ऑस्ट्रेलिया: आग पर क़ाबू पाने के लिए क्या-क्या किया जा रहा है?

  • 15 जनवरी 2020
आग बुझाने के काम में लगा एक हेलीकॉप्टर इमेज कॉपीरइट Getty Images

ऑस्ट्रेलिया के जंगलों का एक बड़ा हिस्सा जलकर ख़ाक हो चुका है. बीते 10 सालों में ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी ये सबसे भयानक आग है. लाखों हेक्टेयर जंगल और यहां के नेशनल पार्क तक इस आग की चपेट में हैं.

ऑस्ट्रेलिया में तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है और शुष्क मौसम इस आग को और बढ़ा रहा है. एक जुलाई से लेकर अभी तक क़रीब एक लाख स्क्वायर किलोमीटर ज़मीन इस आग की ज़द में आ चुकी है.

ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन इस आग पर क़ाबू पाने में लगा हुआ है. दूसरे देशों से भी मदद मिल रही है.

एक नज़र उन तरीक़ों और संसाधनों पर जिनकी मदद से ऑस्ट्रेलिया इस आग पर क़ाबू पाने की कोशिश कर रहा है.

आग का मुक़ाबला करना कोई आसान काम नहीं है

ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग पर क़ाबू कर पाना इतना आसान नहीं और इस बात का अंदाज़ा यहां के लाल हो चुके आसमान और काली पड़ चुकी ज़मीन को देखकर लगाया जा सकता है. इस बात का अंदाज़ा लगाना आसान है कि ये आग कोई साधारण आग नहीं है, दशक की सबसे क्रूर आग है.

हालांकि बीते दिनों ऑस्ट्रेलिया में हुई बारिश से आग बुझाने के काम में लगे कर्मियों को कुछ राहत ज़रूर मिली लेकिन यह राहत अस्थायी थी. अधिकारियों का कहना है कि इससे राहत उस वक़्त तक मिलना संभव नहीं जब तक कि अच्छी बारिश नहीं हो जाती.

अधिकारियों ने आशंका जताई है कि आने वाले सप्ताह में ऑस्ट्रेलिया में गर्मी और बढ़ेगी जिससे ख़तरा और अधिक बढ़ सकता है.

ऑस्ट्रेलिया में इस वक़्त भी हज़ारों की संख्या में दमकलकर्मी आग बुझाने के काम में लगे हुए हैं. कुछ जगहों पर यह आग थोड़ी कम ज़रूर हुई है लेकिन कुछ जगहों पर यह स्थिति अभी भी ख़तरनाक स्तर पर है.

ज़्यादातर कस्बे इस आग से घिरे हुए हैं और अधिकतर राज्यों में लोगों के घर नष्ट हो चुके हैं. इस आग की वजह से अभी तक कम से कम 28 लोगों के मारे जाने की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है.

राज्य और केंद्र स्तर के अधिकारी इस आग पर क़ाबू पाने की कोशिश कर रहे हैं. पहली कोशिश यही है कि इस आग को और अधिक फैलने से रोका जा सके. हालांकि कुछ जगहों पर उन्हें कामयाबी भी मिली है.

सिर्फ़ अधिकारी नहीं, बहुत से दूसरे लोग भी शामिल हैं इस लड़ाई में

देश की स्टेट फ़ायर सर्विस के मुताबिक़, जिस वक़्त देश में आग की स्थिति सबसे ख़तरनाक रही उस वक़्त एक समय में क़रीब तीन हज़ार सात सौ से ज़्यादा दमकलकर्मी ग्राउंड पर मौजूद थे.

इस आग का असर यूं तो पूरे देश में देखा जा सकता है लेकिन न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया इलाक़ा सबसे अधिका प्रभावित हुआ है.

जिस समय आग अपने सबसे ख़तरनाक स्तर पर थी उस वक़्त अकेले न्यू साउथ वेल्स में ही 2700 से ज़्यादा लोग तैनात थे.

न्यू साउथ वेल्स के रूरल फ़ायर सर्विस के बेन शेफ़र्ड का कहना है कि उनके साथियों ने इस सीज़न में क़रीब 4.2 मिलियन हेक्टेयर में लगी आग पर क़ाबू पाने की कोशिश की.

उनका कहना है कि यह बहुत लंबा अभियान रहा.

लेकिन दमकलकर्मियों के साथ बहुत से लोग भी इस आग पर क़ाबू पाने की कोशिश में मदद कर रहे हैं. क़रीब 3000 आर्मी, नेवी और एयरफ़ोर्स के लोग इस मिशन में मदद कर रहे हैं. ये लोग सर्च, रेस्क्यू और बाद में सफ़ाई अभियान का हिस्सा हैं.

इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया को अमरीका, कनाडा और न्यू ज़ीलैंड भी मदद कर रहे हैं. इन देशों की ओर से ऑस्ट्रेलिया को अतिरिक्त मदद और सुविधाएं मुहैया करायी गई हैं.

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बहुत अधिक और किस्म किस्म के संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं

इस आग पर काबू पाने के लिए ज़मीनी स्तर पर तो कोशिशें की ही जा रही हैं, साथ ही विमानों और हेलीकॉप्टर की भी मदद ली जा रही है.

न्यू साउथ वेल्स रुरल फ़ायर सर्विस का कहना है कि उनके पास क़रीब 100 एयरक्राफ़्ट हैं और वे नियमित तौर पर इसका इस्तेमाल आग बुझाने के लिए कर रहे हैं. वहीं विक्टोरिया कंट्री फ़ायर अथॉरिटी का कहना है कि उनके पास 60 से अधिक एयरक्राफ़्ट हैं.

इसके अलावा हेलीकॉप्टर, फिक्स्ड विंग एयरक्राफ़्ट और बड़े एयर टैंकर भी इस आग को बुझाने के लिए प्रयोग में लाए जा रहे हैं. इनमें से ज़्यादातर पानी की तेज़ बौछार करने में सक्षम हैं.

कुल मिलाकर पूरे ऑस्ट्रेलिया की बात करें तो क़रीब 500 एयरक्राफ़्ट का प्रयोग किया जा रहा है.

देश के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने विदेशों से किराए पर एयरक्राफ़्ट मंगाने के लिए 14 मिलियन डॉलर देने का वादा भी किया है.

लेकिन यह एक बेहद मुश्किल काम है और इसका अंदाज़ा उस वक़्त हुआ जब पानी की बौछार करने वाला एक हेलीकॉप्टर क्रैश हो गया जब वो री-फिल हो रहा था. हेलीकॉप्टर का पायलट रुरल फ़ायर सर्विस का सदस्य था और किसी प्रकार वो बच गया.

लेकिन ये ख़तरा सिर्फ़ एयरक्राफ़्ट और हेलीकॉप्टर के लिए नहीं है. जो लोग ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे हैं वो भी फ़ायर फाइटिंग ट्रक और 'हेवी-प्लांट' साधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसे बुल्डोज़र और बड़े ट्रक. जगह-जगह मिट्टियों के ढेर लग गए हैं और फ़ायरब्रेक बनाने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जाता है.

न्यू साउथ वेल्स फ़ायर सर्विस का कहना है कि उनके पास ज़मीन पर 750 से अधिक वाहन हैं.

सेना के वायुयान और नेवी के क्रूज़र का इस्तेमाल भी आग को बुझाने के लिए किया जा रहा है.

लेकिन सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री देश की कोयला इंडस्ट्री के बहुत बड़े समर्थक हैं और शायद यही वजह है कि उन्हें इस समय काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने आग को काबू में करने के लिए शुरुआती स्तर पर सार्थक और कारगर प्रयास नहीं किये और इसी वजह से ये आग इतनी विकराल हो गई.

ऑस्ट्रेलिया के बढ़ते तापमान और शुरुआती ढुलमुल रवैये के लिए उन्हें ज़िम्मेदार बताया जा रहा है.

एक ओर जहां ऑस्ट्रेलिया बीते कई महीनों से जल रहा है वहीं देश के प्रधानमंत्री बीते महीने छुट्टियां बिताने हवाई गए हुए थे, इस बात को लेकर भी उनकी आलोचना हो रही है और उन्हें माफ़ी मांगने के लिए कहा जा रहा है.

हालांकि बाद में उन्होंने भी ख़ेद जताया. प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने माना कि वो ज़मीनी स्तर पर कई चीज़ें बेहतर तरीक़े से संभाल सकते थे.

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इससे पहले प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के नज़रिए का बचाव किया था और ये भी माना था कि आग पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है.

प्रधानमंत्री ने कहा, ''हम लंबी, गर्म और सूखी गर्मियों में रह रहे हैं. इस पर साफ़ तौर पर जलवायु में आए व्यापक परिवर्तन का प्रभाव है.''

उन्होंने कार्बन उत्सर्जन को कम करने की योजना पर ज़ोर देते हुआ बताया कि उनकी सरकार अपने लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में है.

पेरिस जलवायु समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया ने साल 2005 के स्तर के मुक़ाबले साल 2030 तक कार्बन का उत्सर्जन 26 से 28 प्रतिशत कम करने की शपथ ली है.

हालांकि, उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक ''वैश्विक समाधान'' की ज़रूरत है.

ऑस्ट्रेलिया में बीते दिन क्लाइमेट चेंज को लेकर एक मार्च भी निकाला गया जिसमें हज़ारों की संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया.

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क्या कहते हैं आंकड़े

आंकड़े दिखाते हैं कि ऑस्ट्रेलिया का तापमान 1910 के बाद से एक डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. ब्यूरो ऑफ मेटिअरोलजी के मुताबिक़ 1950 के बाद से तापमान ज़्यादा गर्म होना शुरू हुआ है.

ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर में दो बार अपने तापमान का रिकॉर्ड तोड़ा था. 17 दिसंबर को औसत अधिकतम तापमान 40.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था. इसके अगले दिन (18 दिसंबर) तापमान 41.9 डिग्री सेल्सियस था. दोनों दिन 2013 के 40.3 डिग्री सेल्सियस तापमान का रिकॉर्ड टूटा था.

दिसंबर के अंत में हर राज्य में 40 डिग्री से ऊपर तापमान दर्ज किया गया था. इसमें तस्मानिया राज्य भी शामिल है जो आमतौर पर अन्य इलाक़ों के मुक़ाबले ठंडा रहता है.

ऑस्ट्रेलिया में गर्मी का मौसम दिसंबर से फ़रवरी तक रहता है. टाइम पत्रिका के अनुसार न्यू साउथ वेल्स का क़रीब 30 फ़ीसदी जंगल जल चुका है. आशंका है कि इस हफ़्ते यह दायरा 50 फ़ीसदी तक जा सकता है. ऑस्ट्रेलिया के मौसम विभाग के अनुसार साल 2019 सबसे गर्म रहा था.

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