'कोरोना वायरस से नहीं मरे तो भूख से मर जाएंगे'

मास्क पहने महिला

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भारत में कोरोनावायरस के मामले

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कुल मामले

2842

जो स्वस्थ हुए

559

मौतें

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

"अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो हम कोरोना वायरस के बजाय भूख से मर जाएंगे" - थाईलैंड के सबसे बड़े झुग्गी इलाक़े क्लोंग तोएइ में रहने वाली पंतीरा सुट्ठी की हालत का अंदाज़ा उनकी इसी बात से लगाया जा सकता है.

चकाचौंध भरे बैंकॉक के बीचोंबीच पड़ने वाले क्लोंग तोएइ इलाक़े को कुछ लोग शहर के सबसे बदसूरत हिस्से के तौर पर भी देखते हैं. पुराने टिन और सड़ी हुई लकड़ियों से बने मकान, पानी से भरे गड्ढे और नहरें डेढ़ वर्ग किलोमीटर में फैले इस स्लम की पहचान हैं.

पंतीरा सुट्ठी एक सिंगल मदर हैं. वे बिना किसी की मदद के अपने बेटे और पोते की देखभाल कर रही हैं. वे पास के एक स्कूल में फ़्राइड चिकन और मटन के कोफ़्ते बेचती हैं.

लेकिन पंतीरा की आमदनी का एकमात्र ज़रिया इन दिनों बंद हो गया है क्योंकि कोरोना वायरस की महामारी के कारण स्कूल बंद है.

जब दिन ठीक थे तो वो रोज़ का 30 डॉलर तक कमा लेती थीं लेकिन अब उनके हाथ खाली हो गए हैं. कोरोना वायरस ने उनकी रोज़ी रोटी छीन ली है. ये तकलीफ़ पंतीरा की तरह उन तमाम 20 हज़ार लोगों की है जो क्लोंग तोएइ को अपना घर कहते हैं.

आजीविका का संकट

पंतीरा सुट्ठी के लिए हैंड सैनिटाइज़र या फ़ेस मास्क जमा करना प्राथमिकता नहीं है. परिवार के भोजन का इंतज़ाम करना उनके लिए ज़्यादा ज़रूरी काम है. पंतीरा किसी एक ही चीज़ का इंतज़ाम कर सकती हैं.

वो कहती हैं, "किस्मत से हमारे समाज में अभी तक कोई कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं हुआ हैं. इसलिए मैं न तो कोरोना वायरस से बीमार पड़ने वाली हूं और न ही मरने वाली. लेकिन ग़रीबी धीरे-धीरे हमारी जान ले रही है. हम केवल हालात जल्द बेहतर होने की उम्मीद कर सकते हैं. मुझे भरोसा है कि सरकार हमारी ज़रूर मदद करेगी."

ग्राहकों के अभाव में पंतीरा के लिए आजीविका का संकट खड़ा हो गया है.

वो कहती हैं, "मैं सचमुच ये चाहती हूं कि बाहर जाकर कुछ खाने-पीने का सामान बेच लूं और कुछ पैसे कमा लूं. लेकिन सच तो ये है कि मेरे पास खुद ही पर्याप्त खाने-पीने का सामान नहीं है. मैं कहां से पैसों का इंतज़ाम करूं ताकि चिकन और मटन के कोफ़्ते खरीद सकूं."

फिलहाल उनका गुज़ारा दान में मिले भोजन से चल रहा है जिसकी व्यवस्था कुछ मंदिरों और ग़ैरसरकारी संगठनों की तरफ़ की जा रही है.

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पंतीरा सुट्ठी का परिवार दान में मिल रहे राशन पर ज़िंदा है

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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झुग्गी में रहने वाले लोगों के पास छोटे-मोटे काम के अलावाआजीविका के बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं होते. दूसरे लोगों की तरह 56 वर्षीया थॉन्ग्रुएंग थॉन्ग्फुएन भी मज़दूरी करती हैं और इन दिनों रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रही हैं.

पति के साथ वो हर रोज़ काम पर निकल जाती हैं और पास के इलाक़े की एक मुख्य सड़क पर खड़ी हो जाती हैं, इस उम्मीद से कि कोई उन्हें मजदूरी के काम पर बुला लेगा. उन्हें मालूम है कि सरकार ने घरों से बाहर न जाने की सलाह दी है लेकिन ज़िंदा रहने के लिए पैसे कमाना उनके लिए ज़्यादा ज़रूरी है.

थॉन्ग्रुएंग थॉन्ग्फुएन कहती हैं, "हमारे जैसे ग़रीब लोगों के पास कोई चारा नहीं होता. मैं जानती हूं कि सरकार लोगों से घरों में रहने के लिए कह रही है लेकिन अगर मैं पैसे कमाने के लिए बाहर नहीं जाऊंगी तो हम में से कोई ज़िंदा नहीं बचेगा. हमें कोई काम नहीं देता है. जब हम बाहर जाते हैं जो कोरोना वायरस से संक्रमित होने का ख़तरा रहता है."

वो कहती हैं, "मुमिकन है कि हम बाहर से कोरोना का संक्रमण लाकर यहां अपने समाज में दूसरे लोगों को भी संक्रमित कर दें. लेकिन हम क्या करें? मुझे अपने बच्चों का पेट भरना है. जिनसे हम ने कर्ज ले रखा है, वो महाजन अपने पैसे की वसूली के लिए हमेशा हमारे दरवाज़े पर आ जाते हैं. हम बहुत दबाव में हैं. कभी-कभी तो लगता है कि जीने की कोई वजह ही नहीं रह गई है."

जोख़िम भरी ज़िंदगी

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पंतीरा सुट्ठी

क्लोंग तोएइ थाईलैंड का सबसे बड़ा स्लम है. कम से कम वहां 20 हज़ार लोग आधिकारिक रूप से रहते हैं. हालांकि माना जाता है कि वहां रहने वालों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा हैं. एक अनुमान तो ये भी है कि क्लोंग तोएइ में एक लाख के क़रीब लोग रहते हैं.

सघन आबादी, बेतरतीबी से चिपके हुए घर, ये वो वजहें हैं जिनसे क्लोंग तोएइ में किसी महामारी का फैलना बहुत आसान हो जाता है. स्लम में रहने वाले ज़्यादातर लोगों को कोरोना वायरस की महामारी के बारे में जानकारी है. लेकिन ग़रीबी और तंगहाली की वजह से वे ज़्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं.

क्लोंग तोएइ में ही रहने वाली सनितमुइएनवाइ कहती हैं, "यहां रहने वाले ज़्यादातर बच्चे, बूढ़े और बीमार लोग हैं जो कहीं आसानी से आ-जा नहीं सकते हैं. यहां कोरोना संक्रमण का एक भी मामला सामने आया तो पूरा का पूरा समुदाय ही ख़तरे में पड़ जाएगा."

कोरोना महामारी का पहला महीना

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लड्डा मांगमीपोल की उम्र 26 साल है और वो भी स्लम में ही रहती हैं. लड्डा फ़ेस मास्कर बनाकर लोगों को फ्री में देती हैं. वो कहती हैं, "मैं उन खुशनसीब लोगों में से हूं जो अपनी नौकरी बचाकर रख पाई हूं. इससे मेरे परिवार का गुज़ारा चल रहा है. लेकिन मैंने अपने रिश्तेदारों को, पड़ोसियों को इस संकट में संघर्ष करते देखा है."

"यहां रहने वाले ज़्यादातर लोग मज़दूरी करते हैं. इस समय उनके पास कोई काम नहीं है. ये भले ही बैंकॉक में कोरोना महामारी का पहला महीना है लेकिन यहां तो लोग पहले से संघर्ष कर रहे थे. मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि अगले महीने क्या होने वाला है."

"क्लोंग तोएइ के जिस हिस्से में मैं रहती हूं, वहां बहुत डर का माहौल है. हाल में यहां कोरोना वायरस से संक्रमण के एक मामले की पुष्टि हुई है. मुझे डर है कि इस इलाक़े के बहुत सारे लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं और उनकी जानें जा सकती हैं."

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

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भुला दिए गए लोग

जहां एक तरफ़ थाईलैंड में लोग कोरोना महामारी से बचाव की तैयारियां कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ क्लोंग तोएइ के हज़ारों लोगों की ज़िंदा कैसे रहे इस सवाल से जूझ रहे हैं.

भले ही सरकार ये कहे कि लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना चाहिए, घरों में रहना चाहिए लेकिन क्लोंग तोएइ के लोगों की हकीकत तो ये है कि वे इन दिशानिर्देशों का पालन करने में सक्षम ही नहीं हैं.

थाईलैंड में कोरोना संक्रमण के मामलों के साथ-साथ मरने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. लेकिन झुग्गी में रहने वाले जिन लोगों की रोज़ी-रोटी छिन गई है, उनके पास बाहर जाने का जोख़िम उठाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.

सरकार ने क्लोंग तोएइ को उस लिस्ट में रखा है जिसे आने वाले दस सालों में ढहा दिया जाएगा लेकिन ऐसा लगता है कि वो ये भूल गई है कि मौजूदा वक्त में ये झुग्गी हज़ारों परिवारों का ठिकाना है.

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