अपना वेतन घटाकर सबको कम से कम 50 लाख रुपये महीना देने वाला बॉस

  • 25 मार्च 2020
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2015 में अमरीका के सिऐटल की एक कार्ड पेमेंट्स कंपनी के बॉस ने अपने 120 कर्मचारियों के लिए 70 हज़ार डॉलर यानी लगभग 50 लाख रुपये का न्यूनतम वेतन तय किया.

ऐसा करने के लिए कंपनी के बॉस ने अपनी आय से 10 लाख डॉलर यानी क़रीब सात करोड़ कम कर कर दिए. पांच साल हो चुके हैं और यह जनाब अभी भी कम वेतन ले रहे हैं.

डैन प्राइस नाम के इन जनाब का कहना है कि पांच साल पहले जो जुआ उन्होंन खेला था, वह फ़ायदेमंद रहा.

डैन अपनी दोस्त वैलेरी के साथ सिऐटल के पास पहाड़ों की सैर कर रहे थे. तभी उनकी दोस्त ने ऐसी बात बताई जिससे वह परेशान हो गए.

चलते-चलते वैलेरी ने उन्हें बताया कि कैसे उनकी ज़िंदगी जंजाल बनी हुई है. उनके मकान मालिक ने किराया 200 डॉलर बढ़ा दिया है और वह रोज़मर्रा के खर्च पूरे नहीं पड़ रहे.

इससे प्राइस नाराज़ हो गए. वैलेरी को उन्होंने एक बार डेट भी किया था. वह 11 साल सेना में रही थीं और दो बार इराक़ में तैनात रह चुकी थीं. अभी वह जीवन यापन के लिए हफ़्ते में 50 घंटे काम कर रही थीं और उन्हें दो जगहों पर काम करना पड़ रहा था.

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Image caption डैन प्राइस

प्राइस कहते हैं, "वह ऐसी हैं कि सेवा, सम्मान और परिश्रम ही उनके व्यक्तित्व को परिभाषित करता है."

वैलेरी हर साल 40 हज़ार डॉलर यानी लगभग 29 लाख रुपये कमा रही थीं, मगर सिऐटल में वह अपने लिए ढंग का मकान नहीं ले पा रही थीं.

प्राइस नाख़ुश हुए कि दुनिया में कितनी विषमता है. अचानक उन्हें अहसास हुआ कि इस वह ख़ुद भी तो इसी समस्या का हिस्सा हैं.

31 साल की उम्र में प्राइस करोड़पति बन गए थे. उनकी कंपनी ग्रैविटी पेमेंट्स के 2000 के आसपास ग्राहक हैं और इसकी कीमत लाखों डॉलर है. इस कंपनी को उन्होंने तब बनाया था जब वह किशोर थे.

प्राइस साल में 1.1 मिलियन डॉलर (लगभग आठ करोड़ रुपये) कमा रहे थे, मगर उनकी दोस्त वैलेरी के कारण उन्हें अहसास हुआ कि उनके स्टाफ़ के लोग भी तो संघर्ष कर रहे होंगे. उन्होंने इन हालात को बदलने का फ़ैसला किया.

डैन प्राइस काफ़ी सकारात्मक और विनम्र हैं मगर अमरीका में वह विषमता के ख़िलाफ़ उठने वाली सबसे सशक्त आवाज़ों में से एक हैं.

वह कहते हैं, "लोग भूख से जूझ रहे हैं, नौकरियों से निकाले जा रहे हैं या फिर शोषण का सामना करना कर रहे हैं. सिर्फ़ इसलिए ताकि किसी को न्यू यॉर्क के किसी ऊंचे टावर में आलीशान अपार्टमेंट मिल सके जहां वह सोने की कुर्सी पर आराम फ़रमा सके."

"हम अपने समाज, अपनी संस्कृति में लालच को बढ़ावा दे रहे हैं. फ़ोर्ब्स की अरबपतियों की सूची इसका सबसे ख़राब उदाहरण है. बिल गेट्स ने जेफ़ को पछाड़कर सबसे अमीर आदमी का तमगा हासिल कर लिया है तो किसी को क्या फ़र्क पड़ता है?"

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यक़ीन नहीं कर पाए कर्मचारी

प्राइस कहते हैं कि 1995 से पहले अमरीका की सबसे ग़रीब आबादी के आधे लोगों का देश की संपदा में सबसे अमीर एक फ़ीसदी लोगों से अधिक हिस्सा होता था.

मगर उस साल हालात उलट हो गए. सबसे अमीर एक फ़ीसदी लोगों ने सबसे ग़रीब 50 फ़ीसदी लोगों से अधिक कमाई की और फिर यह अंतर बढ़ता चला गया.

1965 में अमरीकी कंपनियों के सीईओ आम कर्मचारियों स 20 गुना अधिक कमा रहे थे और 2015 में वे 300 गुना अधिक कमा रहे थे. ब्रिटेन की बात करें तो यहां के शेयर बाज़ार की शीर्ष 100 कंपनियों के बॉस आम कर्मचारियों से 117 गुना अधिक वेतन पा रहे हैं.

पहाड़ पर और चढ़ते-चढ़ते प्राइस के मन में एक ख्याल आया. उन्होंने नोबेल जीतने वाले अर्थशास्त्री डेनियल कानेमन और एंगस डीटन को पढ़ा था. उन्होंने लिखा था कि एक अमरीकी को ख़ुश रहने के लिए कितना पैसा चाहिए.

उसी वक्त प्राइस ने वैलेरी से वादा किया कि वह अपनी कंपनी ग्रैविटी में न्यूनतम वेतन को बढ़ा देंगे.

काफी गुणा-भाग करने के बाद उन्होंने 70 हज़ार डॉलर की रकम तय की. उन्होंने पाया कि ऐसा करना है तो न सिर्फ़ अपना वेतन कम करना होगा बल्कि अपने दो घर गिरवी रखने होंगे और शेयरों में किए गए निवेश व बचत को भी खोना होगा.

उन्होंने अपने स्टाफ़ को इकट्ठा किया और उन्हें यह ख़बर सुनाई. उन्हें लग रहा था कि लोग जश्न मनाएंगे. मगर जैसे ही उन्होंने पहली बार इसका ऐलान किया, सन्नाटा छा गया. उन्हें एक बार फिर अपनी बात दोहरानी पड़ी.

पांच साल बाद, डैन हंसते हैं कि उनसे प्रिंसटन के प्रोफ़ेसरों के रिसर्च का एक अहम हिस्सा नज़रअंदाज हो गया था. इन प्रोफ़ेसरों का अंदाज़ा था कि ख़ुश रहने के लिए लोगों को 70 नहीं बल्कि 75 हज़ार डॉलर चाहिए होते हैं.

फिर भी, उनकी कंपनी में काम करने वाले कम से कम एक तिहाई लोगों का वेतन एक ही झटके में दोगुना या इससे ज़्यादा बढ़ गया.

इसके बाद से उनकी कंपनी ग्रैविटी बदल गई.

कर्मचारियों की संख्या बढ़ गई और कंपनी पहले जहां हर साल 3.8 बिलियन डॉलर की पेमेंट प्रोसेस करती थी, अब वह 10.2 बिलियन डॉलर की पेमेंट प्रोसस कर रही है.

मगर प्राइस को इन आंकड़ों की बजाय कुछ और आंकड़ों पर गर्व है.

वह कहते हैं, "न्यूनतम वेतन 70 हज़ार डॉलर किए जाने से पहले पहले टीम में सालाना शून्य से दो बच्चे पैदा होते थे. मगर पिछले साढ़े चार सालों में 40 बच्चे पैदा हुए हैं."

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Image caption डैन प्राइस अपनी मां के साथ

कंपनी के 10 फ़ीसदी से अधिक कर्मचारी ऐसे हैं जो अमरीका के सबसे महंगे किराये वाले शहर में अपना घर ख़रीद पाए हैं. इससे पहले यह आंकड़ा महज एक फ़ीसदी था.

प्राइस कहते हैं, "आलोचकों का कहना था कि लोगों को जो अतिरिक्त पैसा मिलेगा, उसे वे फ़िज़ूलखर्ची में उड़ा देंगे. मगर इसका उल्टा हुआ है."

कर्मचारी स्वेच्छा से अपने पेंशन फंड में जो पैसा डालते थे, वह दोगुना हो गया है और 70 प्रतिशत कर्मचारियों का करना है कि उन्होंने अपने सारे कर्ज चुका दिए हैं.

मगर प्राइस को काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. उन्हें समर्थन में सैकड़ों ख़त आए और कई पत्रिकाओं ने उन्हें 'अमरीका का बेस्ट बॉस' कहा. मगर कंपनी के अपने ग्राहकों ने ही उन्हें ख़त लिखकर आपत्ति जताई और उनके इस क़दम को राजनीतिक रंग में रंगा बताया.

उस समय सिऐटल में न्यूनतम दिहाज़ी को 15 डॉलर करने को लेकर चर्चा चल रही थी जो कि उस समय अमरीका में सबसे अधिक होती. छोटे कारोबारी इसका विरोध कर रहे थे. उनका कहना था कि अगर ऐसा किया गया तो वे बर्बाद हो जाएंगे.

प्राइस बचपन से ही दक्षिण पंथी रेडियो विश्लेषक रश लिमबाफ़ को सुना करते थे. लिमबाफ़ ने प्राइस को कम्यूनिस्ट क़रार दे दिया.

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि उनकी कंपनी एक केस स्टडी है कि कैसे समाजवाद सफल नहीं हो सकता क्योंकि उनका यह प्रयोग नाकाम होने वाला है.'

ग्रैविटी के दो वरिष्ठ कर्मचारियों ने भी आपत्ति जताते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था. वे इस बात से ख़ुश नहीं थे कि जूनियर स्टाफ़ का वेतन रातोरात बढ़ गया. उनका कहना था कि इससे वे सुस्त हो जाएंगे और कंपनी के लिए प्रतियोगिता में बने रहना मुश्किल हो जाएगा.

मगर ऐसा नहीं हुआ.

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Image caption रोसिता बारलो

कर्मचारियों का प्रदर्शन बेहतर हुआ

ग्रैविटी में सेल्स की डायरेक्टर रोसिता बारलो कहती हैं कि वेतन बढ़ाए जाने के बाद जूनियर कर्मचारी और अधिक मेहनत कर रहे हैं.

वह कहती हैं, "जब आप काम करते हैं और आपके दिमाग़ में पैसे की चिंता नहीं होती तो आप प्रेरित होकर और लग्न से काम करते हैं."

सीनियर स्टाफ़ को लगता है कि उनके पर से काम का बोझ कम हुआ है. उनपर दबाव कम है और वे अच्छे से काम कर सकते हैं या फिर ख़ुद को मिलने वाली छुट्टियों को लुत्फ़ उठा सकते हैं.

प्राइस अपनी कंपनी के कॉल सेंटर में काम करने वाले एक कर्मचारी की कहानी सुनाते हैं.

"वह ऑफ़िस तक आने के लिए रोज़ एक घंटे से अधिक ट्रैवल करता था. वह हर समय चिंता में रहता था कि कहीं टायर न फट जाए क्योंकि रिपेयर करने के लिए उसके पास पैसा नहीं था. वह हर रोज़ इस बात को लेकर चिंतित रहता था."

जब उसका वेतन 70 हज़ार डॉलर किया गया तो उसने ऑफ़िस के पास रहना शुरू कर दिया. अब वह अपने स्वास्थ्य पर अधिक पैसा खर्च करता है. रोज़ व्यायाम करता है और अच्छा भोजन करता है.

"एक और टीम में एक कर्मचारी है जिसने 22 किलो कम किए हैं. बाक़ी लोगों का कहना है कि वे अपने परिजनों के साथ अधिक समय बिता पा रहे हैं या फिर कर्ज चुकाने में अपने माता-पिता की मदद कर रहे हैं."

प्राइस कहते हैं, "लोगों को आज़ादी देने का असर क्या होता है, यह हम हर रोज़ देख रहे हैं." वह कहते हैं कि इसी कारण ग्रैविटी अब पहले से अधिक पैसे कमा रही है.

वह कहते हैं कि पैसा पढ़ाने से लोगों की प्रेरणा कम नहीं हुई बल्कि वे और मेहनत कर रहे हैं और इससे उनकी क्षमता भी बढ़ी है.

रोसिता इससे सहमत हैं,. वह कहती हैं, "कर्मचारी यह नहीं सोच रहे कि मुझे पैसा कमाने के लिए काम पर जाना है. वे इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि मैं अच्छा काम कैसे करूं."

बोरलो कंपनी के शुरुआती दिनों से ही साथ हैं और जानती हैं कि प्राइस हमेशा से इतने उदार नहीं थे.

प्राइस भी मानते हैं कि 2008 में आर्थिक संकट के दौर में उनपर पैसे बचाने का जुनून सवार हो गया था.

अमरीकी अर्थव्यवस्था में आई मंदी के कारण ग्रैविटी के ग्राहक घट गए और आमदनी भी 20 प्रतिशत गिर गई. कंपनी में उस समय 35 कर्मचारी थे और 12 कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की नौबत आ गई. मगर प्राइस ने ऐसा नहीं किया और लागत घटाने के दूसरे तरीक़े तलाशे.

पांच महीनों बाद कंपनी ने फिर से मुनाफ़ा कमाना शुरू कर दिया मगर प्राइस ने वेतन कम नहीं रखे.

उस समय रोसिता बारलो भी आर्थिक दिक्कतों का सामना कर रही थीं और ऑफ़िस के इतर चुपके से मैकडॉनल्ड में काम कर रही थीं.

जब मैकडॉनल्ड ने उन्हें प्रमोशन दिया तो उन्होंने ट्रेनिंग मैनुअल ग़लती से ग्रैविटी में अपने डेस्क पर रख दिया और किसी कर्मचारी को यह दिख गया.

बॉस ने बारलो को मीटिंग के लिए बुलाया. वह कहती हैं, "मुझे बिठाया गया. मेरा मन रोने का हो गया. लगा कि मुझे नौकरी से निकाला जा रहा है."

मगर उनसे पूछा गया कि कंपनी में रुकने के लिए आप कितना पैसा लेंगी. इसके बाद उनका वेतन बढ़ाकर 40 हज़ार डॉलर कर दिया गया.

प्राइस कहते हैं, "मैं बारलो से प्रभावित था और अपने से नाराज़." फिर भी, अपने स्टाफ़ की दिक्कतों को समझने में प्राइस को कुछ और साल लग गए.

वह कहते हैं, "बहुत से लोग मुझे आकर यह बताने से डरते थे कि कैसे कम वेतन के कारण उन्हें दिक्कतें हो रही हैं."

2015 से पहले उन्होंने अपने कर्मचारियों को 20 प्रतिशत की सालाना वेतनवृद्धि देना शुरू कर दिया था. मगर वैलेरी के साथ बातचीत के बाद ही उन्होंने एक क़दम और बढ़ने का फ़ैसला किया था.

प्राइस को उम्मीद थी कि ग्रैविटी का उदाहरण देखकर अमरीका में अन्य कंपनियों में भी बदलाव आएंगे. मगर उन्हें निराशा है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ.

हालांकि, कुछ ने उनकी राह पकड़ी है. बॉस्टन की फ़ार्मालॉजिक्स ने अपना न्यूनतम वेतन 50 हज़ार डॉलर किया है. रेन्टेड डॉट कम ने भी वेतन बढ़ाया है.

प्राइस को लगता है कि ऑनलाइन लॉबीइंग के कारण अमेज़न ने भी अपना न्यूनतम वेतन बढ़ाने का फ़ैसला किया है.

मगर वह चाहते हैं कि व्यापक बदलाव आए और पूरे के पूरे स्वरूप में बदलाव आए.

वह कहते हैं, "मैं ग़लत था. मुझे लगता था कि जैसा मैंने किया, वैसा बाक़ी भी करेंगे तो हम सभी विषमता को दूर कर सकते हैं."

इस बदलाव का प्राइस और उनकी जीवनशैली पर भी असर पड़ा है.

अपना वेतन कम करने से पहले वह सिऐटल में आलीशन घर में रहते थे और महंगे रेस्तरां में जाकर शैंपेन पिया करते थे.

इसके बाद उन्होंने अपने घर को एयरबीएनबी पर किराये के लि दे दिया है. कुछ कर्मचारियों ने जब उन्हें 12 साल पुरानी ऑडी कार में आते देखा तो मिलकर उन्हें टेस्ला ख़रीदकर दे दी.

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Image caption डैन प्राइस सहयोगियों से तोहफ़े में मिली कार के साथ

कंपनी ने यूट्यूब पर एक फ़िल्म डाली है. इसमें कंपनी में काम करने वालीं अलिसा ओनील अपने सहयोगियों के साथ मिलकर प्राइस को एक कार गिफ़्ट करने की योजना बना रही हैं.

वह कहती हैं, "उन्होंने जो कुछ त्याग किया है, उसके बदले उन्हें शुक्रिया करने का यह अच्छा तरीका है."

प्राइस अपने ऑफ़िस से निकलकर पार्किंग एरिया की ओर बढ़ते हैं. वहां वह कार देखते हैं और रोने लग जाते हैं.

पांच साल बाद आज भी प्राइस अपनी कंपनी के न्यूनतम वेतन के बराबर ही वेतन ले रहे हैं. वह कहते हैं कि आज वह पहले से अधिक ख़ुश हैं.

वह कहते हैं, "हर दिन नए इम्तिहान आपके सामने आते हैं. मैं मार्क ज़करबर्ग की ही उम्र का हूं. कई पल ऐसे आते हैं जब मैं उनके जैसा ही अमरीक होना चाहता हूं और उनसे मुक़ाबला करना चहता हूं ताकि फ़ोर्ब्स की लिस्ट में आऊं. मैं बहुत सारा पैसा कमाकर टाइम मैगज़ीन के कवर पेज पर आना चाहता हूं. ये सब लालच भरी चीज़ें काफ़ी आकर्षित करती हैं."

"इन सबसे दूर हो जाना उतना आसान नहीं है जितना लगता है. मगर फिर भी मेरी ज़िंदगी काफ़ी बेहतर है."

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