वो शख़्स जिसने अमरीका और यूरोप को ग़ालिब-मीर से मिलवाया

  • 29 दिसंबर 2019
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एक अफ़ग़ान वैज्ञानिक ऐसा चावल तैयार करता है जो उसे करोड़पति बना देता है और वो अपनी दौलत का आधा हिस्सा मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के अंग्रेजी में अनुवाद के लिए दान कर देते हैं और ये काम जर्मन डॉक्टर एन मेरी शिमल पूरा करती हैं.

एक शोधकर्ता जॉन के बैटन कहते हैं कि ये अफ़ग़ान वैज्ञानिक अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी एक विद्यार्थी के रूप में सन 1923 में पेट्रो केमिस्ट्री की शिक्षा के लिए अमरीका जाते हैं.

"उनकी डॉक्टर एन मेरी शिमल से कभी मुलाक़ात नहीं हुई और ये भी यक़ीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि वो खुद भी मीर तक़ी मीर या मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी को समझ सकते थे या नहीं."

वन मिनट राइस

अफ़ग़ानिस्तान के सूबे हिरात से संबंध रखने वाले अताउल्लाह खान औज़ाई दुर्रानी 1897 में पैदा हुए थे.

एक साधारण परिवार से होने की वजह से पहले उन्होंने कुछ समय समय अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त की, फिर उच्च शिक्षा के लिए अमरीका चले गए.

लक्ष्य पेट्रो केमिस्ट्री पढ़ना था ताक़ि पेट्रोलियम इंडस्ट्री में किया जा सके लेकिन क़ुदरत को कुछ और ही मंज़ूर था.

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जब वो अमरीका पहुंचे तो उनके एक जानकार डॉक्टर हर्बर्ट बेकर ने, जो बाद में अमरीकी केन कंपनी के अध्यक्ष बने उनके घर पर खाना खाते हुए उनके बनाये हुए चावलों की तारीफ़ की और सलाह दी कि चावलों की यहां बड़े पैमाने पर पहचान कराई जाए.

अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी को ये सलाह पसंद आई और वो इस खोज में लग गए.

उन्होंने चावल उगाए, बहुत से एक्सपेरिमेंट किए, और दस साल के शोध के बाद उन्होंने वो मंज़िल हासिल कर ली जिसके लिए उन्होंने पेट्रो केमिस्ट्री का विषय छोड़ा था.

सन 1939 में उन्होंने चावल की एक ऐसी क़िस्म की खोज कर ली जो न सिर्फ एक मिनट में पक कर तैयार हो जाती थी बल्कि ऐसे छोटे से यात्री चूल्हे का डिज़ाइन भी तैयार कर लिया जिसके इस्तेमाल से चावल एक छोटी सी हंडिया में चूल्हे पर रखने से ले कर पकने तक सिर्फ एक मिनट का समय लगता था.

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ख़ुदा देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है

एक आध साल के बाद एक दिन अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी अपने इस यात्री चूल्हे और चावलों के एक पैकेट के साथ न्यूयॉर्क में जनरल फूड्ज़ कॉर्पोरेशन के दफ्तर में दाखिल हुए और उसके एक उच्च पदाधिकारी क्लेरेंस फ्रांसिस को कहा कि वो एक मिनट में चावल तैयार कर सकते हैं.

उस ज़माने में उसी कॉर्पोरेशन ने एक मिनट में सागूदाना पकाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था.

अताउल्लाह को एक वैज्ञानिक शोधकर्ता के रूप में जाना जाता था.

जनरल फूड्ज के दफ्तर में कॉर्पोरेशन के निर्देशक और दूसरे अफ़सरों के सामने उन्होंने यात्री चूल्हे की किट खोली और सच में एक मिनट के बाद चावल खाने के लिए तैयार थे.

जनरल फूड्ज कॉर्पोरेशन के अधिकारी और उन्होंने फ़ौरन कॉन्ट्रैक्ट कर लिया.

अताउल्लाह अपनी रॉयल्टी तय करके दफ्तर से अपना सामान उठाकर चल दिए.

उसके बाद उन चावलों और यात्री चूल्हे की किट धड़ा धड़ बनना शुरू और रॉयल्टी मिलनी शुरू हो गई.

कहा जाता है कि 'वन मिनट राइस किट' की वजह से इतना चावल बिका कि अमरीका की खेती बढ़ गई.

शुरू में तो ख्याल था कि ये किट और चावल घरों में इस्तेमाल होंगे, लेकिन जल्द ही इस किट की एक नई मार्किट नजर आई.

दूसरे विश्व युद्ध के समय अमरीकी फौजी विभिन्न मोर्चों पर लड़ने के लिए भेजे जा रहे थे.

जनरल फूड्ज़ कॉर्पोरेशन ने 'वन मिनट राइस' की ये किट फ़ौज को बेचनी शुरू कर दी जो हर फैजी के राशन का हिस्सा बन गई.

कॉर्पोरेशन ने खुद भी बहुत मुनाफा कमाया और अताउल्लाह भी करोड़पति बन गए.

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औज़ाई दुर्रानी का भारतीय मुसलमान दोस्त

लेकिन वो एक वैज्ञानिक थे और उन्हें मिलने वाली दौलत ने उन्हें बदला नहीं. पढ़ने लिखने का खूब शौक़ था और अपने ही जैसा शौक़ रखने वालों में उनका उठना बैठना था.

सन 1920 के दशक के शुरू में उनकी मुलाक़ात एक भारतीय मुसलमान से हुई जिनका नाम सैयद हुसैन था.

सैयद हुसैन उस समय भारत की आज़ादी के लिए अमरीका में ही लॉबी कर रहे थे. बाद में वो मिस्र में भारत के राजदूत भी रहे.

कुछ शोधकर्ता लिखते कि औज़ाई दुर्रानी और सैयद हुसैन के बीच दोस्ती की बुनियादी वजह दोनों का शायरी से लगाव था.

कुछ ये भी कहते हैं कि हुसैन की वजह से औज़ाई दुर्रानी को मीर और ग़ालिब की शायरी का शौक़ पैदा हुआ.

उसकी सच्चाई जो भी हो अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी की सैयद हुसैन से गहरी दोस्ती हो गई.

औज़ाई दुर्रानी ने अपने दोस्त सैयद हुसैन की याद में मीर और ग़ालिब के कलाम के अंग्रेजी में अनुवाद कराये थे.

सैयद हुसैन भारत की आज़ादी की लड़ाई के नेता मोहनदास करमचंद गांधी से बहुत प्रभावित थे.

भारतीय पत्रकार और लेखक सईद नक़वी अपनी किताब में लिखते हैं कि सैयद हुसैन नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित से प्यार करते थे, लेकिन तमाम हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई के नारों के बावजूद, उन दोनों को शादी की इजाज़त नहीं मिली.

एक ब्लॉगर दानिश खान के अनुसार, सन 1949 में उनकी मौत के समय 'मियामी डेली' ने उनके इस सम्बन्ध का कुछ इस तरह ज़िक्र किया, "(विजय लक्ष्मी पंडित) की अमरीका में राजदूत बनाए जाने के एलान से कुछ हफ्तों पहले सैयद हुसैन (काहिरा के) मशहूर शेपर्ड होटल में अपने कोने वाले कमरे में मृत पाए गए. उनके नज़दीकी दोस्तों का कहना था कि वो एक टूटे हुए दिल के साथ मौत से जा मिले."

अमरीका के कई अखबारों ने अपने सम्पादकीय में उन्हें श्रद्धांजलि दी बल्कि एक अख़बार ने तो उन्हें रबीन्द्रनाथ टैगोर के बाद भारत का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहा.

सैयद हुसैन के इतने मशहूर व्यक्तित्व से अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी का प्रभावित होना लाज़िमी था. सैयद हुसैन की मौत पर दूसरे दोस्तों की तरह वो भी बहुत दुखी हो गए.

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औज़ाई की वसीयत

ये दुःख उनके सीने में हमेशा सुलगता रहा. जब सन 1964 में औज़ाई दुर्रानी बीमार हुए तो उन्होंने अपनी वसीयत बनवाई.

अपने दस लाख डॉलर में से आधे से ज़्यादा उन्होंने सैयद हुसैन ट्रस्ट के नाम पर छोड़े ताक़ि उन्नीसवीं सदी के उर्दू ज़बान के दो महान शायर मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा असदुल्लाह खान के कलाम का अंग्रेजी में अनुवाद किया जा सके.

अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी ने एक अमरीकी महिला से शादी की और एक बेटी पैदा हुई लेकिन ये शादी ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकी.

अपनी वसीयत में इसके अलावा उन्होंने 30 हज़ार डॉलर समेत अपनी निजी लाइब्रेरी लुइज़ियाना यूनिवर्सिटी को दान में दे दी, ताक़ि वो चावल की संस्कृति पर शोध कर सके.

उन्होंने अपनी वसीयत के अनुसार तीन लाख डॉलर अपनी पहली पत्नी लुइज़ा ऐब्ज और बेटी के लिए छोड़ी.

कई शोध कर्ताओं ने लिखा है कि अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी ने सन 1950 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को भी एक लाख रुपये मीर और ग़ालिब के अंग्रेजी में अनुवाद के लिए दिये थे.

उस समय अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन थे लेकिन वहां कई साल पैसा पड़ा रहने के बावजूद भी कोई हलचल नही हुई.

अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी की मौत के बाद जब उनकी वसीयत के अनुसार पांच लाख डॉलर की रक़म सैयद हुसैन के नाम से उन दो शायरों के अनुवाद के लिए छोड़ी गई तो उनके अमरीकी वकीलों की टीम ने कहा था कि उनकी फ़ारसी कमज़ोर थी.

लेकिन एक वकील ने कहा कि उन्हें यक़ीन है कि उन शायरों का सम्बन्ध फ़ारसी ज़बान से है या जो भी ये ज़बान है ये उन्नीसवीं सदी में भारत में बोली जाती थी.

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मीर और ग़ालिब: पाकिस्तानी शायर

न्यूयॉर्क टाइम्स की 19 जून 1964 की ख़बर के अनुसार उन वकीलों ने वसीयत के मुताबिक़ मीर और ग़ालिब के कलाम की तलाश करना शुरू किया.

सबसे पहले उन्होंने एक खत न्यूयॉर्क में भारतीय काउंसिल को लिखा. वहां से जवाब आया कि ये मामला आपको पाकिस्तानियों से पता करना चाहिए.

अख़बार के अनुसार थोड़ी छानबीन के बाद काउंसिल से ये सूचना मिली कि ग़ालिब की शायरी रूमानी और फ़लसफ़ियाना थी, जबकि मीर की शायरी धार्मिक क़िस्म की थी जिसमे इस्लाम के शिया सम्प्रदाय का वर्चस्व दिखाई देता है.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उस समय के ईरानी अध्ययन के प्रोफ़ेसर डॉक्टर अहसान यार शातरी ने उन वकीलों को बताया कि इन शायरों ने मौजूदा पाकिस्तान के इलाक़े में अपनी ज़िन्दगी गुज़ारी थी. फ़ारसी अदब की एक बड़ी पृष्ठभूमि में देखा जाये तो ये बहुत बड़े शायर नहीं हैं, लेकिन ये दोनों पकिस्तान के लिए बहुत ख़ास है.

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार डॉक्टर शातरी ने कहा कि ग़ालिब के कलाम को मीर की तुलना में ज़्यादा ख्याति प्राप्त हुई है. ये शायर फ़ारसी और उर्दू दोनों में शायरी करते थे, उर्दू ज़बान फ़ारसी से प्रभावित भारत की एक ज़बान है. उन प्रोफेसर ने आगे कहा कि ग़ालिब की शायरी में सुरीला और सूफियानापन है.

इसी अखबार के अनुसार इस समय न्यूयॉर्क की लाइब्रेरी में दोनों शायरों पर दो दो किताबें मौजूद हैं.

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अखबार के अनुसार ग़ालिब का एक समग्र जिसे लाहौर में सन 1928 में बहुत ही खूबसूरत तरीके से प्रकाशित किया गया था, उसमे किसी ऐसे कलाकार ने मिनिएचर पेंटिंग की हुई थी जो कि (उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश कलाकार) रोसिटी या ब्रान जोंज़ से प्रभावित लगता है.

मीर तक़ी मीर के बारे में अखबार ने लिखा है कि (लाइब्रेरी) में मीर के कलाम की एक भारी भरकम किताब है.

मीर तक़ी मीर के कलाम से जो अंश ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने 2014 में प्रकाशित किया उन चार किताबों में सबसे छोटी में मीर के कलाम का फ़्रांसिसी ज़बान में अनुवाद था जिसमे बुरे शायरों के लिए नसीहत लिखी हुई थी. यही इस कलाम का विषय था.

यानी जब बेवक़ूफ़ शेर कहते रहते हैं तो वो लोगों के अपमान का विषय तो होते ही हैं उनके तानो का निशाना भी बनते हैं.

अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी ने अपनी वसीयत में कहा था कि इन दो शायरों के समग्र के अनुवाद का मक़सद उनके दोस्त की याद को हमेशा के लिए क़ायम करना है.

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, सैयद हुसैन सन 1920 और सन 1930 के दशक में लगातार आते थे और लेक्चर दिया करते थे.

सन 1921 में अमरीका में पहले दौरे के मौके पर उनका परिचय औलाद-ए-रसूल कह कर कराया गया था.

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डॉक्टर एन मेरी शिमल और उर्दू साहित्य

जर्मनी से सम्बन्ध रखने वाली सूफीवाद और इस्लाम से घनिष्ट सम्बन्ध रखने वाली डॉक्टर एन मेरी शिमल, जिन्हें जर्मन ज़बान के अलावा अंग्रेजी, तुर्की, फ़ारसी, और उर्दू पर महारत हासिल था, उसी दौर में अपनी क़ाबिलियत का सिक्का मनवा चुकी थी. पहले वो मौलाना जलालुद्दीन रूमी से प्रभावित रही फिर उनका रुझान अल्लमा डॉक्टर मुहम्मद इक़बाल की तरफ हुआ.

कई शोधपत्रों और किताबों की लेखिका होने की वजह से डॉक्टर एन मैरी शिमल इस्लाम, सूफीवाद और तुर्की, फ़ारसी,और उर्दू की स्कॉलर की हैसियत से ख्याति पा चुकी थीं.

अल्लमा इक़बाल में गहरी दिलचस्पी की वजह से उन्होंने 1950 के दशक से पकिस्तान आना जाना शुरू कर दिया था, वहीं से उन्हें एक ऐसा मौक़ा मिला जो उन्हें हारवर्ड यूनिवर्सिटी ले आया.

दी हारवर्ड गज़ट के अनुसार सन 1965 में जब वो कैलिफोर्निया में धर्मों के इतिहास पर एक कॉन्फ्रेंस में शामिल होने गई हुई थी तो वहां हारवर्ड यूनिवर्सिटी के विल्फ्रेड कैनवेल स्मिथ ने उनसे संपर्क किया और उन्हें बताया कि 'वन मिनट राइस' की खोज करने वाले ने एक अनुवाद प्रोजेक्ट के लिए एक बड़ी रक़म छोड़ी है क्या आप उसमे दिलचस्पी रखती हैं.

डॉक्टर एन मेरी शिमल ने मना कर दिया. उन्होंने कहा कि उर्दू ज़बान की माहिर न होने की वजह से वो खुद को इस प्रोजेक्ट के क़ाबिल नहीं समझती हैं.

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Image caption डॉक्टर एन मेरी शिमल

लेकिन प्रोफ़ेसर स्मिथ और हारवर्ड के दूसरे टीचर्स ने उन्हें राज़ी करने की कोशिश लगातार जारी रखी और आखिरकार हारवर्ड ले आये और उन्होने मीर और ग़ालिब के कलाम के अनुवाद का काम शुरू कर दिया.

सन 1968 में उन्होंने उर्दू के तीन बड़े शायरों सौदा, मीर हसन और ग़ालिब, के कलाम का कुछ हिस्सा अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाले अनुवाद की किताब की प्रस्तावना लिखी.

ये अनुवाद हारवर्ड यूनिवर्सिटी ने प्रकाशित किया था और अनुवाद ब्रिटेन के रॉल्फ रसल और ख़ुर्शीदुल इस्लाम ने किया था.

डॉक्टर शिमल सन 1992 में हारवर्ड यूनिवर्सिटी से रिटायर हुई.

उन्होंने कई किताबें ऐसे विषयों पर लिखी जिन पर अब तक खुद मुस्लिम स्कॉलर ने इतनी गहराई से नहीं लिखा था.

उन्हें न सिर्फ अमरीका बल्कि मिडिल ईस्ट के अलावा उनके अपने वतन जर्मनी में भी बहुत सरहाया गया.

उन्हें कई डॉक्टरेट की मानक उपाधि भी दी गयी.उनकी कुल मिलाकर सौ से ज़्यादा किताबें हैं.

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उस अफ़ग़ान स्टूडेंट ने जब हिरात से अपनी यात्रा शुरू की थी तो उसने भी नहीं सोचा होगा कि वो दुनिया में अपनी कामयाबी और अपने शायरी से लगाव की वजह से उस मक़ाम पर पहुँच जायेगा कि वो दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी और अपने समय की सबसे बड़ी स्कॉलर के द्वारा पश्चिम को मीर और ग़ालिब का कलाम अपने एक दोस्त की यादगार के तौर पर दे जाएगा.

अताउल्लाह औज़ाई दुर्रानी सैयद हुसैन और एन मेरी शिमल का नाम सिर्फ उनकी अपनी हैसियत में अमर हो चुका है बल्कि मीर और ग़ालिब के कलाम की वजह से अंग्रेजी भाषा में भी कभी न मिटाये जाने वाले निशान बना चुका है.

ये निशान विश्व की अलग अलग संस्कृतियों के लिए जोडने का जरिया है.

डॉक्टर शिमल अपने पसंदीदा जर्मन शायर फ़्रेड्रेश रोक्रेट एक वक्तव्य कहती हैं कि 'विश्व कविता वैश्विक सामंजस्य का नाम है.'

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