क्या इमरान को सऊदी अरब की आपत्ति का अंदाजा नहीं था?

  • 26 दिसंबर 2019
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मलेशिया में आयोजित कुआलालंपुर समिट से स्पष्ट हो गया है कि 'मुस्लिम वर्ल्ड' में मतभेद बहुत गहरा है.

इस समिट को लेकर इस्लामिक दुनिया का मतभेद खुलकर सतह पर आया. कुआलालंपुर समिट में पाकिस्तान का जो ढुलमुल रवैया रहा उससे यह भी स्पष्ट हो गया कि वो अपने दायरे से बाहर नहीं जा सकता है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को 19-20 दिसबंर को इस समिट में शामिल होने के लिए मलेशिया जाना था लेकिन उन्हें यह दौरा उसके ठीक दो दिन पहले सऊदी जाने के बाद रद्द करना पड़ा.

सऊदी अरब इस बात से ख़ुश नहीं था क्योंकि मलेशिया सऊदी के नेतृत्व वाले ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी को नया मंच बनाकर चुनौती देने की कोशिश कर रहा था.

यह समिट तब विवादों में घिर गया जब मलेशिया ने सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों को इसमें आमंत्रित करने से इनकार कर दिया. ईरान, तुर्की, क़तर और पाकिस्तान इसमें प्राथमिक तौर पर आमंत्रित किए गए थे. इसके अलावा दुनिया भर के 400 मुस्लिम विद्वानों को भी बुलाया गया था.

मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद पाकिस्तान और तुर्की से इस बात को लेकर चर्चा कर रहे थे कि इस्लामिक दुनिया की चुनौतियों की चर्चा इस समिट में हो. इमरान ख़ान ने न केवल इस समिट को समर्थन दिया था बल्कि उन्होंने इसमें आने के लिए भी हामी भरी थी.

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सऊदी के सामने मजबूर इमरान

पाकिस्तान के नीति निर्माताओं के बीच यह आम सोच है कि सऊदी के नेतृत्व वाले ओआईसी ने कश्मीर के मामले में भारत के ख़िलाफ़ बिल्कुल समर्थन नहीं दिया. दूसरी तरफ़ ईरान, तुर्की और मलेशिया ओआईसी को सीधे चुनौती देना चाहते हैं कि वो इस्लामिक दुनिया के सेंटिमेंट को समझने और मंच देने में नाकाम रहा है.

वहीं सऊदी अरब ओआईसी के ज़रिए मुस्लिम वर्ल्ड में राजनीतिक और राजनयिक प्रभाव क़ायम रखना चाहता है. अगर मलेशिया, तुर्की और ईरान की कोशिश सफल रही तो आने वाले महीनों में ओआईसी की प्रासंगिकता को गंभीर चुनौती मिलेगी.

सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि इमरान ख़ान ने पूरे मामले में अपरिपक्वता और अनुभवहीनता का परिचय दिया है. उन्होंने कहा, ''पाकिस्तान आज की तारीख़ में हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रहा है. इमरान ख़ान पर सऊदी अरब ने भयानक दबाव बढ़ा दिया है. पाकिस्तान में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा शिया मुसलमानों की आबादी है और ईरान भी शिया मुल्क ही है. ईरान के साथ पाकिस्तान की सीमा लगती है. पाकिस्तान में जब नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी का शासन था तो ईरान से अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश की गई. लेकिन इमरान ख़ान के आने के बाद सऊदी ने दबाव बढ़ा दिया कि वो उसके कहे बिना कुछ कर नहीं सकते हैं.''

तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''कुआलालंपुर समिट ओआईसी को सीधी चुनौती थी. मलेशियाई पीएम महातिर मोहम्मद की कोशिश रही है कि कोई नया इस्लामिक संगठन बने जो सऊदी अरब की छाया से दूर रहे. ओआईसी पूरी तरह से अप्रभावी हो गया है. यह सऊदी के लालच पूरा करने का ज़रिया है. इसका इस्तेमाल सबसे ज़्यादा ईरान के ख़िलाफ़ होता है. महातिर की कोशिश है कि वो ईरान, तुर्की और क़तर को लेकर कोई नया संगठन खड़ा करें, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल हो. हालांकि ऐसा हो नहीं पाया. इमरान ख़ान कुछ भी संभाल नहीं पा रहे हैं और उन्होंने मलेशिया दौरा रद्द कर बड़ी भूल की है.''

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कश्मीर पर नहीं हो पाई चर्चा

कहा जा रहा है कि मलेशिया, तुर्की, ईरान और पाकिस्तान इस समिट में जम्मू-कश्मीर पर भी चर्चा करने वाले थे. मलेशिया और तुर्की कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में खुलकर भारत के ख़िलाफ़ बोले भी थे. सऊदी को लेकर पाकिस्तान के भीतर कहा जा रहा है कि भारत के साथ उसके अपने हित जुड़े हैं इसलिए कश्मीर मामले में वो ख़ुद बोल नहीं रहा.

कश्मीर मामले में सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों ने पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया. पाकिस्तान में इसे लेकर नाराज़गी भी बढ़ी और विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी को सामने आकर कहना पड़ा कि दोनों देशों के अपने-अपने हित हैं इसलिए कश्मीर उनकी प्राथमिकता में नहीं है. सऊदी ने कश्मीर को लेकर चिंता जताई लेकिन संयुक्त अरब अमीरात ने इसे भारत का आंतरिक मामला क़रार दिया.

भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया तो पाकिस्तान, तुर्की, मलेशिया और ईरान खुलकर सामने आए. दूसरी तरफ़ ओआईसी कश्मीर पर भारत को लेकर उदार रहा. इसके उलट सऊदी ने भारत को ओआईसी के मंच पर लाया. ओआईसी को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या वो मुस्लिम वर्ल्ड की समस्याओं और चुनौतियों को गंभीरता से देख रहा है या कुछ देश इसे अपने हित के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं?

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इस्लामिक दुनिया में उठापटक

पिछले कुछ सालों में ओआईसी यमन में हूती विद्रोहियों की भूमिका की आलोचना करते हुए कह चुका है कि यह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए ख़तरा है. ओआईसी की यह टिप्पणी अप्रत्यक्ष रूप से सीधे ईरान के ख़िलाफ़ थी. ईरान यमन में हूती विद्रोहियों से सहानुभूति रखता है. पाकिस्तान के भीतर कहा जा रहा है कि इमरान ख़ान का सऊदी के दबाव में आकर मलेशिया दौरा रद्द करना उनकी रणनीतिक ग़लती है.

सऊदी इस समिट में पाकिस्तान को नहीं देखना चाहता था. जिस समिट में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने जाने की घोषणा की थी उसमें वो अपना एक मंत्री तक नहीं भेज पाया. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे एक बार फिर से साबित हुआ कि पाकिस्तान की विदेश नीति में सऊदी अरब का सबसे बड़ा प्रभाव है.

पाकिस्तान के प्रमुख अख़बार डॉन ने 18 दिसंबर को अपनी संपादकीय में भी कहा कि इमरान ख़ान का मलेशिया दौरा रद्द करने उनकी बड़ी रणनीतिक चूक है. इस संपादकीय में कहा गया कि इमरान ख़ान ने राजनयिक मोर्चे पर अपरिपक्वता दिखाई है. अख़बार ने लिखा है कि क्या इमरान ख़ान को इस समिट में जाने की घोषणा करते वक़्त सऊदी अरब की आपत्ति का अंदाज़ा नहीं था?

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पाकिस्तान की विदेश नीति में बाहरी हस्तक्षेप

कहा जा रहा है कि पाकिस्तान इसकी भारी क़ीमत चुकाएगा. मलेशिया दौरा रद्द करने के बाद यह बात ज़ोर देकर कही जा रही है कि पाकिस्तान की विदेश नीति में अब भी बाहरी दबाव की भूमिका सबसे प्रभावी है. इसके साथ ही इस बात की भी पुष्टि हो गई है कि ईरान, मलेशिया और तुर्की कश्मीर पर उसके साथ हैं लेकिन यह तय नहीं है कि पाकिस्तान भी उनके साथ रहेगा.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान स्वतंत्र रूप से ईरान और तुर्की से बिना सऊदी के प्रभाव के बात कर सकता है? अभी पाकिस्तान सऊदी और ईरान में विवादों को सुलझाने की कोशिश कर रहा था. मलेशिया दौरा सऊदी के दवाब में रद्द करने के बाद अब उसकी मध्यस्थता की क्षमता पर भी सवाल उठ रहे हैं.

पाकिस्तान के समिट में नहीं आने पर तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोवान ने कहा कि वो सऊदी के दवाब और धमकी के कारण नहीं आया. मलेशिया के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से कहा गया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने फ़ोन कर पीएम महातिर मोहम्मद से खेद जताया है.

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कुआलालंपुर समिट को शुरू से ही ओआईसी को चुनौती देने के तौर पर देखा गया. इस समिट में महज छह देशों को आमंत्रित किया गया था. ओआईसी के 49 देश सदस्य हैं. इसमें किसी भी अफ़्रीकी देश को नहीं बुलाया गया था. अरब से भी केवल क़तर को ही बुलाया गया था. सऊदी अरब ख़ुद को इस्लामिक दुनिया का स्वाभाविक नेता समझता है.

क़र्ज़ के जाल में उलझे पाकिस्तान को सऊदी अरब ने डिफॉल्टर होने से बचाया था. सऊदी ने कई बार मुश्किल घड़ी में पाकिस्तान की मदद की है. 2018 में आम चुनाव के बाद जब इमरान ख़ान सत्ता में आए तब पाकिस्तान आर्थिक बदहाली से जूझ रहा था और सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 6 अरब डॉलर की मदद की थी.

अगर सऊदी ये मदद नहीं करता तो पाकिस्तान डिफॉल्टर हो सकता था. इसके अलवा 27 लाख पाकिस्तानी सऊदी अरब में काम करते हैं और वहां से आने वाली विदेशी मुद्रा का पाकिस्तान के फॉरेक्स में बड़ा योगदान है.

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