महातिर मोहम्मद से भारत की नाराज़गी की मार झेलते भारतीय मूल के मलेशियाई

  • 20 फरवरी 2020
महातिर मोहम्मद और नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट AFP/getty

वीके रेगु भारतीय मूल के मलेशियाई कारोबारी हैं मगर यही उनकी इकलौती पहचान नहीं है.

वह मलेशिया में वर्ल्ड हिंदू काउंसिल के नेता हैं और एक प्राचीन मंदिर के अध्यक्ष भी हैं, इस मंदिर पर 2018 में हमला हो चुका है. रेगु विवादित इस्लामिक उपदेशक ज़ाकिर नाइक को भारत भेजे जाने के लिए मलेशियाई सरकार पर दबाव डालने के अभियान भी चलाते हैं.

लेकिन फिर भी, सबसे ज़्यादा उन्हें भारतीय मूल के एक प्रभावी कारोबारी के तौर पर जाना जाता है जिसके निर्यात किए गए उत्पाद उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश तक पहुंचते हैं.

पिछले दिनों वीके रेगु की कंपनी को भारत से क़रीब दो अरब रिंगिट (एक मलेशियाई रिंगिट 17 भारतीय रुपये के बराबर होता है) के पाम ऑयल का ऑर्डर भारत से मिला था. रेगु इससे ख़ासे ख़ुश थे.

उन्होंने बताया, "भारतीय मूल के एक आदमी के लिए इतना बड़ा निर्यात ऑर्डर हासिल करना बड़ी बात थी क्योंकि इस कारोबार में चीनी और मलेशियाई कारोबारियों का प्रभुत्व है."

रेगु अपना भविष्य ताड़ से बनने वाले तेल की इंडस्ट्री में ही देख रहे थे लेकिन उनके सपने को बड़ा झटका तब लगा जब भारत ने मलेशिया से पाम ऑयल का आयात घटा दिया. रेगु को मिला ऑर्डर भी रद्द हो गया.

वे बताते हैं, "पाम ऑयल के आयात पर पाबंदी भारत सरकार ने नहीं लगाई है लेकिन निजी कंपनियों ने मलेशिया से ताड़ के तेल को मंगाना बंद कर दिया है. इसके बदले में इंडोनेशिया से ताड़ का तेल मंगा रहे हैं."

Image caption वीके रेगु

वैसे ताड़ के तेल का निर्यात भारतीय मूल के ढेर सारे लोगों के लिए यहां लाइफ़लाइन जैसा है. बीते साल मलेशिया ने भारत को 4.4 मिलियन टन पाम ऑयल निर्यात किया था. मलेशिया पाम ऑयल का जितना निर्यात करता है, उसका एक तिहाई हिस्सा भारत ने मंगाया था. इस लिहाज़ से देखें तो मलेशियाई पाम ऑयल का सबसे बड़ा उपभोक्ता भारत है.

माना जा रहा है कि भारत की ओर से पाम ऑयल के आयात पर ग़ैर-आधिकारिक ढंग से लगाई गई रोक मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद को सख़्त संदेश देने की कोशिश है. लेकिन इसकी ज़्यादा मार मलेशिया में रह रहे भारतीय मूल के लोगों पर पड़ रही है.

जीवा नाम के एक शख़्स, जो कि भारतीय मूल के हैं, तेल के एस्टेट में मज़दूरी करते हैं.

उन्होंने बताया, "मलेशियाई ताड़ के तेल पर भारत की पाबंदी का हम सब बुरा असर पड़ा है. हम संकट में आ गए हैं. हम ये मज़दूरी छोड़ना चाहते हैं लेकिन मालूम नहीं है कि दूसरा कौन सा काम कर पाएंगे. हम कहीं जा भी नहीं सकते. हमारा भविष्य अनिश्चित दिख रहा है."

यह स्थिति कैसे उत्पन्न हुई?

94 साल के महातिर मोहम्मद मलेशिया के प्रधानमंत्री हैं. उन्हें आधुनिक मलेशिया का निर्माता माना जाता है. वे अपनी मुखरता के लिए जाने जाते हैं.

उन्होंने बीते साल कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी बनाए जाने वाले मोदी सरकार के फ़ैसले की आलोचना कर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नाराज़ कर दिया था. महातिर मोहम्मद ने इस फ़ैसले को कश्मीर पर भारत के आक्रमण जैसा बताया था.

इसके बाद उन्होंने भारत सरकार के नागरिकता संशोधन क़ानून की आलोचना भी की, जिससे भारतीय प्रधानमंत्री और ज़्यादा नाराज़ हुए.

भारत ने मताहिर मोहम्मद के बयानों पर प्रतिरोध जताया इसके बाद भी मलेशियाई प्रधानमंत्री ने एक बार फिर से कश्मीर और नागरिकता संशोधन क़ानून पर अपने विचार दोहरा दिए.

भारतीय मूल के राजनेता कनन्न रामासामी की मीरा पार्टी महातिर सरकार का समर्थन करती है. लेकिन प्रधानमंत्री के बयान को रामासामी ग़ैर ज़रूरी बताते हैं. उनके मुताबिक़, इसी वजह पाम ऑयल इंडस्ट्री में संकट की स्थिति पैदा हुई.

वहीं रेगु मोदी सरकार के रुख़ को ग़लत नहीं बताते मगर गुहार लगाते हैं कि पाम ऑयल के आयात में कमी लाने की जगह कोई और तरीक़ा खोजा जाए.

वे कहते हैं, "भारत की ओर से पाम ऑयल के निर्यात पर लगी अनाधिकारिक रोक के कारण ऊपर ने नीचे तक, मज़दूर से निर्यातक तक भारतीय मूल के हज़ारों लोग संकट में हैं. मैं मोदी जी से गुहार लगाता हूं कि पाम ऑयल इंडस्ट्री को बख्श दें और मलेशिया के प्रति नाराज़गी जताने के लिए कोई दूसरा रास्ता निकालें."

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मलेशियाई प्रधानमंत्री ने ऐसे बयान क्यों दिए?

मलेशिया के एक न्यूज़ पोर्टल के एडिटर-इन-चीफ़ अब्दार रहमान खोया के मुताबिक़, महातिर मोहम्मद हमेशा से मुखर और बड़बोले रहे हैं.

खोया कहते हैं, "वे विभिन्न मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे हैं, ये देखते हुए हम बड़े हुए हैं. चाहे वो मुद्दा कितना ही संवेदनशील क्यों न हो लेकिन वे बोलते हैं. मलेशियाई प्रधानमंत्री किसी बात को दृढ़ विश्वास से कहते हैं और उस पर कायम रहते हैं."

2018 तक मलेशिया के जूनियर विदेश मंत्री रहे कोहिलान पिल्लै के मुताबिक़, मलेशियाई प्रधानमंत्री जानबूझ कर मोदी विरोधी बयान देते हैं, इसके जरिए वे मुसलमानों को अपने पक्ष में रखना चाहते हैं.

पिल्लै कहते हैं, "महातिर मोहम्मद की पार्टी ने पिछले चुनाव में जीत हासिल की है लेकिन उन्हें मलेशियाई मुसलमानों के वोट नहीं मिले. ऐसे में कश्मीर और नागरिकता संशोधन क़ानून पर बयान देकर मलेशियाई मुसलमानों को ख़ुश करने की कोशिश हो सकती है."

Image caption कोहिलान पिल्लै

ज़ाकिर नाइक के कारण भी ख़राब हो रहे है भारत-मलेशिया के रिश्ते?

विवादास्पद भारतीय इस्लामिक उपदेशक ज़ाकिर नाइक मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद के गले की हड्डी साबित हो रहे हैं.

महातिर से पहले मलेशिया के प्रधानमंत्री रहे नजीब रज़ाक ने ज़ाकिर नाइक को मलेशिया में स्थायी रूप से रहने की सुविधा मुहैया कराई थी. लेकिन ज़ाकिर के प्रत्यर्पण के लिए भारत सरकार का दबाव महातिर को झेलना पड़ रहा है.

विश्लेषकों के मुताबिक़, महातिर ज़ाकिर नाइक को मलेशिया में रखना नहीं चाहते हैं लेकिन उन्हें बाहर निकाल भी नहीं सकते क्योंकि ज़ाकिर नाइक की लोकप्रियता मलेशियाई मुसलमानों में बहुत ज़्यादा है.

दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंध

इन दिनों भारत और मलेशिया के आपसी संबंध ठंडे और तनावपूर्ण भले हों लेकिन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तौर पर दोनों देशों के बीच बेहद मधुर रिश्ता रहा है.

अब्दार रहमान खोया के मुताबिक़, मलेशियाई इतिहास और संस्कृति की कोई बात भारतीय प्रभाव का ज़िक्र किए बिना पूरी नहीं होगी.

खोया ने बताया, "मलेशियाई खान पान, चीन और भारत के खान पान का मिश्रण है. मलाया भाषा में संस्कृत और हिंदी के ढेरों शब्द हैं. हम दोनों ने उपनिवेशवाद झेला है."

दक्षिण भारत के चोल वंश का 11वीं शताब्दी में मलेशिया पर शासन रहा था. तब भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को रबर के बगानों में काम करने के लिए लाया गया था. अब उन गिरमिटिया मज़दूरों की आज की पीढ़ी स्वतंत्र, शिक्षित और सफल है.

कुआलालम्पुर के अंदर और आसपास ऐसे दो 'लिटिल इंडिया' मौजूद हैं जहां हर जगह भारत का सामान दिखता है. यहां भारतीय रेस्टोरेंट नज़र आते हैं और दुकानों में भारत से आयात किए गए उत्पाद भी मिलते हैं. आपको यहां भारतीय चेहरों के अलावा मलेशियाई लोग भी खूब ऩजर आएंगे. शाम में हर कोई इन इलाक़ों में जाना चाहता है.

वैसे, मलेशिया में सैकड़ों हिंदू मंदिर और हिंदू तमिल स्कूल हैं. यहां के तमिल महीने में पूर्णिमा के दिन तमिल उत्सव थाई पुसम मनाया जाता है. इसमें हर समुदाय के लोग शरीक होते हैं और यह नेशनल हॉलीडे के तौर पर मनाया जाता है. दोनों देश आपस में इतिहास से गुंथे हैं, जिसमें कई दशकों तक ब्रिटिश राज के शासन का अतीत भी शामिल है.

तो अब आगे क्या होगा?

पर्दे के पीछे, दोनों तरफ के लोग आपसी संबंधों को सुधारने की कोशिश में जुटे हैं. भारतीय मूल के राजनेताओं, जिनमें दो महातिर मोहम्मद की सरकार में मंत्री हैं, को आगे बढ़कर भारत और मलेशिया के आपसी संबंधों को पटरी पर लाने के लिए कोशिश करनी होगी.

पूर्व जूनियर विदेश मंत्री रहे कोहिलान पिल्लै कहते हैं कि मोदी सरकार में उनके कोई दोस्त हैं. उन्होंने कहा, "अगर महातिर सरकार, भारत सरकार तक पहुंचने के लिए मेरी मदद चाहेगी तो मैं यह करने के लिए तैयार हूं."

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