अमरीका बनाम ईरान: पाकिस्तान किसका साथ देगा?

  • 16 जनवरी 2020
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पाकिस्तान ने अमरीका और ईरान के बीच चल रहे तनाव को ख़त्म कराने के लिए सुलह की कोशिश औपचारिक रूप से शुरू कर दी है और इस सिलसिले में विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी की यूएन के सेक्रेटरी जनरल और अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो समेत दूसरे बड़े नेताओं से मुलाक़ात की उम्मीद है.

इन कोशिशों के पहले पड़ाव में पाकिस्तानी विदेश मंत्री रविवार को एक विशिष्ट मंडल के साथ ईरान पहुंचे और ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ और राष्ट्रपति हसन रूहानी से मुलाक़ात की. इसके बाद उन्होंने सऊदी अरब का भी दौरा किया.

पाकिस्तान की तरफ से तनाव को कम करने के लिए कोशिशें तो जारी हैं लेकिन पाकिस्तान किस के कहने पर सुलह की भूमिका निभा रहा है और क्या पाकिस्तान, ईरान और अमरीका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की स्थिति में है भी या नहीं?

और पाकिस्तान की पृष्ठभूमि में सबसे अहम सवाल यह है कि इस विवाद में पाकिस्तान आख़िर कब तक तटस्थ रह सकता है?

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पाकिस्तान की सुलह की कोशिशें

ईरान में पाकिस्तान के राजदूत रहे आसिफ दुर्रानी का कहना है कि पाकिस्तान ने ईरान और अमरीका के बीच औपचारिक रूप से मध्यस्ता का किरदार नहीं अपनाया बल्कि पाकिस्तान की सुलह कराने की कोशिशें उसकी अपनी सुरक्षा नीतियों को मद्देनज़र रखते हुए हैं.

आसिफ़ दुर्रानी कहते हैं कि पड़ोसी देश होने के नाते ईरान में होने वाले किसी भी फौजी विवाद का असर पाकिस्तान पर सीधे तौर पर पड़ेगा इसलिए पाकिस्तान यह मध्यस्था की कोशिश किसी के कहने पर नहीं कर रहा बल्कि इस इलाक़े की सुरक्षा से जुड़ी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कर रहा है.

आसिफ़ दुर्रानी का मानना है कि जहां तक विवाद को हल कराने में पाकिस्तान के बूते की बात है तो इस समय अमरीका, ईरान और सऊदी अरब समेत कोई भी देश इस स्थिति में नहीं हैं कि वह अकेले इस तनाव को कम कर सकें.

उनका कहना है कि इस विवाद को वही देश सुलझाने में मदद दे सकता है जो इस विवाद में पार्टी ना हो.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और इससे पहले पाकिस्तान फौज के प्रवक्ता अमरीका ईरान विवाद में तटस्थ रहने की पॉलिसी का एलान कर चुके हैं लेकिन आख़िर पाकिस्तान कब तक अपनी तटस्थता को क़ायम रख सकेगा?

आसिफ़ दुर्रानी के अनुसार पाकिस्तान वर्तमान स्थिति में एक ऐसे पक्ष की भूमिका निभा सकता है जो तटस्थ हो लेकिन आने वाले समय में क्या होगा यह उस समय के हालात पर निर्भर करता है.

वो कहते हैं कि अगर ईरान, अमरीका तनाव बढ़ कर जंग का रूप लेता है और अमरीका, ईरान पर फौजी हमला करता है तो पाकिस्तान को हर्गिज़ अमरीका का साथ देने से परहेज़ करना होगा.

लेकिन अगर अमरीकी फौज विवाद में पाकिस्तान की भूमिका का इतिहास देखें तो पता चलता है कि पाकिस्तान ने लगभग हर बार ही अमरीकी ख़ेमे में जाने में ही भलाई समझी है.

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अमरीकी विवाद में पाकिस्तान की भूमिका

इतिहासकार-विश्लेषक, अमरीका और पाकिस्तान के संबंध को 'मैरिज ऑफ कन्वीनियंस' यानी राजनीति और आर्थिक फ़ायदे के लिए की जाने वाली शादी का नाम देते हैं क्योंकि दोनों देशों ने सोवियत यूनियन और तालिबान जैसे चैलेंज का मिलकर मुक़ाबला तो किया लेकिन अपने अपने फ़ायदे के अनुसार.

शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने पक्ष न बनने के इरादे से नॉन एलाइनमेंट मूवमेंट के शुरुआती दौर में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन जहां कम्युनिस्ट झुकाव रखने वाले भारत, क्यूबा और युगोस्लाविया जैसे देश इसका हिस्सा बन गए वहीं पाकिस्तान अपनी तटस्थता को छोड़कर अमरीकी गुट में शामिल हो गया.

लेकिन जब पाकिस्तान की तरफ से अमरीकी मदद को कथित तौर पर भारत के ख़िलाफ़ 1965 की जंग में इस्तेमाल किया गया तो अमरीका को यह बात ज्यादा पसंद नहीं आई और उसने पाकिस्तान पर पाबंदियां लगा दीं जो अमरीका-पाकिस्तान संबंध में पहली दरार साबित हुई.

दोनों देशों के संबंध कुछ साल यूं ही ठंडे रहे और 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति के नतीजे में अमरीका समर्थित शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की सरकार का ख़ात्मा और अफ़गानिस्तान पर सोवियत फौज की चढ़ाई ने अमरीका-पाकिस्तान संबंध की गर्मजोशी को एक बार फिर बहाल कर दिया.

पाकिस्तान पर लगाई गई अमरीकी पाबंदी उठा ली गई और एकबार फिर पाकिस्तान को अमरीकी मदद मिलनी शुरू हो गई.

अमरीका और पाकिस्तान ने अफ़गान मुजाहिदीन की मदद से सोवियत यूनियन को 10 साल के बाद आख़िरकार हरा दिया लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तान और अमरीका की नज़दीकी भी ख़त्म हो गई और अमरीका ने पाकिस्तान पर उसकी दी गई मदद से एटमी प्रोग्राम को आगे बढ़ाने का इल्ज़ाम लगाते हुए एक बार फिर पाबंदियां लगा दी.

लेकिन 2001 में 9/11 हमलों के बाद जब अमरीका ने ओसामा बिन लादेन के पीछे अफ़गानिस्तान फौज भेजने का सोचा तो एक बार फिर पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतरी की तरफ आए और पाकिस्तान एक बार फिर अमरीका का सहयोगी बन गया.

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पाकिस्तान ईरान अमरीका विवाद में अब तटस्थ क्यों रहना चाहता है?

पूर्व में अमरीका के फौजी विवाद में उसका नज़दीकी सहयोगी रहने वाला देश पाकिस्तान, ईरान-अमरीका विवाद में तटस्थ रहने पर क्यों जोर दे रहा है?

जॉर्ज मैसन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन के प्रोफ़ेसर अहसन बट का मानना है कि पाकिस्तान के इस विवाद में तटस्थ रहने के पीछे सबसे बड़ी वजह उसकी आंतरिक स्थिति है.

पाकिस्तान में 20 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी का संबंध शिया समुदाय से है, जो बड़ी तादाद में ईरान से धार्मिक कारणों से नज़दीकी रखती है और पाकिस्तानी फौज हर्गिज़ ये नहीं चाहेगी कि उसमें समुदाय की बुनियाद पर मतभेद पैदा हो.

अहसन बट के अनुसार पाकिस्तान की तटस्थ पोज़ीशन लेने के पीछे एक और बड़ी वजह अमरीका-अफ़गान जंग में पाकिस्तान का बड़ा नुकसान है और पाकिस्तान अपने पड़ोसी देश की जंग को इतनी जल्दी बर्दाश्त नहीं कर सकता जबकि अफ़गान जंग अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई है.

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क्या पाकिस्तान अमरीकी जंग में तटस्थ रह सकता है?

अगर पाकिस्तान की विदेश नीति का रिकॉर्ड देखा जाए तो पाकिस्तान ने अक्सर शुरुआत में अमरीकी विवाद में तटस्थ रहने की कोशिश की है.

लेकिन अमरीकी दबाव, ख़राब आर्थिक स्थिति और भारत के साथ संबंध के कारण आख़िरकार पाकिस्तान ने अमरीका का सहयोगी बनने में ही भलाई समझी जिसका ताज़ा उदाहरण 2001 की अफ़गान जंग भी है.

लेकिन ब्रोकिंगज़ इंस्टीट्यूट में रिसर्च फेलो मदीहा अफ़ज़ल का मानना है कि अमरीका-अफ़गान जंग के समय की तुलना ईरान-अमरीका विवाद से नहीं की जा सकती.

अमरीका अफ़गान जंग में पाकिस्तान का तटस्थ रहना इसलिए मुश्किल था क्योंकि वह उस विवाद में ना चाहते हुए भी एक पक्ष था.

सिर्फ़ इसलिए नहीं क्योंकि अफ़गानिस्तान पाकिस्तान का पड़ोसी मुल्क था बल्कि इसलिए कि वो जंग पाकिस्तान में फैल गई थी.

मदीहा अफ़ज़ल के अनुसार अगर अमरीका-ईरान तनाव जंग का रूप लेती भी है तो यह उस तरह पाकिस्तान नहीं पहुंचेगी जिस तरह अफ़गान जंग ने पाकिस्तान को अपनी लपेट में ले लिया था.

अहसन बट और मदीहा दोनों के अनुसार मौजूदा हालात में पाकिस्तान तटस्थ रह सकता है और तनाव को कम करवाने में किरदार भी अदा कर सकता है लेकिन जैसे-जैसे अमरीका ईरान तनाव में इज़ाफ़ा होगा और ये जंग का रूप लेगा पाकिस्तान के लिए तटस्थ रहना मुश्किल हो जाएगा.

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अमरीका-ईरान जंग में पाकिस्तान किसको चुनेगा?

पाकिस्तान के मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अमरीकी जंगों में पाकिस्तान के दख़ल के सख्त मुख़ालिफ रहे हैं. उन्होंने हमेशा पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को अफ़गानिस्तान में अमरीकी जंग में पाकिस्तान को शामिल करने की नीति की आलोचना की है.

लेकिन आज जब वो खुद प्रधानमंत्री हैं तो क्या वो देश को अमरीका और ईरान विवाद से दूर रख पाएंगे?

पाकिस्तान के इतिहास पर गहरी नज़र रखने वाले डॉक्टर हामिद हुसैन के अनुसार पाकिस्तान इस विवाद में कितना हस्तक्षेप करेगा इसका फैसला प्रधानमंत्री से ज्यादा पाकिस्तान फौज करेगी.

डॉ हामिद हुसैन के अनुसार दबाव पड़ने की सूरत में पाकिस्तान अपनी तटस्थता की पॉलिसी भी तब्दील कर सकता है और उसका ताज़ा उदाहरण कुआलालंपुर बैठक से पाकिस्तान का सऊदी अरब की तरफ से कथित दबाव के बाद पीछे हटना है.

डॉ हामिद हुसैन के अनुसार पाकिस्तान सरकार ने जब यमन जंग में तटस्थ रहने का फैसला किया था तब हालात अलग थे क्योंकि उस वक्त पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर नहीं थी जितनी आज है. इसलिए अगर पाकिस्तान पर अमरीका की तरफ से इस किस्म का दबाव डाला गया जो 2001 में अफगान जंग के समय डाला गया था तो पाकिस्तान बर्दाश्त नहीं कर पाएगा.

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लेकिन ईरान के साथ विवाद में अमरीका, पाकिस्तान पर उतना दबाव नहीं डालेगा क्योंकि अमरीका के पास सऊदी अरब, इसराइल और खाड़ी देशों जैसे और बहुत सहयोगी हैं.

मदीहा अफज़ल और हामिद हुसैन दोनों का मानना है कि अगर अमरीका या ईरान में से किसी एक को चुनने की नौबत आए तो पाकिस्तान निश्चित तौर पर अमरीका का साथ देगा क्योंकि बेशक पाकिस्तान और ईरान के बीच संबंध शांतिप्रिय रहे हैं लेकिन ईरान, सऊदी अरब विवाद में पाकिस्तान ने हमेशा सऊदी अरब को प्राथमिकता दी है और ईरान अमरीका विवाद में भी पाकिस्तान ने अमरिका के साथ खड़ा होना बेहतर समझा है.

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