पाम तेल से बचना इतना मुश्किल क्यों है?

  • 23 फरवरी 2020
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Image caption पाम ऑयल दुनिया का सबसे लोकप्रिय वनस्पति तेल है

पाम तेल रोज़ाना की ज़रूरतों में शामिल हो चुका है.

हो सकता है आज आपने शैंपू में इसका इस्तेमाल किया हो या फिर नहाने के साबुन में. टूथपेस्ट में या फिर विटामिन की गोलियों और मेकअप के सामान में. किसी न किसी तरह आपने पाम तेल का इस्तेमाल ज़रूर किया होगा.

जिन वाहनों में आप सफ़र करते हैं, वो बस, ट्रेन या कार जिस तेल से चलती हैं, उनमें पाम तेल भी होता है.

डीजल और पेट्रोल में बायोफ्यूल के अंश शामिल होते हैं जो मुख्य तौर पर पाम तेल से ही मिलते हैं.

यही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जिस बिजली से चलते हैं, उसे बनाने के लिए भी ताड़ की गुठली से बने तेल को जलाया जाता है.

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Image caption पाम ऑयल दुनिया का सबसे लोकप्रिय वनस्पति तेल है

ये दुनिया का सबसे लोकप्रिय वेजिटेबल तेल है और रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाले कम से कम 50 फ़ीसदी उत्पादों में मौजूद होता है. साथ ही औद्योगिक प्रयोगों में भी इसका इस्तेमाल अहम है.

वैश्विक उत्पादन

साल 2018 में किसानों ने वैश्विक बाज़ार के लिए क़रीब 7.70 करोड़ टन पाम तेल का उत्पादन किया और साल 2024 तक इसके 10.76 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.

लेकिन पाम तेल की बढ़ती मांग और इसके लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने की वजह से इंडोनेशिया और मलेशिया में जंगलों को लगातार ख़त्म किए जाने के आरोप भी लगते रहे हैं. यही नहीं जंगलों के ख़त्म होने से यहां के मूल जंगली जीव जैसे ओरंगुटान भी प्रभावित हो रहे हैं और कई अन्य प्रजातियां भी संकट में हैं.

सिर्फ इंडोनेशिया और मलेशिया में ही क़रीब 1.3 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन पर तेल के लिए पाम के पेड़ लगाए गए हैं, जो दुनिया भर के आधे पाम के पेड़ हैं.

ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के मुताबिक़ सिर्फ़ इंडोनेशिया में 2001 से 2018 के बीच 2.56 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन से पेड़ काटे गए. ये इलाका न्यूज़ीलैंड के बराबर है.

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Image caption इंडोनेशिया का वह इलाका, जहां जंगल काट दिए गए

इसी वजह से सरकार और उद्योगपति भी पाम तेल के विकल्प तलाशने के दबाव में हैं. लेकिन इस जादुई उत्पाद का विकल्प खोजना आसान नहीं है.

ब्रिटिश सुपरमार्केट चेन आइसलैंड को साल 2018 में तब सराहना मिली, जब उसने घोषणा की थी कि वो अपने प्रोडक्ट से पाम तेल को हटाएगा.

हालांकि, कुछ उत्पादों से पाम तेल को हटाना इतना मुश्किल रहा कि कंपनी ने उन पर अपना ब्रैंड नाम भी नहीं लिखा.

अमरीका में पाम तेल की बड़ी ख़रीदार और नामी फूड कंपनी जनरल मिल्स को भी इसी मुश्किल से गुजरना पड़ा.

ईंधन में पाम तेल का इस्तेमाल बड़ा मुद्दा है

जनरल मिल्स के प्रवक्ता मॉली वुल्फ कहते हैं, "हमने पहले भी इस दिशा में ध्यान दिया है, लेकिन पाम ऑयल में कुछ ख़ास तत्व होने की वजह से इसकी नक़ल करना मुश्किल होता है."

ईंधन के तौर पर पाम तेल का इस्तेमाल भी एक बड़ा मुद्दा है.

रसोई घर से लेकर बाथरूम तक इस मौजूदगी के बावजूद 2017 में यूरोपियन यूनियन द्वारा आयात किया गया आधा तेल ईंधन के लिए इस्तेमाल किया गया था.

हालांकि, 2019 में यूरोपियन यूनियन ने ऐलान किया था कि पाम ऑयल और अन्य खाद्य फसलों से निकलने वाले बायोफ्यूल का इस्तेमाल बंद किया जाएगा क्योंकि इसके उत्पादन से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है.

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Image caption सुपरमार्केट में इस तरह के जितने उत्पाद होते हैं, उनमें अधिकांश में पाम ऑयल होता है.

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पाम तेल के इतने इस्तेमाल के पीछे इसकी ख़ास केमिस्ट्री है.

पश्चिमी अफ्ऱीका में बीजों से निकलने वाला पाम तेल पीला और गंधहीन होता है, जो खाने में इस्तेमाल के लिए दुरुस्त है.

पाम तेल का मेल्टिंग पॉइंट अधिक है और इसमें सैचुरेटेड फैट भी ज़्यादा होता है. इसी वजह से यह खाते समय मुंह में घुलता है और मिठाई वगैरह बनाने के लिए मुफ़ीद है.

कई अन्य वनस्पति तेलों को कुछ हद तक हाइड्रोजनेटेड करने की ज़रूरत पड़ती है. हाइड्रोजनेटेड वो प्रक्रिया है, जिसमें तरल फैट में हाइड्रोजन मिलाकर उसे ठोस फैट बनाया जाता है.

इस प्रक्रिया में फैट में हाइड्रोजन अणुओं को रसायनिक तरीक़े से मिलाता जाता है, जिससे स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंचाने वाला ट्रांस-फैट तैयार होता है.

अपनी ख़ास केमिस्ट्री की वजह से पाम तेल अधिक तापमान पर भी बच जाता है और ख़राब नहीं होता है. पाम तेल से बनाए गए उत्पाद भी ज़्यादा दिनों तक चलते हैं.

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Image caption थाईलैंड की बायोडीज़ल उत्पादन यूनिट

पाम तेल और इसकी प्रॉसेसिंग के बाद बचे गूदे, दोनों को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

पाम के छिलकों को पीसकर कंक्रीट बनाया जा सकता है. पाम फाइबर और गूदा जलने के बाद बची राख को सीमेंट के तौर पर उपयोग किया जा सकता है.

ख़राब मिट्टी और ऊष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में भी पाम के पेड़ आसानी से उगाए जा सकते हैं और ये किसानों के लिए फ़ायदे का सौदा है.

इसी से पता चलता है कि पिछले कुछ बरसों में पाम के पेड़ उगाए जाने वाला इलाक़ा इतना कैसे बढ़ गया है.

पाम तेलका विकल्प क्या?

इस सिलसिले में अभी तक अपनाया गया सबसे आसान रास्ता पाम तेल जैसे गुणों वाले अन्य वनस्पति तेल खोजना रहा है.

खाद्य पदार्थों और सौंदर्य प्रसाधनों के वैज्ञानिक शे बटर, जोजोबा, कोकम, इलिप, जटरोफा और आम की गुठलियों जैसे विकल्प भी तलाश रहे हैं.

ईंधन के क्षेत्र में अलसी एक बेहतर विकल्प हो सकता है.

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Image caption अल्जी से भी तेल निकाला जा सकता है, लेकिन इसकी पाम ऑयल से प्रतिस्पर्धा कराना मुश्किल है

अलसी की कुछ प्रजातियों से निकले तेल को 'बायोक्रूड' में बदला जा सकता है. बायोक्रूड पेट्रोलियम के विकल्प के तौर पर उपयोग में आने वाले तेल को कहते हैं.

ऐसे बायोक्रूड को डीज़ल, जेट के ईंधन और भारी शिपिंग तेल की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है.

हो सकता है कि यह जितना ताक़तवर लग रहा है, उतना न हो, क्योंकि दुनिया की अधिकांश तेल फील्ड यानी जहां से तेल निकाला जाता है, उसमें अलसी के जीवाश्म ही हैं.

आर्थिक प्रतिस्पर्धा की चुनौती

2017 में 'एक्सॉन मोबिल' और 'सिंथटिक जीनॉमिक्स' ने ऐलान किया था कि उन्होंने अलसी पर ऐसा परीक्षण किया, जिससे क़रीब दोगुना तेल निकला.

पिछले साल कार बनाने वाली कंपनी हॉन्डा ने अपने ओहायो वाले प्लांट में प्रयोग के तौर पर अलसी का खेत तैयार बनाया, जो इंजन के टेस्ट सेंटर से कार्बन डाइऑक्साइड खींच लेता है.

लेकिन ऐसे उत्पादों को इस स्तर पर लाना बड़ी मुश्किल है, जहां से वो आर्थिक प्रतिस्पर्धा कर सकें और पाम तेल की जगह ले सकें.

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Image caption ऑयल पाम को जादुई फसल कहा जा सकता है- यह आसानी से उगती है, तेज़ी से बढ़ती है, इससे कई उत्पाद निकलते हैं

अगर हम पाम तेल की नक़ल नहीं कर सकते, तो इसके उत्पादन का तरीक़ा बदलकर कम से कम पर्यावरण पर पड़ने वाले इसके प्रभाव को कम कर सकते हैं.

ऐसा करने के लिए हमें ज़रा पीछे हटकर यह देखना होगा कि अभी पाम तेल की इतनी मांग क्यों है.

अनोखा और सस्ता

अपनी अनोखी केमिस्ट्री के अलावा पाम तेल सस्ता भी है. इसके सस्ते होने की वजह इसका चमत्कारी किस्म की फसल होना है. इसे उगाना आसान है, यह तेज़ी से बढ़ता है और इससे कई उत्पाद निकलते हैं.

एक हेक्टेयर में उगे ऑयल पाम से हर साल क़रीब चार टन वनस्पति तेल पैदा किया जा सकता है. वहीं इतनी ही सफ़ेद सरसों से 0.67 टन, सूरजमुखी से 0.48 टन और सोयाबीन से 0.38 टन तेल मिलेगा.

एक आदर्श स्थिति में अच्छी उपज वाले तेल पाम से उतनी ही जगह में उगे सोयाबीन के मुक़ाबले 25 गुना ज़्यादा तेल का उत्पादन किया जा सकता है.

विडंबना यह है कि ऐसी स्थिति में पाम तेल पर प्रतिबंध लगाने से बड़ी संख्या में जंगल काटे जाएंगे क्योंकि जिस भी अन्य फसल को उगाया जाएगा, उसके लिए ज़्यादा ज़मीन की ज़रूरत पड़ेगी.

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Image caption पाम ऑयल इंडस्ट्री की वजह से ओरैंगटन की प्रजाति खतरे में पड़ गई है.

हालांकि, पाम भूमध्य रेखा से 20 डिग्री में उगता है. यह घने जंगलों वाला इलाका है, जहां दुनिया की 80% वन प्रजातियां पाई जाती हैं.

पाम को इस तरह उगाना संभव है, जिससे पर्यावरण पर इसका न्यूनतम दुष्प्रभाव पड़े.

पश्चिमी देशों की कई कंपनियां ऐसे पाम तेल ख़रीदती हैं, जो 'राउंडटेबल फॉर सस्टेनबल पाम ऑयल' (RPSO) से प्रमाणित है.

लेकिन टिकाऊ पाम तेल की मांग और इसकी क़ीमत चुकाने की इच्छाशक्ति सीमित है.

अगर हम पाम तेल जितना उत्पादन करने वाले ऐसे पौधे बनाएं, जो कहीं भी उग सकते हों, तो हम उष्णकटिबंधीय वर्षावनों पर दबाव कम कर सकते हैं.

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Image caption ऑयल पाम की कटाई

ऑस्ट्रेलिया के CSIRO रिसर्च सेंटर में काम कर चुके फसल वैज्ञानिक काइल रेनॉल्ड्स भी ऐसा ही मानते हैं.

रेनॉल्ड्स कहते हैं, "पाम उत्तरी या दक्षिणी छोर पर नहीं बढ़ सकते. यह काफ़ी हद तक उष्णकटिबंधीय फसल है. अधिक बायोमास वाली किसी भी चीज़ को ज़्यादा अनुकूल और कई जलवायु में बढ़ सकने वाला होना चाहिए."

नई पत्तियां

कैनबरा में अपनी लैब में CSIRO के शोधकर्ताओं ने ज़्यादा तेल उत्पादन करने वाले पौधों के जीन्स पत्तियों वाले पौधों जैसे तम्बाकू और ज्वार में डाले.

ये पौधे क्रश किए जा सकते हैं और इनकी पत्तियों से तेल निकाला जा सकता है. आमतौर पर तम्बाकू की पत्तियों में 1% से भी कम वनस्पति तेल होता है, लेकिन रेनॉल्ड्स के पौधों में इसकी मात्रा 35% तक बढ़ गई. यानी इनसे सोयाबीन से भी ज़्यादा वनस्पति तेल मिला.

हालांकि, इस दिशा में अभी कई काम करने बाकी हैं. अमेरिका में हाई लीफ ऑयल से जुड़ा एक प्रयोग विफल हो गया. ऐसा संभवत: स्थानीय जलवायु की वजह से हुआ. वहीं ऑस्ट्रेलिया में ट्रांसजेनिक पौधे उगाए नहीं जा सकते.

और तम्बाकू की पत्तियों से जो तेल निकलता है, वह पाम ऑयल से कहीं अलग है.

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Image caption रिसर्च लैब में पत्तियों पर होता शोध

वैसे रेनॉल्ड्स कहते हैं कि अगर कोई उनकी रिसर्च से जुड़ी ज़रूरतों में निवेश करने को तैयार हो, तो एक नया और तेल उत्पादन करने वाला तम्बाकू 12 महीने में तैयार किया जा सकता है.

वो कहते हैं, "यह एक बहुत बड़ा उद्योग है. पाम की मौजूदा वैल्यू 48 खरब रुपए से भी ज़्यादा है."

"एक ग़ैर पाम तेल प्लांट से पाम तेल निकलना संभव है. क्या हम ऐसा कर सकते हैं? हां, बिल्कुल. लेकिन क़ीमत के मामले में यह कैसे प्रतिस्पर्धा करेगा?"

एक बात तो साफ़ है कि पाम तेल कहीं नहीं जाने वाला. इसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है और इसकी जगह लेना बहुत ही मुश्किल है.

लेकिन दुनिया पर हमारा असर कम करने के लिए वैज्ञानिक क्षमता का फ़ायदा उठाया जा सकता है.

हमें ज़रूरत है सिर्फ इच्छाशक्ति की, जो इसे पूरा कर सके. इसके लिए उस इच्छाशक्ति को उतना ही व्यापक होना होगा, जितना ख़ुद पाम तेल है.

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