हाफ़िज़ सईद को पाकिस्तान में मिली सज़ा का क्या FATF की बैठक से कोई कनेक्शन है?

  • 13 फरवरी 2020
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पाकिस्तान में मुंबई हमलों के प्रमुख साज़िशकर्ता बताए जाने वाले जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद को बुधवार को प्रतिबंधित संगठन से जुड़ाव और 'आतंकवाद' के लिए ग़ैर-क़ानूनी फ़ंडिंग के दो अलग-अलग मामलों में साढ़े पाँच साल जेल की अलग-अलग सज़ा सुनाई गई है.

जेल की सज़ा के अलावा अदालत ने उन पर 15 हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगाया है.

लाहौर स्थित आतंकवाद-विरोधी अदालत ने लाहौर और गुजरांवाला में दायर दो अलग मामलों में अलग-अलग सज़ा सुनाई.

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि यह फ़ैसला पेरिस में होने वाली फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) की बैठक से चार दिन पहले आया है. पाकिस्तान ख़ुद पर आर्थिक प्रतिबंध लगने से बचने की भरपूर कोशिश कर रहा है और इस फ़ैसले को इसी बैठक की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है.

क्या हैं वो मामले जिनमें हुई सज़ा

हाफ़िज़ मोहम्मद सईद और उनके साथी ज़फ़र इक़बाल को 'आतंकवाद' के लिए पैसा जुटाने, ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से फंड जुटाना और प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने के आरोपों में दोषी ठहराया गया.

जज अरशद हुसैन भट्ट ने हाफ़िज़ सईद को एंटी टेररिज्म सेक्शन XII और 11N के तहत सज़ा सुनाई. क़ानूनी जानकारों के मुताबिक़, एंटी टेररिज़्म एक्ट के आर्टिकल X में प्रतिबंधित संगठन से जुड़े होने पर सज़ा का प्रावधान है.

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पाकिस्तानी पंजाब के काउंटर टेररिज़्म डिपार्टमेंट (CTD) ने बड़े स्तर पर जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-तैय्यबा और वेलफ़ेयर ह्यूमनिटी फ़ाउंडेशन की जांच शुरू की थी.

सीटीडी के मुताबिक़, इन संगठनों ने आतंकवाद के लिए ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से जुटाए गए पैसों से ज़मीन ख़रीदी और यहां मदरसे और मस्जिद बनाकर इनका इस्तेमाल और पैसे जुटाने के लिए किया.

सीटीडी ने यह भी पाया कि इन संगठनों ने अलग-अलग एनजीओ और दूसरे वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन के नाम पर पैसे जुटाए.

एंटी टेररिज़्म डिपार्टमेंट के मुताबिक़, हाफ़िज़ सईद और 12 अन्य के ख़िलाफ़ ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से पैसे जुटाने और आतंकवाद के लिए इस्तेमाल करने और एंटी टेररिज्म एक्ट 1997 के तहत ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से पैसे जुटाने के आरोप में भी कार्रवाई की जा रही है और उन्हें अदालत में पेश किया जाएगा.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने जनवरी 2015 में घोषणा की थी कि सभी चरमपंथी संगठनों, जिनमें जमात-उद-दावा भी शामिल है, की संपत्तियों को फ्रीज कर दिया गया है.

पाकिस्तान ने साल 2015 में जमात उद दावा पर प्रतिबंध लगा दिया था. हाफ़िज़ सईद जमात उद दावा के प्रमुख हैं. किसी भी प्रतिबंधित संगठन से जुड़ाव ग़ैर-क़ानूनी है और इसी मामले में हाफ़िज़ सईद को दोषी ठहराते हुए साढ़े पाँच साल की सज़ा सुनाई गई है.

वहीं दूसरा मामला 'आतंकवाद' के लिए ग़ैर-क़ानूनी फ़ंडिंग का है. यह फंडिंग भी जमात उद दावा और दूसरे संगठनों के ज़रिए ही की जा रही थी. इस मामले में भी हाफ़िज़ सईद को साढ़े पाँच साल की सज़ा दी गई है.

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एफ़एटीएफ़ में फ़ायदा होगा?

बीबीसी उर्दू संवाददाता आसिफ़ फ़ारूक़ी के मुताबिक़, यह फ़ैसला एफ़एटीएफ़ में पाकिस्तान के लिए मददगार साबित हो सकता है.

उन्होंने कहा, ''पिछली बैठक में एफ़एटीएफ़ का कहना था कि पाकिस्तान कार्रवाई भले ही दिखा रहा हो लेकिन चरमपंथ के मामलों में उसने किसी को सज़ा नहीं दी, ऐसे में यह मामला एक नज़ीर की तरह पेश किया जा सकता है कि हमने इतने बड़े शख़्स को दोषी ठहराया है और सज़ा भी दी है. इसका लाभ भी उसे मिल सकता है. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि एफ़एटीएफ़ की वजह से ही यह फ़ैसला लिया गया है. यह अदालती कार्रवाई है और उसी के तहत फ़ैसला आया है.''

हालांकि इस्लामाबाद से वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद कहते हैं कि यह सब कुछ एफ़एटीएफ़ के दबाव में ही किया गया है. क्योंकि इसके पहले भी कई बार हाफ़िज़ सईद और दूसरे लोगों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज हुए और अदालतों में भी गए लेकिन सबूत ना होने का हवाला देकर उन्हें छोड़ दिया जाता था.

वो कहते हैं, ''अब अचानक से सबूत कहां से आ गए, यह सवाल उठ रहा है और अब सरकार को इसका जवाब देना है. लगता यही है कि एफ़एटीएफ़ के दबाव में ही सरकार ये क़दम उठा रही है क्योंकि इस तरह के क़रीब 600-700 मामले हैं जिनमें मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के लिए फंड जुटाने के आरोप हैं, उनमें से यह पहला बड़ा मुक़दमा है जिसमें सज़ा हुई है और एफ़एटीएफ़ वाले इनसे जवाब भी मांग रहे थे कि इन मामलों में ना सुनवाई हो रही ना ही सज़ा हो रही, तो प्रक्रिया सुधारी जाए.''

हालांकि वो मानते हैं कि इस सज़ा से हाफ़िज़ सईद की ज़िंदगी में कुछ ख़ास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वो पहले भी गिरफ़्तार होकर जेल में रहे हैं और सार्वजनिक जीवन से बाहर रहते थे लेकिन एफ़एटीएफ़ में इसका फ़ायदा पाकिस्तान को ज़रूर मिलेगा और शायद वो ग्रे लिस्ट से बाहर निकल जाए.

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कैसे-कैसे आगे बढ़ा केस

संयुक्त राष्ट्र से घोषित 'आतंकवादी' हाफ़िज़ सईद को बीते साल 17 जुलाई को गिरफ़्तार किया गया था. 70 साल के सईद को पाकिस्तान के कोट लखपत की हाई सिक्योरिटी जेल में रखा गया है. हाफ़िज़ सईद पर साल 2008 में मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों की योजना बनाने का आरोप है.

प्रतिबंधित संगठन जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद और उनके साथी ज़फ़र इक़बाल पर 'आतंकवाद के लिए माली मदद' यानी ग़ैर-क़ानूनी फ़ंडिंग करने का आरोप है. हाफ़िज़ सईद और उनके संगठन के सहयोगियों को दिसंबर 2019 में दोषी ठहराया गया था. हालांकि वो ख़ुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय दबाव में की गई कार्रवाई मानते हैं.

हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ ग़ैर-क़ानूनी फ़ंडिंग के आरोप में दो अलग-अलग मुक़दमों पर पाकिस्तानी पंजाब की राजधानी लाहौर में स्थित आतंकवाद निरोधक अदालत ने छह फ़रवरी को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

पंजाब पुलिस के एक उप विभाग 'काउंटर टेररिज़्म डिपार्टमेंट' ने पिछले साल 17 जुलाई को हाफ़िज़ मोहम्मद सईद और उनके संगठन के नेता ज़फ़र इक़बाल को पंजाब के शहर गुजरांवाला से गिरफ़्तार किया था.

मुक़दमों पर शुरुआती सुनवाई गुजरांवाला की विशेष आतंकवाद निरोधक अदालत में हुई. लेकिन लाहौर हाईकोर्ट ने हाफ़िज़ मोहम्मद सईद की अर्ज़ी पर उनके ख़िलाफ़ मुक़दमों को लाहौर की विशेष आतंकवाद निरोधक' अदालत में ट्रांसफ़र कर दिया.

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क्या पाकिस्तान का दिखावा है ये सज़ा?

हाफ़िज़ सईद को दोषी घोषित करने और सज़ा देने के फ़ैसले पर रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल सवाल उठाते हैं. समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की अदालत और वहां की सरकार बहुत बड़ा झूठ फैला रही है. यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि चार दिन बाद एफ़एटीएफ़ की बैठक होने वाली है और पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से ब्लैकलिस्ट में नहीं जाना चाहता.

उन्होंने कहा, ''वो दुनिया को यह जताना चाहते हैं कि पाकिस्तान उन लोगों पर सख़्त कार्रवाई कर रहा है जो 'आतंकवाद', मनी लॉन्ड्रिंग और ग़ैर-क़ानूनी फ़ंडिंग करने में लिप्त हैं. लेकिन अगर आप चार्जशीट पर ग़ौर करें तो पाएंगे कि उसमें कहीं भी ज़िक्र नहीं है कि हाफ़िज़ सईद 'आतंकवादी' गतिविधियों में शामिल हैं. उसे सिर्फ़ 'आतंकवाद' के लिए फंडिंग करने के आरोप में सज़ा दी गई है. दुनिया चाहती है कि हाफ़िज़ सईद को सामने लाया जाए और उन्हें मुंबई हमलों में मारे गए लोगों की हत्या के आरोप में सज़ा दी जानी चाहिए लेकिन पाकिस्तान इससे दूर भाग रहा है.''

पीके सहगल कहते हैं कि यह सब दिखावा है. एक बार पाकिस्तान ब्लैकलिस्ट होने से बच जाएगा तो फिर वो हाफ़िज़ की जमकर ख़ातिरदारी करेगा. भले ही वो जेल में रहे लेकिन उसे सारी सुविधाएं वैसी ही मिलेंगी जैसे वो बाहर उठा रहे थे और उन्हें हर चीज़ मुहैया कराई जाएगी.

चार अन्य मामलों पर भी कार्यवाही जारी

हाफ़िज़ मोहम्मद सईद को आतंकवाद निरोधक अदालत में पेश किया जाता रहा. पिछले साल 11 दिसंबर को अदालत ने उनपर आरोप तय किए, जिसके बाद नियमित सुनवाई शुरू हुई.

आतंकवाद निरोधक अदालत ने हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ अदालती मुक़दमों में गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए और कार्रवाई पूरी होने पर फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

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हाफ़िज़ मोहम्मद सईद और उनके प्रतिबंधित संगठन के नेताओं के ख़िलाफ़ पंजाब भर में क़रीब दो दर्जन मुक़दमे दर्ज हैं.

उधर, हाफ़िज़ सईद और उनके प्रतिबंधित संगठन के प्रोफ़ेसर अब्दुल रहमान मक्की समेत पाँच अहम नेताओं के ख़िलाफ़ चार और मुक़दमों पर भी आतंकवाद निरोधक अदालत ने कार्रवाई शुरू की हुई है.

क्या है एफ़एटीएफ़

फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसकी स्थापना G7 देशों की पहल पर 1989 में की गई थी. संस्था का मुख्यालय पेरिस में है, जो दुनिया भर में हो रही मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए नीतियां बनाता है.

साल 2001 में इसने अपनी नीतियों में चरमपंथ के वित्तपोषण को भी शामिल किया था. संस्था अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली को सही रखने के लिए नीतियां बनाता है और उसे लागू करवाने की दिशा में काम करता है.

इसके कुल 38 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत, अमरीका, रूस, ब्रिटेन, चीन भी शामिल हैं.

जून 2018 से पाकिस्तान दुनिया भर के मनी लॉन्ड्रिंग पर नज़र रखने वाले संस्थाओं के रेडार पर है. पाकिस्तान इन संस्थाओं के निशाने पर तब आया जब उसे चरमपंथियों को फंड करने और मनी लॉन्ड्रिंग के ख़तरे को देखते हुए 'ग्रे लिस्ट' में डाल दिया गया था. ग्रे लिस्ट में सर्बिया, श्रीलंका, सीरिया, त्रिनिदाद, ट्यूनीशिया और यमन भी हैं.

इससे पहले पाकिस्तान साल 2011 में भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर चुका है. उस वक़्त भी इसे ग्रे लिस्ट में डाल दिया गया था. इसके बाद साल 2015 में पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से तभी बाहर आ पाया जब इसने सफलतापूर्वक ऐक्शन प्लान लागू किया.

इस लिस्ट में आने से पाकिस्तान को हर साल लगभग 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है.

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पिछली बैठक में क्या हुआ था?

एफ़एटीएफ़ की पिछली बैठक में अध्यक्ष ज़ियांग मन लिउ ने कहा था कि पाकिस्तान को जो लक्ष्य पूरा करना था वो उसे हासिल करने में वो असफल रहा है. पाकिस्तान में नई सरकार बनने के बाद मनी लॉन्ड्रिंग और दहशतगर्दों को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकने के मामले में प्रगति हुई है जो स्वागत योग्य है लेकिन अभी भी पाकिस्तान को और बहुत कुछ करने की ज़रूरत है.

एफ़एटीएफ़ ने इसके लिए पाकिस्तान को फ़रवरी 2020 तक का समय दिया था.

एफ़एटीएफ़ ने एक बयान जारी कर कहा कि अगर फ़रवरी 2020 तक पाकिस्तान ने इस मामले में पर्याप्त क़दम नहीं उठाएगा तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की.

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