नागरिकता संशोधन क़ानून: मलेशियाई पीएम से उनके नेताओं ने ही पूछे तीखे सवाल

  • 22 दिसंबर 2019
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मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने भारत के नागरिकता संशोधन क़ानून पर सवाल उठाए हैं लेकिन उन्हें अपने ही नेताओं की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

इससे पहले भारत के विदेश मंत्रालय ने दिल्ली में मलेशियाई राजनयिक को समन भेज, नए नागरिकता क़ानून पर महातिर मोहम्मद की टिप्पणी को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है.

शुक्रवार को कुलालालंपुर समिट से अलग मलेशियाई पीएम ने भारत में नए नागरिकता क़ानून की अनिवार्यता पर सवाल खड़े किए थे. महातिर ने कहा था कि जब भारतीय पिछले 70 सालों से साथ रह रहे हैं तो इसकी ज़रूरत क्या थी?

महातिर ने कहा था, ''भारत में इस क़ानून की वजह से लोग मर रहे हैं. जब लोग पिछले 70 सालों से साथ रह रहे हैं तो इसकी क्या ज़रूरत थी? लोग नागरिक के तौर पर बिना कोई समस्या के साथ रहे थे. अब इसमें ऐसी क्या समस्या आ गई?''

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महातिर ने कहा था, ''मुझे दुःख है कि भारत ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष देश कहता है और धर्म के नाम नागरिकता छीन रहा है. अगर वही काम हमलोग यहां शुरू कर दें तो पता नहीं यहां क्या होगा. भारत का यह क़ानून मुसलमान विरोधी है.'' जिस सत्ताधारी गठबंधन के महातिर नेता हैं उसके दो नेताओं ने भारत के ख़िलाफ़ इस टिप्पणी का विरोध किया है.

भारत ने कहा है कि मलेशिया के पीएम की टिप्पणी भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है. भारत का कहना है कि मलेशियाई पीएम की नागरिकता क़ानून पर टिप्पणी आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर है. विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को मलेशियाई पीएम की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दी थी.

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भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा था, ''मलेशिया के पीएम ने एक बार फिर से भारत के आंतरिक मामले पर टिप्पणी की है. नागरिकता संशोधन क़ानून से तीन देशों के उन लोगों को नागरिकता मिल रही है जिन्हें धार्मिक रूप से प्रताड़ित किया गया है. इस क़ानून से उन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ेगा जो पहले से ही यहां के नागरिक हैं. किसी भी भारतीय की नागरिकता उसके मज़हब के कारण ख़त्म नहीं होगी.''

विदेश मंत्रालय ने कहा था, ''प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद का बयान तथ्यात्मक रूप से ग़लत है. हम मलेशिया से आग्रह करते हैं को चीज़ों को पूरी तरह से जाने बिना आतंरिक मुद्दों पर टिप्पणी ना करे.''

शनिवार को मलेशियाई प्रांत पेनांग के उप-मुख्यमंत्री डॉ पी रामासामी और बगान डालम के असेंबली मेंबर सतीश मुनिआंदी ने भारत के ख़िलाफ़ पीएम महातिर मोहम्मद की टिप्पणी की आलोचना की है. दोनों इस्लामिक उपदेशक ज़ाकिर नाइक को लेकर भी हमलावर रहे हैं. ज़ाकिर नाइक अभी मलेशिया में ही रह रहे हैं.

पेनांग के उप-मुख्यमंत्री और डीएपी यानी डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी के नेता डॉ पी रामासामी ने फ़्री मलेशिया टुडे में एक आर्टिकल लिखकर भारत के नागरिकता संशोधन क़ानून पर महातिर मोहम्मद की टिप्पणी की आलोचना की है.

रामासामी ने लिखा है, ''प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद भारत में नए नागरिक संशोधन क़ानून का शायद वास्तविक मतलब नहीं समझ पा रहे हैं. मुझे लगता है कि महातिर मोहम्मद का यह कहना कि भारत को मुसलमानों की नागरिकता नहीं ख़त्म करनी चाहिए वाला बयान 'ओवर-रिएक्शन' है.''

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रामासामी ने लिखा है, ''महातिर ने कहा कि मलेशिया की सरकार ने चीनियों और भारतीयों को यहां की नागरिकता से वंचित किया तो पता नहीं क्या होगा. महातिर ने कहा कि ऐसा करने से देश में अकल्पनीय स्थिति पैदा होगी. दरअसल, भारत के मुसलमनों से चीनियों और भारतीयों की तुलना का कोई मतलब नहीं है. इसी तरह महातिर ने कश्मीर मसले पर ग़लती की थी और कह दिया था कि भारत ने मुस्लिम बहुल कश्मीर पर कब्ज़ा कर रखा है. उसी तरह इस बार भी प्रधानमंत्री नागरिकता संशोधन क़ानून पर भी ग़लत हैं.''

रामासामी ने लिखा है, ''सच यह है कि जम्मू-कश्मीर को हिन्दू राजा ने आज़ादी के बाद पाकिस्तान के हमले के कारण भारत में मिलाया था. भारत ने पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया था. आज की तारीख़ में जम्मू-कश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर पाकिस्तान का नियंत्रण है और दो तिहाई पर भारत का. भारत ने कश्मीर पर हमला कर अपने क़ब्ज़े में किया था यह कभी मुद्दा ही नहीं रहा है. महातिर ने स्पष्ट रूप से कश्मीर मसले पर ग़लती की थी.''

रामासामी ने लिखा है, ''भारत के नागिकता क़ानून में नया संशोधन मुसलमानों की नागरिकता छीनने के लिए नहीं है. सच यह है कि नए क़ानून का भारतीय मुसलमानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यह क़ानून तीन इस्लमिक देश बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में धर्म के नाम पर सताए गए हिन्दू, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता देने के लिए है. यह क़ानून भारत के संसद ने पास किया है ताकि इन तीन देशों से 2014 से पहले तक भारत में आए ग़ैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बिना कोई रुकावट के नागरिकता मिल सके.''

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रामासामी ने महातिर की टिप्पणी की आलोचना करते हुए लिखा है, ''इस क़ानून से किसी भी भारतीय की धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं जाएगी. जो मुसलमान भारत के नागरिक हैं उनके ख़िलाफ़ यह क़ानून कुछ नहीं करेगा. जब पाकिस्तान और बांग्लादेश बना तो वहां हिन्दुओं की तादाद अच्छी ख़ासी थी लेकिन इस्लामीकरण की राजनीति और धर्मांतरण के कारण इनका पलायन शुरू हुआ और हिन्दुओं की संख्या कम होती गई. यह क़ानून उन लोगों के लिए है जिन्हें इन तीन देशों में अल्पसंख्यक होने के कारण प्रताड़ित किया गया.''

रामासामी ने लिखा है, ''जो इस क़ानून की आलोचना कर रहे हैं उनका तर्क है कि भारत ने धार्मिक रूप से उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का क़ानून लाया है तो इसमें म्यांमार के रोहिंग्या, श्रीलंका के तमिल हिन्दू और पाकिस्तान के शिया मुसलमानों को शामिल क्यों नहीं किया. ये भी धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक होने के कारण प्रताड़ित किए गए हैं. लेकिन ऐसे तर्क देने वालों को याद रखना चाहिए कि इन सालों में बांग्लादेश और पाकिस्तान के हज़ारों मुसलमानों को भारत ने नागरिकता दी है. यहां तक कि हाल के वर्षों में बांग्लादेश और पाकिस्तान से जो मुसलमान आए हैं वो सामान्य प्रक्रिया के तहत भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं.''

रामासामी ने लिखा है, ''यह संशोधन एक ख़ास उद्देश्य के लिए है. यह तीन देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है. यह वर्तमान नागरिकता प्रावधान के बदले नहीं है. दूसरी बात यह कि इस संशोधन से भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि पर कोई असर नहीं पड़ेगा. भारत हमेशा ही धर्मनिरपेक्ष देश रहेगा. सबको याद रखना चाहिए कि इंडोनेशिया के बाद सबसे ज़्यादा मुसलमान भारत में ही रहते हैं न कि पाकिस्तान में.''

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रामासामी ने लिखा है, ''अगर मुसलमानों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जाए तो वो भारत को ही चुनेंगे. मैंने पहले भी कहा है कि नया क़ानून एकदम मुकम्मल नहीं है. इस क़ानून पर कुछ आपत्तियां जायज़ हैं. मुझे उम्मीद है कि वर्तमान सरकार क़ानून को समावेशी बनाएगी न कि कुछ ख़ास लोगों के लिए. महातिर बहुत व्यस्त हैं और उनके पास वक़्त नहीं है कि वो नए क़ानून को समझें. इसी वजह से संभव है कि वो कड़ा ऐतराज़ जता रहे हैं.''

वहीं बगान डालम के असेंबली मेंबर सतीश मुनिआंदी ने फ़ेसबुक पोस्ट में पीएम महातिर मोहम्मद की टिप्पणी की आलोचना की है. उन्होंने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा है, ''भारत के नागरिकता संशोधन क़ानून पर महातिर मोहम्मद की टिप्पणी से सवाल खड़ा हो रहा है कि 90 साल से ऊपर की उम्र वाले पीएम विदेश नीति किसकी सलाह से आगे बढ़ा रहे हैं. महातिर की टिप्पणी से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में कोई मदद नहीं मिलने जा रही है.''

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यह पहली बार नहीं है जब महातिर मोहम्मद ने भारत को घेरा है. भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया था तब भी महातिर मोहम्मद ने कड़ी टिप्पणी की थी. इसी साल सितंबर महीने में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत ने कश्मीर पर हमला कर अपने क़ब्ज़े में रखा है. तब भी भारत ने मलेशिया के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई थी.

सतीश मुनिआंदी मलेशिया की डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी में यूथ इंटरनेशनल ब्यूरो के सेक्रेटरी हैं. उन्होंने मलेशियाकिनी में लिखा है, ''महातिर की इस टिप्पणी से भारत का ग़ुस्सा होना लाज़िमी है. ऐसी टिप्पणी महातिर के कद वाले नेता को शोभा नहीं देता है. यह कोई पहली बार नहीं है जब महातिर ने भारत को लेकर तथ्यात्मक रूप से ग़लत टिप्पणी की है. भारत न केवल हमारा महत्पूर्ण कारोबारी साझेदार है बल्कि दशकों से पारंपरिक सहयोगी है.

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