बांग्लादेश में मछलियों पर क्यों मंडरा रहा है संकट?

  • अबुल कलाम आज़ाद और शारलोट पामेंट
  • बीबीसी बांग्ला सेवा
मछुआरे

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बांग्लादेश एक ऐसी जगह है जहां की एक बड़ी आबादी मछलियों पर निर्भर है.

लेकिन अब वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर बांग्लादेश में इसी तेजी से मछलियां पकड़ी जाती रहीं तो आने वाले सालों में बांग्लादेश के समुद्री क्षेत्र में मछलियां ख़त्म हो जाएंगी.

बंगाल की खाड़ी पर आधारित एक रिपोर्ट कहती है कि इस क्षेत्र में ज़्यादातर मछलियों की प्रजातियों की आबादी घट रही है, वहीं कुछ मछलियों की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं.

थाइलैंड जैसा हाल न हो जाए

इस रिपोर्ट के लेखक सयैदुर रहमान चौधरी बताते हैं, "दुनिया में कुछ समुद्रों में, जैसे थाइलैंड की खाड़ी में मछलियां ख़त्म हो चुकी हैं. हम बंगाल की खाड़ी का यही हश्र होते हुए देखना नहीं चाहते हैं."

बांग्लादेश दुनिया के सबसे ज़्यादा आबादी वाले देशों में से एक है.

इसकी ज़्यादातर आबादी बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों के डेल्टा क्षेत्र में बसी हुई है.

इनमें से कम से कम पंद्रह लाख लोग अपनी जीविका चलाने के चलिए मछलियों पर निर्भर हैं.

और इस बड़ी आबादी के लिए मछली ही एनिमल प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत बनी हुई है.

लेकिन बांग्लादेश सरकार की ओर से कमिशन की गई एक तीन वर्षीय रिपोर्ट बताती है कि सबसे बड़ी और सबसे ख़ास प्रजातियां जैसे कि टाइगर प्रॉन्स और इंडियन सालमन लगभग ख़त्म हो चुकी हैं.

बीते 35 सालों से चितगॉन्ग में मछुआरे के रूप में काम करने वाले जासिम मानते हैं कि बीते कुछ सालों में मछली पकड़ना काफ़ी मुश्किल हुआ है.

वे कहते हैं कि कुछ सालों पहले तक हमें कुछ घंटों की यात्रा करने के बाद ही मछलियां मिला जाया करती थीं लेकिन अब उन्हें और उनके साथ काम करने वालों को 20 घंटों की यात्रा करने के बाद कुछ मिलता है.

जासिम कहते हैं, "पहले मछलियों की कई सारी प्रजातियां हमें मिलती थीं. लेकिन अब वे हमें नहीं मिलती हैं."

जासिम और उनके जैसे मझले स्तर के लोग मछलियों में कमी के लिए खाड़ी में ट्रॉलर्स को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

नियंत्रण से बाहर हैं ट्रॉलर

बांग्लादेश की समुद्री सीमा में लगभग 270 ट्रॉलर काम करते हैं. इनमें से सबसे बड़े ट्रॉलर एक बार में चार सौ टन मछली पकड़ सकते हैं.

जासिम जैसे किसी मछुआरे जितनी मछली एक बार में पकड़ते हैं, ये मात्रा उससे बीस गुना ज़्यादा है.

चौधरी कहते हैं, "हम सच में बेहद चिंतित हैं. अगर ये मछली पकड़ने के प्रयासों में भारी कमी नहीं आई तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए ये संपदा खो सकते हैं."

ये ट्रॉलर चलाने वाली कंपनियां सरकार को ट्रॉलर लाइसेंस फीस देती हैं.

लेकिन ये सारे ट्रॉलर चंद कंपनियों की ओर से चलाए जाते हैं और ये कंपनियां सरकार को जो फीस देती हैं, वो इनके फायदे से काफ़ी कम होती है.

ये कंपनियां सरकार की ओर से सालों पहले जारी किए गए फिशिंग लाइसेंस की खरीद फरोख़्त करती हैं.

इससे मतस्य विभाग के लिए समुद्र में चल रहे ट्रॉलरों की संख्या नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है.

लेकिन अब बांग्लादेश सरकार एक कानून बना रही है जो कि मतस्य विभाग को पुराने लाइसेंस ख़ारिज करने की शक्ति प्रदान करेगा.

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ये कानून इस समय बांग्लादेश की संसद से पास होने की प्रक्रिया में है.

लेकिन जब मतस्य विभाग के अधिकारी वर्तमान क़ानून का पालन करने की कोशिश करते हैं तो ट्रॉलर चलाने वाली कंपनियां उनके ख़िलाफ़ अदालत में ले जाती हैं.

और अगर अधिकारी कोर्ट में केस हार जाते हैं तो उन पर व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराए जाने का ख़तरा होता है.

नेवल ट्रेड डिपार्टमेंट में एक वरिष्ठ अधिकारी कैप्टन मोहम्मद गियासुद्दीन बताते हैं कि जब तक स्टॉक को लेकर कोई कंक्रीट जानकारी उपलब्ध नहीं है तब तक ट्रॉलर चलाने के लिए कोई नया लाइसेंस नहीं जारी किया जाना चाहिए.

वह कहते हैं, "अगर ये जारी रहा तो हमारी मछलियों वाली जगहों से मछलियां ख़त्म हो जाएंगी."

मछलियों के लगातार कम होने की वजह से ट्रॉलर चलाने वाली कंपनियों ने हिल्सा मछली को पकड़ना शुरू कर दिया है.

ये एक ऐसी मछली है जो कि छोटे और मझले स्तर के मछुआरे के जीवनयापन एवं बांग्लादेश की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी है.

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हिल्सा की संख्या बढ़ी लेकिन

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बांग्लादेश की राष्ट्रीय मछली हिल्सा सिर्फ एक ऐसी प्रजाति है जिनकी संख्या में कुछ बढ़त दिख रही है.

इसकी वजह बांग्लादेश सरकार की ओर से लगाया गया बैन है.

सरकार ने हर साल अक्टूबर के महीने में 22 दिन तक हिल्सा मछली के पकड़ने को प्रतिबंधित कर रखा है.

इस प्रतिंबध की वजह से हिल्सा मछली प्रजनन के लिए नदियों के मुहाने की ओर चली जाती हैं.

इसके बदले में सरकार मछुआरों को लगभग 20 किलोग्राम चावल देती है.

लेकिन ज़्यादातर लोगों के मुताबिक़, इस दौरान मछुआरे अपने परिवार का पेट भरने में दिक्कतें और आर्थिक तंगी झेलने की बात करते हैं.

बीते साल जब सरकार ने मई के महीने में ये घोषणा की थी कि सरकार इस प्रतिबंध को बढ़ाकर 65 दिन करने जा रही है और इसके बदले में उन्हें किसी तरह का मुआवज़ा नहीं मिलेगा.

इस घोषणा के बाद सैकड़ों मछुआरों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किए.

चौधरी मानते हैं कि इन प्रतिबंधों ने हिल्सा मछली की संख्या में बढ़ोतरी की है लेकिन इसका फायदा आम मछुआरों को नहीं मिल रहा है.

वे कहते हैं, "हालांकि, हिल्सा मछली के संरक्षण की वजह से लाखों ग़रीब मछुआरों पर असर पड़ता है. लेकिन इसका बड़ा फायदा कंपनियों को हो रहा है जो कि ट्रॉलर चलाती हैं. इन कंपनियों के ट्रॉलर हज़ारों टन हिल्सा मछली पकड़ते हैं और सरकार को ज़्यादा पैसा और सामाजिक लाभ नहीं देते हैं."

हिल्सा रिकवरी ने विदेशों से भी सुपर ट्रॉलर नावों को आकर्षित करना शुरू कर दिया है.

ये ट्रॉलर ऐसे उपकरणों से लैस हैं जो कि हिल्सा मछलियों के ठिकानों को ट्रैक करने में महाराथ रखते हैं.

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नया संकट

इन औद्योगिक स्तर की बड़ी नावों (सुपर ट्रॉलर) में वर्तमान ट्रॉलर की तकनीकी खूबियां मौजूद हैं.

लेकिन इसके साथ ही इनका आकार और इंजन की क्षमता इन्हें तेजी से तैरने वाली हिल्सा मछली को पकड़ने के काबिल बनाती है.

इन नावों में सोनार उपकरण भी लगे हुए हैं जिससे वे मछलियों के ठिकानों का पता लगा लेते हैं.

चितगॉन्ग में बीते साल ही चार ऐसी बड़ी नावें विदेश से आई हैं.

बांग्लादेशी ऑपरेटरों ने बंदरगाहों पर खड़ी इन चार नावों को खरीद लिया और इसके बाद अब ये दावा कर रहे हैं कि वे इनका इस्तेमाल कर सकते हैं.

इनमें से दो नावें सी व्यू और सी विंड थाइलैंड से आई हैं.

सोमालिया में जारी अवैध फिशिंग से जुड़े एक इंटरपोल संदेश में इन नावों का ज़िक्र है.

अंतरराष्ट्रीय मॉनिटरिंग ऑर्गनाइजेशन ओसियन माइंड और इंटरनेशनल जस्टिस मिशन साल 2018 से इन नावों की मॉनिटरिंग कर रही हैं.

और इन संस्थाओं ने सैटेलाइट इमेज़री की मदद से इस बात की पुष्टि की है कि ये दोनों नावें चितगॉन्ग के बंदरगाहों पर खड़ी हुई हैं.

काली सूची में दर्ज नावों के बारे में पूछने पर कैप्टन गियासुद्दीन बताते हैं, "ये नावें बांग्लादेश में मरम्मत की बात करते हुए आई थीं लेकिन बाद में इन्हें बाहर कर दिया गया."

बीबीसी ने इस बारे में पूछने के लिए फिशरीज़ विभाग से बात करने का प्रयास किया लेकिन हमें बताया गया कि कोरोना वायरस की वजह से विभाग को बंद कर दिया गया है और मंत्री इस बारे में कोई जवाब देने में सक्षम नहीं हैं.

लेकिन चौधरी सुपर ट्रॉलर के मछलियों की संख्या पर प्रभाव और इस क्षेत्र के प्रबंधन को लेकर चिंतित नज़र आते हैं.

वे कहते हैं, "ये सुपर ट्रॉलर मरीन संसाधनों के लिए एक ख़तरा हैं. अगर ऐसी अवैध नावें बांग्लादेशी जलसीमा में घुस सकती हैं और पंजीकृत की जा सकती हैं तो ये कहा जा सकता है कि बांग्लादेश ऐसी काली सूची वाली नावों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन चुकी है."

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