की चिंताओं पर हम काम नहीं कर पाए. इससे एक नकारात्मक संदेश गया."

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Image caption बांग्लादेश की प्रधानम्त्री सेख़ हसीना

हाल में भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून लागू किया है. इस क़ानून के अनुसार बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख धर्म से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव है.

इस क़ानून को लेकर भारत के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. बांग्लादेश से सटे असम में भारी संख्या में लोग इसके विरोध में सड़कों पर हैं.

अब तक बांग्लादेश ने इसे भारत का अंदरूनी मसला बताया है लेकिन हाल में बांग्लादेश के विदेश मंत्री एकके अब्दुल मोमेन का जो बयान मीडिया में आया वो ग़ौर करने लायक था.

उन्होंने कहा, "लोग बांग्लादेश आ रहे हैं क्योंकि बांग्लादेश की स्थिति काफी बेहतर है. हमारी अर्थव्यवस्था काफी मज़बूत स्थिति में है. जो लोग यहां आते हैं उन्हें काम आसानी से मिल जाता है. भारत में अनेक लोगों के पास नौकरियों का अभाव है. इस कारण शायद लोग यहां आ रहे हैं. और कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि बांग्लादेश जाने पर आपको मुफ्त में खाना मिलेगा."

बांग्लादेश के विदेश मंत्री का ये भी कहना था कि भारत सरकार ने भरोसा दिया है कि किसी को जबरन यहां भेजा नहीं जाएगा.

लेकिन देब मुखर्जी कहते हैं कि आश्वासन भर काफी नहीं है. वे कहते हैं, "ठीक है अमित शाह जी ने संसद में कहा कि इस वक्त बांग्लादेश के सरकार के दौरान अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं हो रहा है. लेकन ये कहना काफी नहीं है क्योंकि जो पूरा क़ानून है वो इसी बात पर आधारित है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हुए हैं. इससे वहां लोगों के बीच भारत को लेकर जो छवि है वो नेगेटिव बन जाती है."

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Image caption भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध

देब मुखर्जी मानते हैं कि भारत में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जो हो रहा है इसका असर आने वाले वक्त में दोनों देशों के रिश्तों पर पड़ सकता है.

वो कहते हैं, "ये जो किया जा रहा है ये ख़तरनाक चीज़ है. अब मान लीजिए भारत सरकार को त्रिपुरा में कुछ सामान भेजना है. इसके लिए बांग्लादेश इज़ाज़त दे चुका है और ये बात आगे बढ़ रही थी. लेकिन अब जो हो रहा है, वहां जो लोग कह रहे हैं, वहां के अख़बारों में जो कुछ लिखा जा रहा है उसका असर कभी न कभी वहां की सरकार पर भी पड़ने वाला है."

भारत की छवि को लगा धक्का

सीके लाल कहते हैं कि नेपाल में भी लगभग भारत जैसा ही क़ानून 1960 से रहा है लेकिन यहां पर इसका आधार जातीय राष्ट्रवाद था, वहीं श्रीलंका में भी जातीयता और धर्म के आधार पर क़ानून था.

इन देशों के लिए ये नई बात नहीं है लेकिन दक्षिण एशिया के देशों के बीच भारत की स्थिति अब थोड़ी अलग ज़रूर हो गई है.

"हुआ ये है कि भारत को एक आदर्श के रूप में देखा जाता था जिससे नेपाल और श्रीलंका की सत्ता को कुछ शर्म सी महसूस होती थी. लेकिन अब वो वो बड़े गौरव से कह सकेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ ऐसा ही है तो हमें अब शर्माने की ज़रूरत नहीं है."

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वहीं राकेश सूद बताते हैं कि क्षेत्रीय संगठनों से लोगों को काफी उम्मीदें होती हैं और देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका बड़ा असर होता है लेकिन अब आगे स्थितियां बदली-बदली दिखती हैं.

"हमारी अपनी विकास की दर काफी कम हो गई है. हमने देखा है कि जहां जहां क्षेत्रीय संगठन हैं या फिर ऐसे संगठन बने हैं वहां उन देशों को आर्थिक विकास में सहायता हुई है, उदाहरण के तौर पर आसियान और यूरोपीय यूनियन ले लीजिए. अगर हम किसी न किसी तरह अपने साथ बाक़ी लोगों को लेकर चलते."

"पाकिस्तान का अलग मुद्दा है, लेकिन साथ लेकर चलें तो आर्थिक मदद होगी. मुझे लगता है कि वो हो नहीं पाया है. बांग्लादेश के साथ, एनआरसी के चक्कर में उत्तरपूर्व के साथ जो हमारा संपर्क था वो प्रभावित हुआ है. अगर रिश्ते में दरार पड़ेगी तो वो नहीं हो पाएगा."

बीते कुछ सालों में भारत ने यूरोप के देशों, अमरीका, रूस और मध्यपूर्व के कई देशों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है. प्रधानमंत्री के विदेश दौरे इसी का तो उदाहरण हैं.

लेकिन ऐसा लगता है कि भारत का ध्यान अपने निकट पड़ोसियों के साथ रिश्ते बेहतर करने की तरफ कम है.

फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुज़र रही है और भारत के लिए अपने पड़ोसियों से साथ संपर्क साधना, आने वाले वक्त में बेहद अहम क़दम साबित हो सकता है.

लेकिन ऐसा होगा या नहीं ये देखना अभी बाक़ी है.

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