ईरान दुनिया भर में और अलग-थलग पड़ता जा रहा

  • 15 जनवरी 2020
ईरान, अमरीका इमेज कॉपीरइट Getty Images

फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों की नाराज़गी की वजह से ईरान परमाणु समझौते को लेकर एक और विवाद खड़ा हो गया है. ताज़ा विवाद इतना गंभीर है कि समझौता पूरी तरह ख़त्म हो सकता है.

तीनों देशों का कहना है कि ईरान ने 2015 के परमाणु समझौते की प्रमुख शर्तों का उल्लंघन किया है और इसलिए वो 'डिस्प्युट मैकेनिज़म' की प्रक्रिया अपनाना चाहते हैं.

साल 2018 में जब राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका को इस समझौते से अलग करके ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए थे तभी से ईरान भी इस समझौते से पीछे हटने लगा था.

इसके बाद ईरान यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर लगी पाबंदियां भी धीरे-धीरे हटाने लगा. 2015 के समझौते की शर्तों के अनुसार ईरान को यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम रोकना था. ये रिएक्टर ईंधन बनाने के लिए इस्तेमाल होता है और इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में भी होता है.

ईरान का कहना है कि अमरीका जब ख़ुद ही समझौते से बाहर हो गया और उस पर नई पाबंदियां लगा दीं तो उसे भी अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर लगी पाबंदियां हटाने का अधिकार है.

अब फ़्रांस, जर्मनी और यूके ईरान की इस दलील मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं. वो इस मामले में 'डिस्प्युट मैकेनिज़म' का सहारा लेना चाहते हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

डिस्प्युट मैकेनिज़्म' क्या है?

ईरान परमाणु समझौते के अनुच्छेद-36 में कहा गया है कि किसी विवाद कि स्थिति में मसला एक संयुक्त समिति के पास ले जाया जा सकता है जो कम से कम 15 दिनों में मसले का समाधान ढूंढेगी.

अनुच्छेद-36 में ये भी कहा गया कि अगर शिकायकर्ता समिति के फ़ैसले से संतुष्ट नहीं है तो वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (यूएनएससी) का दरवाज़ा खटखटा सकता है. ऐसे में सुरक्षा परिषद् हटाए गए समझौते के तहत किसी पाबंदी को दोबारा लगाने के लिए वोट कर सकता है.

इस पूरी प्रक्रिया को 'डिस्प्युट मैकेनिज़म' कहा जाता है.

ईरान यूरोपीय देशों पर इस प्रक्रिया का दुरुपयोग का आरोप लगा रहा है.

ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने कहा, "डिस्प्युट मैकेनिज़म का इस्तेमाल पूरी तरह से निराधार है. राजनीतिक नज़रिए से देखा जाए तो यह एक रणनीतिक ग़लती है."

हालांकि विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि ईरान अंतरराष्ट्रीय समझौते को बरक़रार रखने के लिए उचित प्रयास करने को तैयार है और इस बारे में किसी भी व्यावहारिक पहल का स्वागत करेगा.

इधर, रूस ने भी यूरोपीय देशों की प्रतिक्रिया की आलोचना की है और कहा है कि इससे समझौते को दोबारा लागू करना नामुमकिन हो जाएगा.

रूसी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रूसी विदेश मंत्रालय के एक बयान में यूरोपीय देशों के क़दम को 'बेहद निराशाजनक और चिंताजनक' बताया गया है.

ये भी पढ़ें: क्या ईरान की सेना 'बदला' लेने की हालत में है?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बीबीसी रक्षा संवाददाता जोनाथन मार्कस का विश्लेषण

समझौते और संधियों में आम तौर पर 'डिसप्युट मैकेनिज़म' का प्रावधान इसलिए दिया जाता है ताकि अगर किसी एक पक्ष को लगे कि दूसरा पक्ष समझौते की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है तो वो उसे चुनौती दे सके. लेकिन ईरान परमाणु समझौते का मामला ऐसा नहीं है.

अमरीका पहले ही इस समझौते से अलग हो चुका है और ईरान पर आर्थिक पाबंदियां भी लगा चुका है. इसके जवाब में ईरान भी समझौते के तहत किए गए अपने कई वादों से मुकर चुका है. इसलिए ये समझौता अभी अस्तित्व में तो है लेकिन एक तरह से टूट भी चुका है. ऐसा इसलिए क्योंकि समझौते के दो सबसे बड़े पक्ष यानी अमरीका और ईरान इससे दूर हो चुके हैं.

'डिस्प्यूट मैकेनिज़म' की ओर बढ़कर यूरोपीय देश इस समझौते को पूरी तरह ख़त्म करने का पहला औपचारिक क़दम उठा रहे हैं.

तीनों यूरोपीय देशों का कहना है कि वो समझौते के पक्ष में हैं लेकिन वो एक 'बेहतर डील' भी चाहते हैं. एक ऐसी डील, अमरीका भी जिसके पक्ष में हो. लेकिन इसके आसार बहुत कम हैं कि ईरान अब और ज़्यादा कड़ी पाबंदियों वाले समझौते को स्वीकार करेगा.

ख़ासकर, ईरान ऐसे समझौते को बिल्कुल स्वीकार नहीं करेगा जिसमें उसके मिसाइल कार्यक्रमों और क्षेत्रीय संघर्ष में हिस्सा लेने पर पाबंदियां हों.

दूसरी तरफ़, इस बात के आसार भी उतने ही कम हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटाएंगे. ऐसी स्थिति में यूरोपीय देशों के ताजा रुख़ को देखकर स्पष्ट है कि ईरान परमाणु समझौता अपनी आख़िरी सांसें गिन रहा है.

ये भी पढ़ें: सुलेमानी को मार ईरान को फ़ायदा तो नहीं पहुंचा गए ट्रंप?

इमेज कॉपीरइट EPA

ऐसे बिखरता गया ईरान परमाणु समझौता

सबसे पहले मई 2018 में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने समझौते को रद्द करते हुए प्रतिबंध लगाए. ट्रंप चाहते थे कि ईरान के साथ नया समझौता हो, जिसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय संघर्ष में उसकी भागीदारी रोकने की बात हो.

ईरान ने इससे इनकार किया लेकिन इससे ईरान की मुद्रा स्फ़ीति बढ़ गई और उसकी मुद्रा कमज़ोर होती गई.

मई 2019 में जब प्रतिबंधों को कड़ा किया गया तो ईरान ने भी समझौते में किए गए वादों से मुकरना शुरू कर दिया. ट्रंप के शासनकाल में ईरान और अमरीका के बीच रिश्तों में दरार बढ़ गई. जनवरी 2020 में ये समझौता पूरी तरह टूट गया.

अमरीका ने ईरान के शीर्ष सैनिक कमांडर क़ासिम सुलेमानी को बग़दाद हवाई अड्डे के बाहर हवाई हमले में मार दिया. इसके दो दिन बाद पांच जनवरी को ईरान ने परमाणु समझौते से अपने को पूरी तरह अलग कर लिया.

ईरान ने घोषणा की है कि अब वो समझौते में लगाई गई किसी भी पाबंदी को नहीं मानेगा और उनमें यूरेनियम संवर्धन को कम करना भी शामिल है.

ये भी पढ़ें: ईरान-अमरीका के बीच सुलह करवा पाएंगे इमरान?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ईरान परमाणु समझौता क्या है?

ईरान हमेशा से इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है लेकिन संदेह ये था कि ये परमाणु बम विकसित करने का कार्यक्रम था. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अमरीका और यूरोपीय संघ ने 2010 में ईरान पर पाबंदी लगा दी.

वर्ष 2015 में ईरान का छह देशों के साथ एक समझौता हुआ. ये छह देश थे: अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, रूस और जर्मनी. इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रमों को सीमित किया, बदले में उसे पाबंदी से राहत मिली.

समझौते के तहत ईरान को यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम रोकना पड़ा था.

अमरीका और ईरान के बीच संकट क्यों क़ायम है, 5 कारण

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार